शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

बेगम अख़्तर

बेगम अख़्तर (अंग्रेज़ी: Begum Akhtar, जन्म: 7 अक्तूबर, 1914 - मृत्यु: 30 अक्टूबर, 1974) भारत की प्रसिद्ध ग़ज़ल और ठुमरी गायिका थीं जिन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1968 में पद्म श्री और सन 1975 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। बेगम अख़्तर को मल्लिका-ए-ग़ज़ल भी कहा जाता है।

जीवन परिचय

उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में 7 अक्टूबर 1914 में जन्मी बेगम अख़्तर का बचपन के दिनों से ही संगीत की ओर रूझान था। वह पार्श्वगायिका बनना चाहती थी। उनके परिवार वाले उनकी इस इच्छा के सख्त खिलाफ थे लेकिन उनके चाचा ने बेगम अख़्तर के संगीत के प्रति लगाव को पहचान लिया और उन्हें इस राह पर आगे बढने के लिये प्रेरित किया। बेगम अख़्तर ने फ़ैज़ाबाद में सारंगी के उस्ताद इमान खां और अता मोहम्मद खान से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। इसके अलावा उन्होने मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा।[1]

आरंभिक जीवन

बचपन के दिनों में उस्ताद मोहम्मद खान और बेगम अख़्तर के बीच ऐसी घटना हुई कि बेगम अख़्तर ने गाना सीखने से मना कर दिया। उन दिनों बेगम अख़्तर सही सुर नही लगा पाती थीं। उनके गुरु ने उन्हें इसके बारे में कई बार सिखाया और जब वह नही सीख पाई तो उन्हें डांट दिया। इसके बाद बेगम अख़्तर रोने लगी और कहा हमसे नहीं बनता नानाजी, मैं गाना नहीं सीखूंगी। तब उनके उस्ताद ने कहा बस इतने में हार मान ली तुमने, नहीं बिट्टो ऐसे हिम्मत नही हारते, मेरी बहादुर बिटिया चलो एक बार फिर से सुर लगाने में जुट जाओ। उनकी यह बात सुनकर बेगम अख़्तर ने फिर से रियाज शुरू किया और सही सुर लगाये। तीस के दशक में बेगम अख़्तर पारसी थियेटर से जुड़ गईं। नाटकों में काम करने के कारण उनका रियाज छूट गया जिससे उनके गुरु मोहम्मद अता खान काफी नाराज हुये और कहा जब तक तुम नाटक में काम करना नही छोड़ती मैं तुम्हें गाना नहीं सिखाउंगा। उनकी इस बात पर बेगम अख़्तर ने कहा आप सिर्फ एक बार मेरा नाटक देखने आ जाएँ उसके बाद आप जो कहेंगे, मैं करूंगी। उस रात मोहम्मद अता खान बेगम अख़्तर के नाटक तुर्की हूर देखने गये। जब बेगम अख़्तर ने उस नाटक का गाना 'चल री मोरी नैय्या' गाया तो उनकी आंखों में आंसू आ गये और नाटक समाप्त होने के बाद बेगम अख़्तर से उन्होंने कहा बिटिया तू सच्ची अदाकारा है जब तक चाहो नाटक में काम करो।[1]

सिने कैरियर की शुरुआत

नाटकों में मिली शोहरत के बाद बेगम अख़्तर को कलकत्ता की ईस्ट इंडिया कंपनी में अभिनय करने का मौका मिला। बतौर अभिनेत्री बेगम अख़्तर ने 'एक दिन का बादशाह' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की लेकिन इस फ़िल्म की असफलता के कारण अभिनेत्री के रुप में वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना पाई। वर्ष 1933 में ईस्ट इंडिया के बैनर तले बनी फ़िल्म 'नल दमयंती' की सफलता के बाद बेगम अख़्तर बतौर अभिनेत्री अपनी कुछ पहचान बनाने में सफल रही। इस बीच बेगम अख़्तर ने अमीना, मुमताज बेगम (1934), जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर जैसी फ़िल्मों मे अपने अभिनय का जौहर दिखाया। कुछ समय के बाद वह लखनउ चली गई जहां उनकी मुलाकात महान निर्माता -निर्देशक महबूब खान से हुई जो बेगम अख़्तर की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये और उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया। वर्ष 1942 में महबूब खान की फ़िल्म 'रोटी' में बेगम अख़्तर ने अभिनय करने के साथ ही गाने भी गाये। उस फ़िल्म के लिए बेगम अख़्तर ने छह गाने रिकार्ड कराये थे लेकिन फ़िल्म निर्माण के दौरान संगीतकार अनिल विश्वास और महबूब खान के आपसी अनबन के बाद रिकार्ड किये गये तीन गानों को फ़िल्म से हटा दिया गया। बाद में उनके इन्हीं गानों को ग्रामोफोन डिस्क ने जारी किया गया। कुछ दिनों के बाद बेगम अख़्तर को मुंबई की चकाचौंध कुछ अजीब सी लगने लगी और वह लखनऊ वापस चली गईं।[1]

प्रसिद्ध फ़िल्में

  • अमीना (1934)
  • मुमताज बेगम (1934)
  • रूप कुमारी (1934)
  • जवानी का नशा (1935)
  • नसीब का चक्कर (1936)
  • अनारबाला (1940)
  • रोटी (1942)
  • दानापानी (1953)
  • एहसान (1954)
  • जलसा घर (1958)

अख़्तरी बाई से बेगम अख़्तर

1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी तब उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की, "सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली" लेकिन उन्होंने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्होंने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा। लेकिन जो तकदीर वो लिखा कर लायी थीं उससे कैसे लड़ सकती थीं। वो बिमार रहने लगीं और डाक्टरों ने बताया कि उनकी बिमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी की गायकी से दूर हैं। उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फ़िर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं। उन्होंने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिन्दी फ़िल्मों में भी गायकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में भी अपना परचम फ़हराया।[2]

फ़िल्मों में वापसी

रेडियो में गाना शुरू हुआ तो संगीत सम्मेलन में जाने लगीं और इसी बीच फ़िल्मों में भी वापसी हुई। महान संगीतकार मदन मोहन के कहने पर बेगम अख़्तर ने 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दानापानी' के गीत 'ऐ इश्क मुझे और कुछ याद नही' और 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'एहसान' के गीत 'हमें दिल में बसा भी लो' गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। पचास के दशक में बेगम अख़्तर ने फ़िल्मों मे काम करना कुछ कम कर दिया। वर्ष 1958 में सत्यजीत राय द्वारा निर्मित फ़िल्म 'जलसा घर' बेगम अख़्तर के सिने कैरियर की अंतिम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उन्होंने एक गायिका की भूमिका निभाकर उसे जीवंत कर दिया था। इस दौरान वह रंगमंच से भी जुड़ी रही और अभिनय करती रही।[1]

सम्मान और पुरस्कार

निधन

अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं के दिलों के तार झंकृत करने वाली यह महान गायिका 30 अक्तूबर 1974 को इस दुनिया को अलविदा कह गई। बेगम अख़्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हुई। मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की यह ग़ज़ल रिकार्ड की थी-
सुना करो मेरी जां, उनसे उनके अफसाने।
सब अजनबी हैं यहां, कौन किसको पहचाने॥

भारत (पुदुचेरी)


आज भी यहां फ्रांसिसी वास्तुशिल्प और संस्कृति देखने को मिल जाती है।
बंगाल की खाड़ी के पूर्व में स्थित केंद्रशासित प्रदेश है पुदुचेरी। भारत का यह प्रदेश करीब 300 साल तक फ्रांसिसी अधिकार में रहा। आज भी यहां फ्रांसिसी वास्तुशिल्प और संस्कृति देखने को मिल जाती है। पुराने समय में यह फ्रांस के साथ होने वाले व्यापार का मुख्य केंद्र था। आज अनेक पर्यटक खूबसूरत तटों और तत्कालीन सभ्यता की झलक पाने के लिए यहां आते हैं। केवल पर्यटन की दृष्टि से ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। इस कारण प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

पुदुचेरी के क्षेत्र में दक्षिण में फैले पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यनाम के वे क्षेत्र शामिल हैं जहां पहले फ्रांसीसियों का शासन था। पांडिचेरी इस प्रदेश की राजधानी है जो कभी भारत में फ्रांस के निवासियों का मूल मुख्याणलय हुआ करता था। यह 138 वर्षों तक फ्रांसीसी शासन के अधीन रहा। और 1 नवंबर 1954 को भारत में इसका विलय हो गया। इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी और शेष तीन तरफ तमिलनाडु है। पांडिचेरी से लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण में पूर्वी तट पर कराईकल है जबकि माहे पश्चिम मे केरल से घिरे पश्चिमी घाटों के मालाबार तट पर स्थित है। यहां पर कालीकट हवाई अड्डे से पहुंचा जा सकता है जो माहे से 70 किलोमीटर दूर है। यनाम आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले से सटा हुआ है और विशाखापत्तनम से 200 कि.मी. की दूरी पर है।


