महान
दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि ज्ञान ही शक्ति है। इसलिए ज्ञान के माध्यम से
ही कोई व्यक्ति निराशा से बच सकता है। आश्चर्य तो यह है कि पशु व अन्य
जंतु निराशा से ग्रस्त नहीं हैं। वहीं ज्ञान से परिपूर्ण मानव ही ज्ञान का
अभ्यासी न होने के कारण सर्वाधिक निराशापूर्ण जीवन जी रहा है। इस संदर्भ
में सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि यह संसार द्वंदात्मक है। इसका आशय यह
है कि यहां सुख के साथ दुख और प्रेम के
साथ घृणा और मित्रता के साथ शत्रुता वैसे ही बंधी है, जैसे हर सिक्के के दो
पहलू होते हैं। इस समझ से संसार की तमाम समस्याएं हमें ज्यादा निराश नहीं
कर सकतीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह संसार का स्वभाव है, जैसे आग का स्वभाव है
जलाना। एक अन्य त्रुटि मानव करता है कि वह अपनी निराशा दूर करने या अपने
सुखों में वृद्धि के लिए ,वह जो प्रयास करता है, उनके गलत दिशा में जाने की
संभावना रहती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसे यह याद नहीं रहता है कि यदि वह
लाभ चाहता है, तो उसे इस शब्द को उल्टे क्रम में लिखकर आने वाले शब्द के
निहितार्थ पर अमल करना चाहिए। कहने का आशय है कि लाभ पाने के लिए व्यक्ति
को भला बनना चाहिए। यदि लाभ सदा चाहते हो, तो सदा को उल्टे क्रम से लिखकर
प्राप्त हुए शब्द यानी 'दास' शब्द के निहितार्थ पर अमल करना चाहिए। कहने का
निहितार्थ यह है कि व्यक्ति को किसी अन्य शख्स का नहींबल्कि ईश्वर का दास
बनना चाहिए।
बहरहाल, अहंकार मनुष्य की सबसे बड़ी बाधा है। इस कारण अनेक व्यक्ति ईश्वर का दास होने का पाखंड करते हैं। इसी कारण व्यक्ति दुखी और निराश होता है। वहीं यदि कोई चाहता है कि ईश्वर की उस पर 'दया' बरकरार रहे, तो उसे दया का उल्टा शब्द 'याद' के आशय को समझना होगा। यानी ईश्वर को हर क्षण याद करते रहें। यह भी स्मरण रखना होगा कि हम दूसरों को जो देते हैं, उसी की वर्षा 10 गुनी हम पर हो जाती है। अज्ञानता के वशीभूत होकर मानव अपने आसपास के लोगों पर दुख की वर्षा करता है। वह अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए अनैतिक कार्य करता है, परंतु ऐसा करके वह और दुखी हो जाता है। मनुष्य इस दुष्चक्र से तभी निकल सकता है, जब वह दूसरों का भला करे, उन्हें सुख दे और ईश्वर को याद रखकर नैतिक व्यवहार करे। तभी वह आनंद को महसूस कर सकता है।
बहरहाल, अहंकार मनुष्य की सबसे बड़ी बाधा है। इस कारण अनेक व्यक्ति ईश्वर का दास होने का पाखंड करते हैं। इसी कारण व्यक्ति दुखी और निराश होता है। वहीं यदि कोई चाहता है कि ईश्वर की उस पर 'दया' बरकरार रहे, तो उसे दया का उल्टा शब्द 'याद' के आशय को समझना होगा। यानी ईश्वर को हर क्षण याद करते रहें। यह भी स्मरण रखना होगा कि हम दूसरों को जो देते हैं, उसी की वर्षा 10 गुनी हम पर हो जाती है। अज्ञानता के वशीभूत होकर मानव अपने आसपास के लोगों पर दुख की वर्षा करता है। वह अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए अनैतिक कार्य करता है, परंतु ऐसा करके वह और दुखी हो जाता है। मनुष्य इस दुष्चक्र से तभी निकल सकता है, जब वह दूसरों का भला करे, उन्हें सुख दे और ईश्वर को याद रखकर नैतिक व्यवहार करे। तभी वह आनंद को महसूस कर सकता है।
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