महर्षि नारद की तपस्थली "रुद्रप्रयाग"
महर्षि नारद की तपस्थली "रुद्रप्रयाग"
उत्तराखण्ड के पंचप्रयागों में से एक रूद्रप्रयाग का भी अपना ही महत्व है । रूद्रप्रयाग, ऋषिकेश से श्रीनगर होते हुए लगभग १४५ किमी० की दूरी पर स्थित यह सुन्दर स्थान है । अलकनन्दा और मंदाकिनी नदियों के संगम पर स्थित इस स्थान के बारे में मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं "रुद्रनाथ" के रुप में यहां विराजमान हैं । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अलकनन्दा और मंदाकिनी दोनों नदियों को बहनों की संज्ञा दी गई है, कहा जाता है कि अलकनन्दा गौरवर्ण व मन्दाकिनी श्यामवर्ण की थी जिसका अन्तर आज भी दोनों नदियों के पानी के रंगों में देखने को मिलता है ।
स्कन्दपुराण के केदारखण्ड के अनुसार इसी स्थान पर महर्षि नारद ने भगवान शिव की, एक पैर पर खड़े रहकर उपासना की थी जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महर्षि नारद को रुद्र रुप में आकर दर्शन दिये थे यही वह स्थान है जहां महर्षि नारद ने रुद्र रुप भगवान से संगीत की शिक्षा ली थी और यहीं पर भगवान शिव ने उन्हें वीणा प्रदान की थी । इस स्थान पर शिव और माता जगदम्बा के मन्दिर हैं जिनका बहुत धार्मिक महत्व है ।
उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा में रुद्रप्रयाग का अत्यधिक महत्व इसलिये भी है क्योंकि प्रसिद्द धाम श्री बद्रीनाथ एवम श्री केदारनाथ की यात्रा हेतु रास्ते अलग अलग यहीं से होते हैं । यह पूरा क्षेत्र विशाल प्रकृतिक सौन्दर्य, ताल, ग्लेशियर व धर्मिक महत्व के स्थानों के स्थानों से परिपूर्ण है । पहले रुद्रप्रयाग चमोली और टिहरी जिले का एक मिश्रित अंग था परन्तु अब यह उत्तराखण्ड के १३ जनपदों में से एक है ।
उत्तराखण्ड के पंचप्रयागों में से एक रूद्रप्रयाग का भी अपना ही महत्व है । रूद्रप्रयाग, ऋषिकेश से श्रीनगर होते हुए लगभग १४५ किमी० की दूरी पर स्थित यह सुन्दर स्थान है । अलकनन्दा और मंदाकिनी नदियों के संगम पर स्थित इस स्थान के बारे में मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं "रुद्रनाथ" के रुप में यहां विराजमान हैं । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अलकनन्दा और मंदाकिनी दोनों नदियों को बहनों की संज्ञा दी गई है, कहा जाता है कि अलकनन्दा गौरवर्ण व मन्दाकिनी श्यामवर्ण की थी जिसका अन्तर आज भी दोनों नदियों के पानी के रंगों में देखने को मिलता है ।
स्कन्दपुराण के केदारखण्ड के अनुसार इसी स्थान पर महर्षि नारद ने भगवान शिव की, एक पैर पर खड़े रहकर उपासना की थी जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महर्षि नारद को रुद्र रुप में आकर दर्शन दिये थे यही वह स्थान है जहां महर्षि नारद ने रुद्र रुप भगवान से संगीत की शिक्षा ली थी और यहीं पर भगवान शिव ने उन्हें वीणा प्रदान की थी । इस स्थान पर शिव और माता जगदम्बा के मन्दिर हैं जिनका बहुत धार्मिक महत्व है ।
उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा में रुद्रप्रयाग का अत्यधिक महत्व इसलिये भी है क्योंकि प्रसिद्द धाम श्री बद्रीनाथ एवम श्री केदारनाथ की यात्रा हेतु रास्ते अलग अलग यहीं से होते हैं । यह पूरा क्षेत्र विशाल प्रकृतिक सौन्दर्य, ताल, ग्लेशियर व धर्मिक महत्व के स्थानों के स्थानों से परिपूर्ण है । पहले रुद्रप्रयाग चमोली और टिहरी जिले का एक मिश्रित अंग था परन्तु अब यह उत्तराखण्ड के १३ जनपदों में से एक है ।
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