यहां की लगभग 24.37 प्रतिशत जनता कृषि और इससे संबंधित व्य वसायों में लगी है तथा इस क्षेत्र में 80.7 प्रतिशत कृषि भूमि में सिंचाई की सुविधाएं उपलब्धं हैं। धान मुख्यस फसल है। दलहन उत्पांदन में दूसरे नंबर पर है। माहे क्षेत्र का यहां की पौध-संपत्ति में प्रमुख योगदान है। नारियल, सुपारी और मसाले भी यहां उगाए जाते हैं। यनाम में उगाई जाने वाली दालें, मूंगफली तथा मिर्च यहां की वर्षा आधारित मुख्या व्याहपारिक फसलें हैं।
कुल 7,982 औद्यौगिक इकाइयों द्वारा 2,177.78 करोड़ रु. के सकल निवेश से 93,044 लोगों को रोजगार मार्च 2008 तक प्रदान किया गया। इन औद्योगिक इकाइयों के उत्पाकदन का कुल मूल्य3 13,455.34 करोड़ रु. निकाला गया था।
वित्तीय वर्ष 2006-2007 ( मार्च 2007 तक) के दौरान निर्यात उन्मुलख इकाइयों द्वारा निर्मित विभिन्न  उत्पाुदों के संदर्भ में निर्यात का मूल्य  901.06 करोड़ रु. रहा।
यूरोपीय संघ से सहायता के तहत कई तालाबों का सुधार किया गया है। शंकर परनी और पेन्नायर नदियों पर अनेक स्थाुनों पर 8 बेड बांध बनाए गए हैं। उपरोक्तड के अतिरिक्त् भूतल को पुन: ठीक करने के लिए बेड बांध के निर्माण के अनिवार्य प्रस्ताधव अराटचिकुप्प म, पेम्बियार, सेलीपेट के संकेंद्रण बिंदु पर वाडुकुप्परम के मलातार में पुडुचेरी में तथा कराइकनाल के मुलइयार, प्रवाडानायार और वंजीर एवं विलानुर में पुल एवं बेराज निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

केंदशासित प्रदेश पुदुचेरी की बिजली की जरूरतें केंद्र सरकार के बिजली उत्पागदन केंद्रों से अपना हिस्सास लेकर और पड़ोसी राज्यों  के बिजली बोर्डों - तमिलनाडु बिजली बोर्ड, केरल राज्यय बिजली बोर्ड से बिजली खरीदकर और पुदुचेरी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, कराइकल से पूरी की जाती है। इस प्रदेश की कुल बिजली उपलब्धीता 396.58 मेगावॉट है।
पुडुचेरी के लोक निर्माण विभाग द्वारा विभिन्नध श्रेणियों की लगभग 677.525 कि. मी. सड़कों का रखरखाव किया जाता है। सड़कों के सुधार और पुलों के निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

पुदुचेरी उपनगरीय क्षेत्रों में अवजल निकासी की एक योजना 4.48 करोड़ रूपये की लागत से चल रही है। सर्वेक्षण के बाद कराईकल में अंडर ग्राउंड ड्रेनेज स्कीकम पर काम चल रहा है। इस पर 34 करोड़ रूपये की लागत आएगी। सी.एस.एस. के अंतर्गत 2.47 करोड़ रूपये की लागत से भारती पार्क को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताोव है। बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए लाजपेट तथा डुबरेपेट में नए अवजल शोधन संयंत्रों को चलाया जा रहा है।

पर्यटन - पुदुचेरी में भारतीय और फ्रेंच संस्कृति की एक साथ दर्शन होते हैं। यहां के स्मारक इतिहास से रूबरू कराते हैं तो वहीं मंदिर मन को श्रद्धा से भर देते हैं।

श्री अरबिंदो आश्रम, पुडुचेरी
चेन्ननई के दक्षिण में 160 कि.मी. की दूरी पर‍ स्थित पुदुचेरी (तमिल में पोडुचेरी के नाम से जाना जाता है)। यह प्रारंभिक अठारहवीं सदी से फ्रांस का एक उपनिवेश रहा है। यह एक दिलकश भारतीय शहर है जिसमें सुद्र के अतिरिक्त. फ्रांस की सांस्कृशतिक विरासत के जीवंत नमूने तथा एक आश्रय मौजूद है। अन्यं फ्रांसीसी स्थ्लों—कराईकल (तमिलनाडु), माहे (केरल), यनाम (आंध्र प्रदेश), को मिलाकर पांडिचेरी केंद्रशासित प्रदेश बना है। इस नगर की खासियत यहां की सुनियोजित नगर योजना तथा फ्रांसीसी-तमिल वास्तुाकला का संगम है। यह शहर फ्रांस के 18 वीं सदी के किलेबंद समुद्रतटीय शहर ‘बास्टािइड के नमूने पर बना है।
पुदुचेरी का प्रसिद्ध संतों की भूमि के रूप में प्रसिद्ध होने, रोम तथा यूनान के साथ प्राचीन व्याचपारिक संबंध होने, फ्रांसीसी भारत की एक समय राजधानी होने तथा आध्याात्मिक शाक्ति को केंद्र होने का कारण पांडिचेरी के उथले पानी, नदियों, समुद्री तटों तथा दूसरे क्षेत्रों में पर्यटकों के लिए प्रचुर पर्यटन संसाधन उपलब्धू है। पूर्व तथा पश्चिम संस्कृाति से प्रभावित पांडिचेरी में हस्त्शिल्प  से तैयार चमड़े की वस्तु एं, मिट्टी के बरतन, हाथ से तैयार कागज, धूप तथा पुराना औपनिवेशिक फर्नीचर आदि अनोखी वस्तुरएं मिलती हैं। हमारे पहले प्रधानमंत्री स्वेर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पांडिचेरी को ‘फ्रांसीसी संस्कृमति की खिड़की’ कहा था।

ऑरोविले
महान संत, कवि तथा भारतीय आध्या त्मिकता के महान प्रवर्त्तक श्री अरविंद अपने जीवन के अंत तक अपनी दृष्टि तथा विचारों का प्रसार करते रहे। उनका आश्रम आज भी अपनी खास जीवन शैली के कारण विश्वव-भर से लोगों को आकर्षित करता है।
आध्यात्म की भूमि
जीवन की भागदौड़ से थक चुके लोग जो शांति व आध्यात्म की तलाश में हैं, उनके लिए पुदुचेरी बिल्कुल सही जगह है। प्राचीन काल से ही पुदुचेरी वैदिक संस्कृति का केंद्र रहा है। यह महान ऋषि अगस्त्य की भूमि है। पुदुचेरी की आध्यात्मिक  शक्ति 12वीं शताब्दी में और बढ़ी, जब यहां अरविदों आश्रम की स्थापना हुई। प्रतिवर्ष सैकड़ों लोग सुकून की तलाश में यहां आते हैं।

पेराडाइज बीच
यह बीच शहर से 8 किमी. दूर कुड्डलोर मेन रोड के पास स्थित है। इस बीच के एक ओर छोटी खाड़ी है। यहां केवल नाव द्वारा ही जाया जा सकता है। नाव पर जाते समय पानी में डॉल्फिन के करतब देखना एक सुखद अनुभव है। यहां का वातावरण देखकर इसके नाम की सार्थकता का अहसास होता है। यह वास्तव में स्वर्ग के समान है।

ऑरोविल्ले बीच
जैसा कि नाम से ही जाहिर है यह बीच ऑरोविल्ले के पास स्थित है। पुदुचेरी से 12 किमी. दूर इस तट का पानी अधिक गहरा नहीं है। इसलिए पानी में तैरने के शौकीनों के लिए यह बिल्कुल सही जगह है। सप्ताहांत में यहां वक्त बिताना लोगों को बहुत भाता है। उस दौरान यहां बहुत भीड़ रहती है। बाकी दिन यहां ज्यादा भीड़भाड़ नहीं होती।

पार्क स्मारक (आयी मंडपम)
पुदुचेरी के बीचों बीच स्थित यह सरकारी पार्क यहां का सबसे खूबसूरत सार्वजनिक स्थान है। यहां का मुख्य आकर्षण पार्क के केंद्र में बना आयी मंडपम है। इस सफेद इमारत का निर्माण नेपोलियन तृतीय के शासन काल में किया गया था। यह ग्रीक-रोमन वास्तु शिल्प का उत्कृष्ट नमूना है। इस जगह का नाम महल में काम करने वाली एक महिला के नाम पर रखा गया था। उस महिला ने अपने घर के स्थान पर एक जलकुंड बनाया था। कभी नेपोलियन ने यहां का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई थी और वह इससे खुश होकर स्मारक का नाम आयी मंडपम रखा।

