"प्रिय बंधुओं, मेरी प्रस्तुत रचना, उम्र की उस ढलान को प्रदर्शित करती है, जिसमे हमारे पास सिमित-समयाविधि होती है, और जहाँ से वापस लौट पाना असंभव होता है I इस सिमित-समयाविधि में ही मनुष्य अपने द्वारा किये कार्यों से अपना अनुमान लगा पाता है की उसने क्या सही, क्या गलत किया...!! त्रुटिपूर्ण कार्य करने की अवस्था में मात्र खिन्नता ही प्राप्त होती है, क्यूंकि हमारे पास उन्हें सुधारने हेतु समय का अभाव होता
है.....
"उम्र- एक खेद-पूर्ण यात्रा-साथी!!"................
मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का,
क्या रह सकते हो मेरी आँखों में, उम्मीदों की किरण बनके?
क्या कर सकते हो रोशन, मेरे बुझते चिरागों को ?
क्या मिटा सकते हो, मेरे चेहरे पर पड़ी उम्र की सिलवटों को?
क्या रोक सकते हो, मेरी जाती हुई श्वांस-रूपी डोर को?
नहीं,
जानता था मैं, पर क्या करूँ?
जीना चाहता हूँ, कुछ और पल,
अपनी भूल-सुधार में,
रहना चाहता हूँ, उनके साथ, जिन्हें छोड़ चूका हूँ,
समय के गर्भ में कोसों दूर,
बांटना चाहता हूँ, वोह स्नेह, जिसे छीन चूका हूँ,
स्वार्थ्य-परक उद्देश्यों में,
पाना चाहता हूँ, वो सम्मान, जिसे खो दिया है,
स्व-अहम् में,
बिताना चाहता हूँ, शेष जीवन
आत्म-चिंतन व ईश्वरीय-अनुभूति में.....!!
.............मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का.........!!
"उम्र- एक खेद-पूर्ण यात्रा-साथी!!"................
मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का,
क्या रह सकते हो मेरी आँखों में, उम्मीदों की किरण बनके?
क्या कर सकते हो रोशन, मेरे बुझते चिरागों को ?
क्या मिटा सकते हो, मेरे चेहरे पर पड़ी उम्र की सिलवटों को?
क्या रोक सकते हो, मेरी जाती हुई श्वांस-रूपी डोर को?
नहीं,
जानता था मैं, पर क्या करूँ?
जीना चाहता हूँ, कुछ और पल,
अपनी भूल-सुधार में,
रहना चाहता हूँ, उनके साथ, जिन्हें छोड़ चूका हूँ,
समय के गर्भ में कोसों दूर,
बांटना चाहता हूँ, वोह स्नेह, जिसे छीन चूका हूँ,
स्वार्थ्य-परक उद्देश्यों में,
पाना चाहता हूँ, वो सम्मान, जिसे खो दिया है,
स्व-अहम् में,
बिताना चाहता हूँ, शेष जीवन
आत्म-चिंतन व ईश्वरीय-अनुभूति में.....!!
.............मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का.........!!
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