अरिकमेडु
यह ऐतिहासिक जगह पुदुचेरी के 4 किमी. दक्षिण में स्थित है। यह स्थानीय लोगों के रोमन कॉलोनियों के साथ व्यापार का प्रतीक है। यह व्यापार ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में होता था। यहां स्थानीय व्यापारी वाइन का आयात करते थे और इसके बदले में कपड़ा, बहुमूल्य रत्न और आभूषण निर्यात करते थे। अभी भी यहां 18वी. शताब्दी में निर्मित फ्रेंच जेसूट मिशन हाउस के खंडहर देखे जा सकते हैं। यह हाउस 1783 में बंद कर दिया गया था।

आनंद रंगा पिल्लई महल
जब यहां फ्रेंच का शासन था, तब आनंद रंगा पिल्लई पुदुचेरी के गवर्नर थे। उनके द्वारा लिखीं डायरियां 18वी. शताब्दी के फ्रेंच और भारत संबंध के बारे में जानकारी देती हैं। यह महल दक्षिणी भाग पर बची हुई कुछ प्राचीन इमारतों में से एक है। इसका निर्माण 1738 में किया गया था। इसका वास्तुशिल्प भारतीय और फ्रेंच शैली का अनूठा मिश्रण है।

डुप्लेक्स की प्रतिमा
फ्रेंकॉइस डुप्लेक्स पुदुचेरी के गवर्नर थे जो 1754 तक इस पद पर रहे। 1870 में इनके द्वारा किए गए कार्यो को देखते हुए इन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने के उद्देश्य से दो प्रतिमाओं की स्थापना की गई थी। एक फ्रांस में और दूसरा पुदुचेरी में है। 2.88 मी. ऊंची ग्रेनाइट से निर्मित यह मूर्ति गौवर्ट एवेन्यू पर स्थित है।

विल्लन्नूर
श्री गोकिलंबल तिरुकामेश्वर मंदिर पुदुचेरी से 10 किमी. दूर है। दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव के दौरान यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। यह ब्रह्मोत्सव मई-जून के बीच मनाया जाता है। इस उत्सव में मंदिर के 15 मी. ऊंचे रथ को खींचा जाता है। हजारों भक्तों द्वारा रथ खींचे जाने का दृश्य अदभूत होता है। पुदुचेरी के उपराज्यपाल भी इस यात्रा में भाग लेते हैं। सर्वधर्म समभाव की प्रतीक यह यात्रा फ्रेंच शासन काल के दौरान भी होती थी। उस समय गवर्नर फ्रेंच स्वयं इस रथ को खींचते थे। इसके अलावा यहां 10 हैक्टेयर में फैली ऑस्टेरी झील है जहां पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।

पुदुचेरी के आसपास दर्शनीय स्थल
शिंजी

पुदुचेरी के उत्तर पश्चिम में स्थित विल्लुपुरम जिले में इस क्षेत्र का सबसे सुंदर और आकर्षक किला शिंजी है। 800 फीट ऊंचा यह विशाल किला तीन पहाड़ियों (राजगिरी, कृष्णागिरी और चंद्रायन दुर्ग) तक फैला है। किले का मुख्य हिस्सा राजगिरी पहाड़ पर है जो तीनों पहाड़ों में से सबसे बड़ा है। किले के अंदर अन्नभंडार गृह, शस्त्रागार, टैंक और मंदिर है। इसका प्रवेश द्वार कल्याण महल के सामने है। करीब 700 मी. की ऊंचाई पर एक पुल है जो किले को अन्य इमारतों से जोड़ता है। इतनी ऊंचाई से नीचे शिंजी नगर को देखना रोमांचित कर देता है। उचित शुल्क देकर आप इस ऐतिहासिक किले को करीब से देख सकते हैं।

चिदम्‍बरम
यह जगह पुदुचेरी के दक्षिण में राष्ट्रीय राजमार्ग 45ए पर स्थित है। चिदम्‍बरम शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां शिव की शुभनायक नटराज अवतार की पूजा होती हैं। इस मंदिर का निमार्ण 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच हुआ था। कहा जाता है कि 10वीं शताब्दी में चोल राजा परांतका प्रथम ने इस मंदिर को सोने से ढक दिया था जिसके बाद सूरज की रोशनी में मंदिर जगमगाता रहता था। मंदिर में शिवजी की अक्ष लिंगम रूप में भी पूजा की जाती है। 

(अरविन्द कु .पाण्डेय)

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

विकास पर भारी सियासत


भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है। लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर लगी है। हर संकेत खतरे का है-खर्च, कर्ज, घाटा, महंगाई, और ईएमआइ सब कुछ बढ़ता जा रहा है, जबकि विकास दर गिर रही है। इससे राजनीतिक दल परेशान नहीं हैं। संसद, जहां से प्रशासन का संचालन होता है, ठप रही। खबरिया चैनलों पर नेताओं के बीच होने वाले वाद-विवाद किसी रियलिटी शो की तरह हो गए। राजनीतिक भाषणों का आधार ही अपनी तारीफ रह गया।

झटका राजनीति के बीच अर्थव्यवस्था का दम निकल रहा है और यह हलाल होने की स्थिति में आ गई है। सकल घरेलू उत्पाद पिछली नौ तिमाहियों से हर बार गिर रहा है और दशक में सबसे नीचे तक गिरने के संकेत दे रहा है। सकल बचत 36.8 फीसद से 32.3 फीसद रह गई है और सकल निवेश 38 से 35 फीसद ही रह गया है। सिर्फ तीन महीनों में ही घाटा 1.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो प्रणब मुखर्जी के बजट में साल भर में 5.13 लाख करोड़ था। सब्सिडी घटाने के बाद भी सिर्फ खाद्य, ईंधन और खाद सब्सिडी से ही 2.5 लाख करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है।

यह हैरानी की बात नहीं है कि 2008 से 2012 के बीच 2.5 लाख करोड़ का कर्ज दोगुना होकर 5.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वर्ष 2008-09 में सरकार 750 करोड़ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कर्ज ले रही थी। इस साल का ही इसका कर्ज 1560 करोड़ रुपये है। इसमें से आधे से ज्यादा तो ब्याज चुकाने में ही चला गया। जाहिर है कि इस राजनीतिक फिजूलखर्ची की कीमत अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।

यह गली के नुक्कड़ पर खड़े आम आदमी को भी दिखाई दे रहा है। बैंक की बचत दर महंगाई दर से भी कम है। म्युचुअल फंड में निवेश की कीमत गिर रही है, वेतन बढ़ नहीं रहा, जबकि जीवनयापन की लागत बढ़ती जा रही है। नौकरियों की लाइन लगी है, लेकिन अवसर कम होते जा रहे हैं। पिछले हफ्ते ही सरकार ने खुलासा किया था कि 2007 से 2012 के दौरान वह सिर्फ 17,571 किलोमीटर सड़कें ही बना पाई, जबकि लक्ष्य 48,479 किलोमीटर का था। 77,000 मेगावाट की जगह सिर्फ 55,000 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो पाया और 21,000 किलोमीटर पटरियां बिछाने का काम सिर्फ 15,752 किलोमीटर तक ही हो पाया।

अब निवेश, रोजगार और विकास की गति दोबारा पकड़ने के लिए कुछ फैसलों की जरूरत है। व्यवस्थागत कमी और राजनीतिक अक्षमता दो कानूनों में साफ दिखाई देती है, भूमि अधिग्रहण विधेयक और नया कंपनी एक्ट। इसके अलावा स्थायी और वित्तीय समितियों से मंजूरी मिलने के बाद भी 35 विधेयक अपने कानूनीजामा पहनने की बाट जोह रहे हैं।

बिलावजह की अनदेखी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़नी ही थी। 25 अप्रैल को ही अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ने भारत की रेटिंग नकारात्मक कर डाली। फिर 18 जून को फिच ने भी ऐसा ही किया। एसएंडपी ने नीतिगत लकवे के लिए सरकार में वैचारिक मतभेद को जिम्मेदार ठहराया और चेतावनी दी कि 'घटती जीडीपी और बढ़ते राजनीतिक गतिरोध के चलते भारत की निवेश साख भी गिर सकती है' और शायद ब्रिक देशों में ऐसा पहला हादसा भारत के साथ होगा। इसका मतलब है कि भारत बहुत लंबे समय तक विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं रहेगा। जिन वैश्विक कंपनियों ने भारत में निवेश किया है वे भी जाती रहेंगी और सरकार का कर्ज किसी नए निवेशक को आने नहीं देगा। जंक रेटिंग के डर से ही सरकार ने पिछले हफ्ते डीजल के दाम बढ़ा दिए। फिर उड्डयन, डीटीएच और मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दे डाली। इनसे ठोस नतीजों के बजाय बाजार को सुधार के संकेत जाने थे। हालांकि तर्क दिया जा सकता है कि जीडीपी इस वक्त आइसीयू में है और सरकार अब भी बैंड-एड लगाने जैसे उपचार ही कर रही है।

यह राजनीतिक वाद-विवाद का विषय है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की तुलना में दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में मुद्दा यह है कि लोगों को रोजगार कैसे दिए जाएं, अमेरिकियों के जीवनस्तर में सुधार कैसे लाया जाए और फिर विकास दर कैसे बढ़ाई जाए। हमारे यहां राजनीति आरोप-प्रत्यारोप के उद्योग में बदल चुकी है। किसी भी राजनीतिक दल में जमीनी हकीकत का सामना करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती। सारी राजनीतिक बिरादरी किसी भी तरह के सुधार के खिलाफ एकजुट हो गई है। कांग्रेस को 2004 से ही लग रहा था कि उसके पास अलादीन का चिराग है। नतीजतन इसने सब्सिडी जारी रखी और मनरेगा जैसी योजनाओं को बढ़ावा देती रही। भाजपा ने 1998-2004 के दौरान परंपराएं तोड़ते हुए कुछ सुधार किए। आज जितना कर्ज है उससे अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं रह सकती और यदि यही विकास दर रही तो उससे सामाजिक स्थिरता नहीं बनी रह सकती। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारना ही होगा। इसे अपने खर्च पर लगाम लगानी होगी या फिर पैसों के लिए सोना-चांदी बेचना पड़ेगा। सब्सिडी खत्म की नहीं जा सकती, खर्च कम हो नहीं सकते और कांग्रेस सहित सभी दल विनिवेश के विरोध में हैं। अब लाख टके का सवाल यह है कि बिना सुधारों के अर्थव्यवस्था गति कैसे पकड़ेगी।

अर्थव्यवस्था सियासत के पेंच में फंसी हुई है। इसका सारा दोष अपने नेताओं को चुनने वालों और इस तंत्र को जाता है। 1991-96 के दौरान नरसिंह राव सरकार ने नवउदारवादी आर्थिक सुधारों से देश को शर्मसार होने से बचाया था। 1998 में कांग्रेस ने इन सुधारों पर रोक लगा दी। इसने यह स्थापित करने के लिए एके एंटनी की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित कर दी कि ये सुधार गरीब-विरोधी थे। 2004 तक राजग सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति दी और उच्च ब्याज दरों के साथ विकास दर भी अच्छी बनाए रखी, लेकिन दुर्भाग्य कि चुनाव हार गई।

लिहाजा, राजनीतिक बिरादरी ने लब्बोलुआब यह निकाला कि विकास दर के लिए कोई वोट नहीं देता। इसलिए उन्होंने अब कोई गलती नहीं करने की ठानी। अच्छे प्रशासन के लिए जरूरी है कि सरकार विकास दर भी अच्छी बनाए रखे और फिर इससे मिलने वाले लाभ का समान रूप से वितरण करे। किन्हीं कारणों से सियासी जमात के एक बड़े वर्ग ने यह मान लिया कि विकास दर की दौड़ और समानता दोनों ही परस्पर अलग हैं। उनके दिमाग से यह निकल गया कि बिना विकास के उनके पास बांटने को सिर्फ गरीबी होगी।
(लल्लूजी)

गरीब के लिए ‘भगवान’ भी दुर्लभ

धर्म को यूं ही अफीम की संज्ञा नहीं दी गई है. यही वजह है कि अब धर्मस्‍थान भी भक्ति के बाजार का रूप ले चुके हैं. हर क्षेत्र की तरह यहां पर भी बिचौलियों की पूरी टीम काम कर रही है. जो गरीब लोगों को भगवान का डर दिखाकर अपना उल्‍लू सीधा कर रहे हैं. पिछले दिनों अक्षरधाम मंदिर जाना हुआ. मंदिर की विशालता हो या फिर स्‍वर्णमंडित प्रतिमा हर तरफ शांति तो थी, लेकिन भक्ति भाव चाहकर भी मन में नहीं आया. सोचा अरबों-खरबों के इस मंदिर की जगह कोई अस्‍पताल बनाया गया होता तो न जाने कितने गरीब लोगों का भला हो जाता. मंदिर में पानी की बोतल से लेकर मोबाइल, कैमरा कुछ भी ले जाना अलाउ नहीं है. ऐसा सिक्‍योरिटी रीजंस के अलावा इसलिए किया गया है ताकि लोगों को पानी के लिए भी पैसा खर्च करना पड़े. फोटो खींचने के लिए मंदिर के ही कैमरामैन नियुक्‍त किए गए हैं. मंदिर के विभिन्‍न क्षेत्रों में घूमने की जानकारी लेने के लिए भी आम लोगों को पांच रुपए खर्च करने पड़ते हैं. मंदिर के दूसरे सेक्‍़शन में वही लोग घूम सकते हैं जो इसके लिए ढाई सौ से ज्‍यादा रुपए खर्च करने की औकात रखते हों. अब बात करते हैं यहां के रेस्‍टोरेंट की मंदिर के हर खंबे के पास दान पेटी पर आपको भारतीय संस्‍कृति का पाठ पढ़ने को जरूर मिलेगा लेकिन रेस्‍टोरेंट में चाउमिन-मंचूरियन सब अवेलेबल है. यह खाना खासा मंहगा होने के साथ ही लो-क्‍वालिटी भी लगता है. आम आदमी यहां सब से कम मूल्‍य में केवल खिचड़ी खा सकता है और उसके लिए भी 45 रुपए खर्च करने पड़ेंगे. जितने उत्‍साह से हम यहां गए थे उतनी ही निराशा हाथ लगी. हर जगह का यही हाल है. अब शनि सिंगणापुर को ही ले लें. यहां पर भगवान शनि के नाम पर डराने वाले आपको आसानी से मिल जाएंगे. यहां तक कि प्रसाद लेते समय भी भक्‍तों को धमकाते हुए कहा जाता है कि 501 रुपए से कम का प्रसाद लोगे तो अनिष्‍ट हो जाएगा, एक्‍सीडेंट हो जाएगा, शनि महाराज रुष्‍ट हो जाएंगे. यह तो हद है, ऐसे में एक गरीब भक्‍़त भले ही कम पैसे का प्रसाद खरीदे, लेकिन अनिष्‍ट का डर हमेशा उसके मन में बना रहेगा. श्री वैष्‍णों देवी मंदिर दर्शन के लिए जाने पर भी कुछ इसी तरह के कढ़वे अनुभव अक्‍सर सामने आते रहे हैं. कुछ महिनों पहले अल्‍मोड़ा के जागेश्‍वर धाम जाना हुआ तो वहां पर भी यह सब आम दिखा. मंदिर के पुरोहित भी उसी भक्‍त से आत्‍मीयता दिखाते हैं जो ज्‍यादा चढ़ावा देता है. यही नहीं हर मंदिर में पूजा करने वाले पंडित जी किसी दूसरे मंदिर के पंडित जी के रिश्‍तेदार ही होते हैं, ऐसे में वह यह कहना नहीं भूलते कि फलां मंदिर में जरूर जाना और हर मंदिर में दक्षिणा के नाम पर होने वाली वसूली आम बात है. धर्मनगरी हरिद्वार तो मात्र कहने को ही धर्मनगरी रह गई है. पतित पावनी गंगा के किनारे आपको पापियों की फौज आसानी से देखने को मिल जाएगी. बिना पैसा खर्च किए तो आप खुद के कपड़े भी गंगा किनारे नहीं रख सकते. यहां पर भी लूट के अलग-अलग तरीके हैं. पहले तो प्‍यार से पुचकार कर तख्‍ते पर बैठी कोई महिला या पुरुष आपको कहेंगे कि अपना सामान यहां पर रख लो. जब आप स्‍नान कर अपना सामान लेने आएंगे तो सामान संभाल कर रखने की फीस मांग ली जाएगी. आपने थोड़ा भी ऊंची आवाज में बात की तो इनके दूसरे साथी भी आपकी इज्‍ज्‍त उतारने के लिए आ पहुंचेंगे. यही नहीं मुख्‍य मंदिर में पहुंचने से पहले आपको कई छोटे मंदिरों पर मत्‍था टेकने के साथ ही अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ेगी. यहां पर कई जगह अपनी दुकानें सजाकर बैठे हुए पंडित जी आपसे पूछेंगे ‘विशेष पूजा कराएंगे क्‍या? पंडित जी भक्‍तों को कुछ इस तरह डराते हैं कि अनमने भाव से ही सही भक्‍त परमिशन दे देता है. पंडित जी मन ही मन खुश होते हैं कि चलो आज बकरा फंसा. पंडित जी कुछ मंत्रों का उच्‍चारण करते हैं. यह सब बमुश्किल पांच मिनट तक चलता है, क्‍योंकि लाइन में दूसरे बकरे भी खड़े होते हैं. तीन-चार मिनट होते ही पंडित जी पूजा की पूरी कीमत वसूल लेते हैं. यही नहीं इन जगहों पर भक्‍तों के साथ होने वाली बदसलूकी भी आम है. एक गरीब आदमी के लिए तो भगवान के दर्शन भी सुलभ नहीं रह गए हैं. लालच के अंधों ने भगवान के दर को भी पैसे कमाने का धंधा बना लिया है. जरा सोचिए जो गरीब लोग किसी तरह पाई-पाई जोड़कर इन स्‍थानों तक पहुंचते हैं, उन्‍हें इस तरह के व्‍यवहार से कितनी ठेस पहुंचती होगी. इस तरह के अनुभव को भले ही लोग कभी शेयर न करें, लेकिन यह सच है कि हर आदमी कभी न कभी इसे महसूस करता है. सबसे दुखद् यह है कि हम इस लूट-खसोट का कभी विरोध नहीं करते. असहाय लोगों की मदद की बात आती है तो हम बचने के लिए कई बहाने खोज लेते हैं, लेकिन धार्मिक स्‍थानों पर जाकर जेब कटवाने में हमें कोई दिक्‍कत नहीं होती.
(लल्लूजी )

नैतिकता के ठेकेदार

बीते दिनों पंजाब के जालंधर में घटी घटना ने पुलिस व्यवस्था को प्रश्नों के कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। नैतिकता के नाम पर उन्होंने एक युवती को इस कदर लज्जित और प्रताडि़त किया कि वह आत्महत्या करने पर विवश हो गई। वह भी सिर्फ इसलिए कि वह अपने पुरुष मित्र के साथ कार से जा रही थी और एक अन्य कार से उनकी टक्कर हो गई। दुर्घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस को दुर्घटना के कारणों एवं उससे संबंधित नियम-कायदों का पालन करते हुए कार्रवाई करनी चाहिए थी, इसके बजाय उसने छात्रा और उसके दोस्त को अपमानित करने में अपनी दिलचस्पी दिखाई और बेहद पीड़ाजनक तथ्य यह है कि इस पूरे कृत्य में एक महिला पुलिस अधिकारी भी शामिल थी। क्या कानून के पहरेदार जानते हैं कि नैतिकता के मायने क्या हैं या महज अपने पद और अधिकारों की धौंस जमाने के लिए आम लोगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करना उनकी कार्य व्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है। क्या इस देश में आज भी किसी लड़के के साथ बैठना अनैतिक है? इस घटना से ऐसा ही प्रतीत होता है। बीते दशकों में सामाजिक ताने-बाने में एक आमूलचूल परिवर्तन हुआ है और स्ति्रयां न केवल शिक्षा के लिए, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए घर से बाहर निकली हैं। कॉलेज में साथ पढ़ रहे या एक ही ऑफिस में काम कर रहे दो लोगों के बीच दोस्ती स्वाभाविक सी बात है।



भागती दौड़ती जिंदगी के बीच अपने मन की बातों को बांटने के लिए किसी जगह बैठकर बात करना कैसे अनैतिक हो सकता है? और अगर एक पल को मान लिया जाए कि वह संबंध मित्रता से कहीं अधिक है तो क्या यह अनैतिक है? दरअसल, हमारा समाज दोहरी मानसिकता का शिकार है। प्रेम गीतों में झूमते, माता-पिता के विरुद्ध जाकर विवाह करते हुए फिल्मी पात्रों को देखकर तालियां बजाने वाला समाज स्त्री और पुरुष की मित्रता को अपराध मानता है। नैतिकता का ढोल पीटने वाला समाज स्वयं नैतिकता को परिभाषित करने में अक्षम है। बीते कुछ वर्षो में नैतिकता के प्रश्न ने संवेदनशील वर्ग से लेकर कानूनवेत्ताओं को उलझा कर रख दिया है। शायद ही ऐसा कोई दिन बीतता होगा जब नैतिकता के मापदंड पर किसी के अस्तित्व को खारिज न किया गया हो। यह सच है कि नैतिकता के बगैर समाज बिखर जाएगा पर प्रश्न फिर खड़ा होता है कि नैतिकता के वास्तविक मायने क्या हैं? क्या इसका अर्थ इतना तुच्छ है कि वह किसी के जीवन पर भारी पड़ सकता है या फिर नैतिकता समाज के लिए वह शस्त्र है जिसे अपनी प्रभुत्वशीलता और स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। क्या अनैतिक है और क्या नैतिक इसका निर्धारण कौन करेगा? समाज? अगर ऐसा है तो यह सभी जगह एक रूप में लागू होना चाहिए। पर ऐसा नहीं है क्योंकि नैतिकता की रटी-रटाई परिभाषा नहीं है और न ही हो सकती है। वास्तविकता तो यह है कि नैतिकता व प्रतिष्ठा ऐसे सामाजिक मानदंड हैं जो समयानुसार परिवर्तित होते रहते हैं और अगर ऐसा न हो तो मनुष्य का विकास रुक जाएगा। इस सत्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय पुरुष सत्तात्मक समाज में नैतिक होने का संपूर्ण दायित्व स्त्री का है और अगर ऐसा नहीं है तो क्यों एक ही घटना के लिए पुरुष को मुक्ति और स्त्री को कटघरे में खड़ा किया जाता है।

स्कूल और कॉलेज से सीधे घर आने की ताकीद हर सुबह बेटियों को दी जाती है और अगर अपवादस्वरूप कुछ अभिभावक अपनी बेटियों को इस बंधन से मुक्त रखते हुए अपने बेटों के समकक्ष ही स्वतंत्रता देते हैं तो यह न तो समाज के नैतिकता के ठेकेदारों को स्वीकार्य होता है और न ही हमारी पुलिस व्यवस्था को, जो आज भी यह मानती है कि स्त्री और पुरुष में मित्रता नहीं हो सकती। हम यह समझना होगा कि दो वयस्क लोगों के बीच मित्रता और प्रेम किसी भी रूप में अनैतिक नहीं हो सकता। अगर हम आज भी नैतिकता की इन संकीर्ण गलियों में घूमते रहेंगे तो सांस लेना भी दुश्वार हो जाएगा।

यहां कुपोषण की किसे परवाह

दुनिया के 90 प्रतिशत कुपोषित बच्चे 36 देशों में रहते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। इससे ज्यादा अपफसोस की बात यह है कि कुपोषण के मामले में भारत पौष्टिकता के पैमाने के निचले पायदान पर अंगोला, कैमरून, कांगो और यमन जैसे देशों के साथ है। अब दूसरा पहलू देखिए कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में हैं। गौर करने वाली बात यह है कि हम इन सभी से ज्यादा तेज गति से आर्थिक तरक्की कर रहे हैं। यानी दो दशकों के दौरान भारत ने जो आर्थिक विकास किया है वह बच्चों को पोषित करने में तब्दील नहीं हो सका है। यही कारण है कि भारत में लगभग आधे बच्चे अंडरवेट और अपनी उम्र के अनुरूप विकसित नहीं हैं।



70 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं और बच्चे गंभीर पौष्टिकता की कमी का सामना कर रहे हैं, जिसमें एनीमिया भी शामिल है। यह तथ्य विश्व के पहले पौष्टिक पैमाने न्यूट्रीशन बैरोमिटर में सामने आया है, जिसे सेव द चिल्ड्रन ने 20 सितंबर को ही जारी किया है। इस रैंकिंग में 36 देशों की सरकारों की परपफॉर्र्मेस का मूल्यांकन किया गया था। इस संस्था ने 36 देशों की सरकारों की इस आधार पर समीक्षा की है कि वे कुपोषण को दूर करने के प्रति कितनी समर्पित हैं और उसके नतीजे क्या निकले हैं। अध्ययन में इस बात की भी तुलना की गई है कि सरकारें कुपोषण को दूर करने और बाल मृत्यु दर को कम करने के लिए किस किस्म के प्रयास कर रहीं हैं। अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत का शानदार आर्थिक विकास अधिकतर बच्चों को कुपोषण से बचाने में नाकाम रहा है।

आंकड़ों के अनुसार भारत के आधे से ज्यादा बच्चे अपनी आयु के अनुरूप वजन और कद भी हासिल नहीं कर सके हैं, जबकि 70 फीसद से अधिक महिलाओं व बच्चों को उन बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, जो सीधे कुपोषण से जुड़ी हैं। यह पहला अवसर नहीं है, जब भारत की सामाजिक सच्चाई के संदर्भ में इतनी निराशाजनक तस्वीर सामने आई है। निश्चित रूप से यह शर्म की बात है कि जो देश आर्थिक दृष्टि से प्रगति कर रहा हो और अंतरराष्ट्रीय मंच पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनने का सपना देख रहा हो, उसी देश में कुपोषण की स्थिति अफ्रीका के गरीब देशों जितनी ही बदतर हो। दरअसल, तथ्य यह है कि अगर देश की चिंताजनक गरीबी को दूर करने की कोशिशें नहीं की जाएंगी तो न सिर्फ हमारा आर्थिक विकास प्रभावित होगा, बल्कि हमारी महत्वाकांक्षाएं भी धरी की धरी रह जाएंगी। सेव द चिल्ड्रन के अध्ययन में बताया गया है कि किस तरह हमारे बच्चों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है।

अनेक सरकारी योजनाएं भी गरीबों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर नहीं कर पाई हैं। सवाल यह है कि इस समीक्षा पर हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? गौरतलब है कि जब कुछ सप्ताह पहले यह रिपोर्ट सामने आई थी कि गुजरात में महिलाएं और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका को दिए साक्षात्कार के दौरान ऐसी गैर जिम्मेदाराना बात कही थी कि गुजरात की लड़कियां फिगर-कॉन्शियस हैं, इसलिए कम खाने की वजह से कुपोषण का शिकार हो रही हैं। जबकि तथ्य यह है कि गरीबी के कारण गुजरात और देश के अन्य राज्यों में बच्चे और महिलाएं कुपोषण की शिकार हो रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया न तो नरेंद्र मोदी की तरह गैर जिम्मेदाराना होनी चाहिए और न ही नकारात्मक। सरकार को इस अध्ययन को गंभीरता से लेना चाहिए और देश के गरीबों का पेट भरने की जो चुनौती है उसे स्वीकार करना चाहिए। अगर भ्रष्टाचार की वजह से सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा है तो इस भ्रष्टाचार के खिलाफ ही पहले सख्त कदम उठाने चाहिए। दरअसल, रिपोर्ट में ऐसा कुछ नया नहीं कहा गया है, जिसे लोग जानते न हों।

बिना रिपोर्ट के भी हर व्यक्ति यह जानता है कि गरीब घरों के बच्चों को रईस घरों के बच्चों की तुलना में कुपोषण के कारण कद और वजन में कमी आने का खतरा दोगुना ज्यादा होता है, लेकिन चिंता की बात यह भी है कि रईस 20 प्रतिशत जनसंख्या में भी 5 में से एक बच्चा कुपोषित है। उन्हें तो भरपेट खाना मिलता है। तब वे क्यों कुपोषण के शिकार हो रहे हैं? इसकी वजह पौष्टिक भोजन की कमी और जंक फूड। इसलिए यह भी जरूरी है कि जंक फूड पर नियंत्रण करने के कदम उठाए जाएं और बच्चों को पौष्टिक भोजन खाने के लिए प्रेरित किया जाए। यह सब तभी हो सकता है जब सरकार अपनी योजनाओं को ईमानदारी से लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाए। सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि सरकार की इच्छाशक्ति में कमी है और इसलिए नतीजे भी आशानुरूप सामने नहीं आ रहे हैं। गौरतलब है कि 1990 में 120 लाख बच्चे अपने पांचवे जन्मदिन से पहले ही मर गए थे। इस संख्या को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2011 में कम करके 69 लाख तक ले आया गया है। इस सकारात्मक ट्रेंड के बावजूद बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करने के प्रयास बहुत कमजोर रहे हैं।

2011 में जो कुल बाल मृत्यु हुईं, उनमें से एक तिहाई यानी 23 लाख कुपोषण की वजह से ही हुईं। हालांकि सेव द चिल्ड्रन ने अपनी रिपोर्ट में भारत के पड़ोसी बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल की भी समीक्षा की है। सरकार को गौर करना चाहिए कि इस समस्या को दूर करने में इन देशों की स्थिति भारत से कहीं बेहतर है। भारत अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत कम खर्च करता है, जो ठीक नहीं है। ध्यान रहे कि 12वीं पंचवर्षीय योजना में जीडीपी का मात्र 1.67 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निर्धरित किया गया है। शायद यही वजह है कि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत ने अगर पोषण और स्वास्थ्य पर जल्द उचित कदम नहीं उठाए तो वह बाल मृत्यु दर के संदर्भ में मिलेनियम विकास लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा। इस बात से किसी को इन्कार नहीं हो सकता कि जो देश तरक्की करते हैं, वे अपने नागरिकों, विशेषकर बच्चों के संतुलित आहार और स्वास्थ्य पर खास ध्यान रखते हैं, लेकिन बदकिस्मती से हमारे देश में इन दोनों ही चीजों को वरीयता पर नहीं लिया जा रहा है। इसलिए सामाजिक मानकों से संबंधित जो भी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट समाने आती है, उसमें हमारी स्थिति शर्मनाक ही दर्शाई जाती है।

हम ऐसी रिपो‌र्ट्स पर नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, जबकि हमारा प्रयास स्थितियों को बेहतर बनाना होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि अपने देश में योजनाएं नहीं बनाई जातीं। स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन तैयार किया गया, लेकिन ग्रामीणों को कोई विशेष लाभ नहीं मिल सका। कारण कि योजना का अधिकतर पैसा भष्टाचार की भेंट चढ़ गया। इसलिए जब तक भष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा, कुपोषण जैसी गंभीर समस्याओं से नहीं निपटा जा सकेगा।

उपेक्षा के शिकार मनोरोगी

बेंगलूर स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान यानी निमहंस को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा देने वाले एक विधेयक को हाल ही में राज्यसभा ने मंजूरी दे दी। इसकी मांग लंबे समय से हो रही थी। निमहंस दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान है, जिसमें 852 बिस्तर हैं। यह दर्जा मिल जाने के बाद निमहंस अपनी जरूरतों के मुताबिक पाठ्यक्रम, शिक्षकों और सीटों की संख्या तय कर सकेगा। इससे मनोचिकित्सकों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही यह एक वैधानिक और स्वायत्त संस्था भी हो जाएगी। ऑटिज्म और मिर्गी समेत विभिन्न मानसिक और तंत्रिका संबंधी रोगों के इलाज के लिए हमारे देश में जरूरत को देखते हुए डॉक्टरों की बेहद कमी है।



देश में मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र कितना उपेक्षित है, यह इस बात से जाहिर होता है कि मौजूदा मनोरोगियों को इलाज मुहैया कराने के लिए फिलहाल महज 4000 मनोचिकित्सक ही उपलब्ध हैं, जबकि इसके लिए जरूरत 11,500 मनोचिकित्सकों की है। डॉक्टरों के अलावा नर्स समेत दीगर स्टाफ के मामले में भी कमोबेश यही हालात हैं। एक अरब से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में वैसे तो हर तरह की बुनियादी सुविधाएं दम तोड़ रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल और भी बुरा है। ऐसा लगता है मानो जन स्वास्थ्य कभी हमारे नीति निर्माताओं के एजेंडे में ही न रहा हो। खासकर, मानसिक स्वास्थ्य के मामले में तो सरकार पूरी तरह लापरवाह है। मानसिक स्वास्थ पर सरकारों की यह उदासीनता आंकड़ों में साफ झलकती है। मौजूदा मनोचिकित्सकों की संख्या के हिसाब से देखें तो हमारे यहां प्रत्येक 3 लाख लोगों के लिए सिर्फ एक मनोचिकित्सक है।

ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा बदतर हो जाता है, जहां 10 लाख लोगों पर केवल एक मनोचिकित्सक है। हालात ये हैं कि 15 करोड़ मानसिक रोगियों में से आधे तो कभी मनोचिकित्सक तक पहुंच ही नहीं पाते। और तो और गंभीर मनोरोगी अस्पताल तक पहुंच पाएं, यह भी उतना आसान नहीं, क्योंकि इतने बड़े देश में अभी तक सिर्फ 26 मानसिक अस्पताल हैं, जो आबादी के लिहाज से बेहद कम हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर सरकार कितनी संजीदा है, इस बात का अंदाजा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की विवेचना से हो जाता है। वर्ष 1982 में शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत सरकार ने प्रत्येक जिला स्तर पर कम से कम एक मनोचिकित्सक की उपलब्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन देश के 604 जिलों में से अब तक आधे जिले भी कवर नहीं हो पाए हैं। कार्यक्रम को अमलीजामा पहनाने का काम बेहद धीमा चल रहा है। इसके लिए सरकार और प्रशासकीय मशीनरी दोनों ही जिम्मेदार हैं।

2007-08 में इस मद में 70 करोड़ रुपये रखे गए, लेकिन इसे मानसिक स्वास्थ्य के प्रति प्रशासन की उपेक्षा कहें या लापरवाही इस रकम का सिर्फ 15 करोड़ ही खर्च हो पाया। यानी काम पूरा नहींहो पाने के कारण काफी पैसा बचा रह गया। यदि काम गंभीरता से होता, तो इसका फायदा मनोरोगियों को भी मिलता। सरकार ने राष्ट्रीय मासिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू तो कर दिया, मगर न तो इसकी मॉनीटरिंग की कोई व्यवस्था की और न ही यह देखना गवारा समझा कि इस कार्यक्रम के लिए जो बजट दिया जा रहा है, वह पर्याप्त भी है या नहीं। मिसाल के तौर पर सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में 350 नए जिलों को इस कार्यक्रम के तहत लाने की योजना बनाई। योजना के तहत लक्ष्यों को हासिल करने के लिए 2008-09 में 205 करोड़ रुपये की जरूरत थी, लेकिन बजट में केवल 70 करोड़ रुपये ही रखे गए। जाहिर है ऐसे में बाकी छूटे हुए जिले कैसे कवर हो पाएंगे, इसका अंदाजा भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

एक तरफ सरकार मनोरोगियों के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य तक सुविधाएं मुहैया नहीं करा पा रही है, तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे कानून बना रही है, जिनसे मानसिक रोगियों की जिंदगी भविष्य में और भी दुश्वार हो जाएगी। नए राष्ट्रीय स्वास्थ सेवा कानून के मसौदे में कुछ इस तरह के प्रावधान किए जा रहे हैं, जिनसे मानसिक रोगियों के मानवाधिकार ही खतरे में पड़ जाएंगे। मसलन अगर यह मसौदा मंजूर हो गया, तो सभी मनोरोगियों को इलाज लेने से इन्कार करने का अधिकार होगा, फिर चाहे उनकी बीमारी कितनी भी गंभीर क्यों न हो। मसौदे में यह बात भी जोड़ी गई है कि जरूरत पड़ने पर आपातकालीन हालात में मनोरोगियों का इलाज करने के लिए परिवार के सदस्यों की रजामंदी की भी कोई वैधता नहीं रहेगी। एक लिहाज से देखा जाए तो मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार का नजरिया अब भी ठीक नहीं है। देश में दिन प्रतिदिन बढ़ते मनोरोगी, सरकार की जानलेवा उपेक्षा का ही नतीजा हैं। अगर मानसिक स्वास्थ के प्रति सरकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया आगे भी जारी रहा, तो यह समस्या आगे चलकर और भी ज्यादा खतरनाक हो जाएगी।

यह बात हमारी चिंता का सबब होना चाहिए कि जीवन शैली में तेजी से आए इन बदलावों के चलते अब स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले विधार्थी भी मानसिक रोगियों के दायरे में आने लगे हैं। विधार्थियों के मानसिक स्वास्थ की बेहतरी के लिए जहां स्कूल, कॉलेज में बड़े पैमाने पर काउंसलिंग की जरूरत है, वहीं ज्यादा से ज्यादा अस्पतालों में मानसिक चिकित्सा विंग के तहत पर्याप्त अनुदान देने की भी आवश्यकता है। पर्याप्त बजट के अभाव में, मनोरोगियों के अस्पतालों में न तो जरूरत के मुताबिक डॉक्टर हैं और न ही स्वास्थ सुविधाएं। एक बात और, स्वास्थ्य बीमा की मानसिक रोगियों को सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन विडंबना है कि वही स्वास्थ्य बीमा दायरे से बाहर हैं। कोशिश यह होनी चाहिए कि अस्पतालों में इन रोगियों को इलाज भी मुफ्त मिले। हम सिर्फ इस बात को लेकर थोड़े खुश हो सकते हैं कि देर से ही सही, लेकिन सरकार को मानसिक रोगियों की याद तो आई है। सरकार ने देश में मनोचिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए और भी कई फैसले किए हैं। इनमें रांची और असम के तेजपुर स्थित मानसिक स्वास्थ्य संस्थाओं का उन्नयन और कुछ क्षेत्रीय मेडिकल कॉलेजों की पहचान कर उनमें मनोचिकित्सकों को प्रशिक्षण दिलवाने की सुविधाओं का विस्तार करना आदि शामिल हैं।

इन संस्थानों और कॉलेजों के लिए सरकार पर्याप्त पैसा और उचित प्रशिक्षण भी मुहैया कराएगी। समाज में मनोरोगियों के प्रति एक स्वस्थ नजरिए के निर्माण से ही हालात में बदलाव आ सकते हैं। मानसिक विकलांगों को हिकारत से नहीं, बल्कि सहानुभूति से देखे जाने की जरूरत है। मनोरोग जन्म से से नहीं होते, ये परिस्थितिजन्य होते हैं, जो किसी के साथ भी हो सकती हैं और इन परिस्थितियों के लिए कहीं न कहीं हमारा समाज भी जिम्मेदार है।
(लल्लूजी )

खाप पंचायतों की तुगलकी दुनिया

हरियाणा, यूपी और मध्यप्रदेश जैसे राज्य आज भारत में अपनी एक खास पहचान के लिए बड़े प्रसिद्ध हैं. यह खासियत उनकी शान में चार चांद नहीं बल्कि उनके पिछड़े होने का सबूत देती प्रतीत होती हैं. उनकी इस तथाकथित शान का नाम है खाप.


खाप पंचायतों का इतिहास भारत में बेहद पुराना है. अपनी नजर में खुद को न्यायालय करार देने वाली इन खाप पंचायतों को जानकार देश की न्यायिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर खतरा मानते हैं. आइए इन खाप पंचायतों के अस्तित्व के बारे में सिलसिलेवार तरीके से जानें:

Khapक्या होती है खाप
खाप जिसे कई लोग सर्वखाप भी कहते हैं एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है जो भारत के उत्तरी राज्यों में सक्रिय हैं. यूं तो इन खापों को कोई कानूनी मान्यता नहीं मिली है लेकिन कई केसों में देखा गया है कि यह खाप कानून से बढ़कर कार्य करने लगती हैं.

एक गोत्र या जाति के सभी लोग मिलकर एक खाप पंचायत का गठन करते हैं जो पांच या अधिक गांवों की होती है. यह खाप जिस गोत्र या जाति के लोगों से मिलकर बनाई जाती है उसके बारे में सभी निर्णय लेती है.

खाप पंचायतों की मानसिकता
जानकारों का मानना है कि खाप पंचायतों की मानसिकता आज भी एक सदी पीछे चल रही है. महिलाओं के मामले में तो इनकी सोच और भी दकियानूसी साबित होती है. पुरानी रुढ़िवादी परंपरा को आज की युवा पीढ़ी पर थोप कर यह उनके बौद्धिक विकास में अवरोध का काम कर रहे हैं.

इनके द्वारा लिए गए निर्णयों की वजह से अकसर समाज में न्याय व्यवस्था की किरकिरी होती है. प्रेमी युगलों को जान से मार देना, औरतों को नंगा करके घुमाना, किसी को उसकी संपत्ति से बेदखल कर देने जैसे ऐसे कई कांड हैं जो इन खाप पंचायतों के अस्तित्व पर कालिख पोतते हैं. लेकिन इसको मानने वालों के सुर इससे अलग हैं.



खाप पंचायतों का प्रभाव
आज खाप पंचायतों का वर्चस्व बहुत ज्यादा बढ़ा है. जाति और गोत्र के नाम पर जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर इन्होंने जनता के बीच अच्छी पैठ जमा ली है.
कई लोग इनके बढ़ते वर्चस्व का मुख्य कारण जनता में फैली अशिक्षा को भी मानते हैं. कई लोग मानते हैं कि कौम, रीति के नाम पर जनता की वैचारिक स्वाधीनता को शिथिल करना इनका प्रमुख कार्य है, जिसे ये मानव मूल्यों की रक्षा करना कहते हैं.

खाप पंचायतों से नुकसान
भारत में न्यायिक व्यवस्था यूं तो बेहद लाचार है लेकिन इस सूरत में हम किसी भी कीमत पर खाप पंचायतों को जायज नहीं ठहरा सकते हैं. सर्वोच्च अदालत ने भी कई मौकों पर खाप पंचायतों को अवैध करार देते हुए उन्हें सख्ती से बंद करने की बात कही थी.
कानून के सलाहकार खाप पंचायत जैसी संस्थान को बंद करने की सलाह देते हैं. हालांकि कई मौकों पर इन खाप पंचायतों ने अच्छे फैसले भी दिए हैं लेकिन इनके अधिकतर फैसले खासकर महिलाओं के लिए जो यह फैसले सुनाते हैं वह अकसर दकियानूसी फतवे की तरह प्रतीत होते हैं. कोशिश तो यही होनी चाहिए कि खाप पंचायतें केवल समाज हित में काम करें और न्याय निर्णय का कार्य संविधान द्वारा स्थापित न्याय-व्यवस्था पर छोड़ दें.

रविवार, 30 सितंबर 2012

हादसों में तब्दील होती आस्था

मथुरा के बरसाना स्थित राधारानी मंदिर और झारखंड के देवघर में एक धार्मिक आश्रम में पिछले दिनों मची भगदड़ में दर्जन भर बच्चे, बूढ़े और महिलाएं मारे गए। अपने देश में भगदड़ और परिणाम स्वरूप होने वाली मौतें कभी हमारे विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाती है। संसद में 25 फरवरी 2009 को तबके गृहमंत्री द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार देश में पिछले चार वर्षो में धार्मिक स्थलों पर भगदड़ में मरने वालों की तादाद 686 हैं। इस सूचना की तिथि के बाद जनवरी 2011 तक धार्मिक स्थलों पर 317 यानी 2005 से कुल 773 लोग भगदड़ में मारे गए हैं।

जनवरी 2011 के बाद हरिद्वार में गायत्री परिवार के यज्ञ और दूसरे कुछेक धार्मिक स्थलों में भगदड़ में मारे गए लोगों की तादाद शामिल नहीं है। न ही गंभीर रूप से घायलों की संख्या शामिल है। अपने देश में धार्मिक स्थलों के अलावा मोटे तौर पर रेलवे स्टेशनों और सेना पुलिस में भर्ती के दौरान भगदड़ में मारे जाने की घटनाएं हुई हैं। 2002 में लखनऊ के रेलवे स्टेशन के अलावा 30 अक्टूबर 2007 को मुगलसराय और दिल्ली के स्टेशनों में घटनाएं हुई थीं। एक घटना 2005 में तमिलनाडु में प्राकृतिक आपदाओं में बुरी तरह प्रभावित लोगों के कैंप में हुई थी। इस तरह भगदड़ की घटनाओं में 95 प्रतिशत घटनाएं और उनमें मारे जाने वाले 95 प्रतिशत धार्मिक स्थलों के जलसों में शामिल लोग होते हैं। सरकार के पास ये आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि भगदड़ में मारे जाने वाले लोगों में विकलांग, बूढ़े, महिला, बच्चे कितने हैं। लेकिन वर्ग विभाजित समाज में नियम की तरह ऐसी मानवजनित घटनाओं में सबसे ज्यादा शिकार क्रमश: कमजोर माना जाने वाला समुदाय होता है।


मोटे तौर पर ऐसी घटनाओं की सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे हुए हैं। भगदड़ के वैचारिक पहलू यहां इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या भगदड़ का संबंध विचारधारा से है? भगदड़ की घटनाओं में जमा कमजोर लोग तमाम तरह की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक असुरक्षाओं के बोध से ग्रस्त रहते हैं। भगदड़ की घटनाओं को व्यवस्थागत खामियों के आलोक में देखा जाता है। लिहाजा, ये घटनाएं विचार के प्रश्न के रूप में सामने नहीं आ पाती हैं। केंद्र सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेती है कि कानून एवं व्यवस्था प्रदेश सरकारों का विषय है। राज्य सरकारों का यह आलम है कि भगदड़ की घटनाओं के बाद जांच की एक प्रक्रिया शुरू की जाती है और फिर ऐसी घटनाओं को भाग्य का खेल और भगवान की मर्जी मानकर उन्हें भुला दिया जाता है। सरकारों की तो बेपरवाही का अंदाजा इससे लग सकता है कि ओडिशा में की गई ऐसी एक जांच रिपोर्ट का पता ही नहीं चल रहा है।

आखिर सरकारों पर भगदड़ की घटनाएं और मौतें असर क्यों नहीं डाल पाती हैं? भगदड़ और उसमें होने वाली मौतों का संबंध भीड़ को नियंत्रित करने या नहीं कर पाने की प्रशासनिक विफलता से ही नहीं जुड़ा हुआ है। इसका एक विचार पक्ष है, जो न तो ऐसी घटनाओं को रोक पा रहा है और न ही सरकारों व धार्मिक स्थलों की देखरेख करने वालों पर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दबाव बना पा रहा है। समाज का प्रभावशाली हिस्सा किसी घटना में प्रभावित होता है, तब तो वह विचार करने योग्य विषय का रूप ले भी पाता है। वरना, उसकी कोई परवाह ही नहीं की जाती है। आमतौर पर धार्मिक स्थलों पर संपन्न और प्रभावशाली लोगों के लिए सुरक्षित स्थान भी बनते रहे हैं। भगदड़ वाली घटनाओं में देखें तो साधारण मनुष्य के प्रति पूरी धार्मिक प्रक्रिया में एक नृशंसता दिखती है और मंदिर के कर्ताधर्ता उसके प्रत्यक्ष पोषक के रूप में सामने दिखाई देते हैं। यह विचार भी किया जाना चाहिए कि क्या ये घटनाएं धार्मिक स्थलों में होने वाले कर्मकांडों से जुड़ी होती हैं?

भगदड़ में मौत की घटनाओं का इस स्तर का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। हमारे विश्लेषण में यह पाया गया है कि कर्मकांडों का भगदड़ और उसमें होने वाली कमजोर वर्ग के सदस्यों की मौत का रिश्ता हैं। उदाहरण के लिए 26 जनवरी 2005 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित मंधरा देवी के मंदिर में 291 लोग मारे गए थे और तब 98 लोगों के घायल होने की जानकारी दी गई थी। बाद में घायलों में कितने और लोग मरे, यह पता करने की कोशिश नहीं की गई। सरकार के अनुसार शकरबारी के पूर्णिमा के मौके पर जमा श्रद्धालुओं में एक महिला अपनी टोकरी में कर्मकांड के लिए सामग्री ले जा रही थी। वह फिसल गई और टोकरी से तेल गिर गया। जमीन पहले से ही नारियल के पानी की वजह से फिसलन भरी हो गई थी। एक के बाद दूसरे श्रद्धालु के उस पर गिरने के बाद भगदड़ में इतनी जानें चली गई।

देवघर की घटना के जो कारण बताए जा रहे हैं, यदि उसे देखें तो जैसे 2005 की कहानी भर दोहराई जा रही हैं। 2003 में अगस्त-सितंबर के दौरान नासिक में आयोजित कुंभ मेले में 118 लोग मारे गए। सरकार के अनुसार यह घटना इसीलिए हुई, क्योंकि कुछ साधु-महंथों ने हाथियों और गाडि़यों पर सवार होकर जुलूस निकाले और वे सवारी पर बैठे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद, फूल और सिक्के उछाल रहे थे। उन साधु-महंथों ने ऐसा जुलूस निकालने के लिए किसी से इजाजत लेने की भी जरूरत महसूस नहीं की। राजस्थान के चामुंडा में 215 लोग मारे गए थे और मथुरा की घटना के जो कारण बताए जा रहे हैं, वह वहां भी बताए गए थे। कर्मकांड की भूमिका दूसरे देशों में धार्मिक स्थलों पर भगदड़ की घटना की भी चर्चा की जा सकती है। इस्लामिक धार्मिक स्थल मीना में 1998 में भारत के 32 हजयात्री मारे गए थे। वर्ष 2006 में मक्का में भी भगदड़ की घटनाएं हुई थी। शैतान को पत्थर मारने की रस्म के दौरान हादसा हुआ था। इन घटनाओं के साथ उपरोक्त घटनाओं के कारणों का विश्लेषण इस रूप में भी सामने आ सकता है कि कर्मकांड इसमें मुख्य हैं। यदि ऐसी घटनाओं के दूसरे कारणों पर गौर किया गया है तो वे सभी कारण क्या-क्या हो सकते हैं, क्या इस पर कभी विचार किया गया है। इस आलोक में यह सवाल सामने जरूर आता है कि इस देश में धार्मिक स्थलों में ऐसी घटनाओं का सिलसिला क्यों बना हुआ है।

जिस तरह की आर्थिक परेशानी बढ़ती जा रही है, सामाजिक असुरक्षा गहरी हुई है और असुरक्षा के बोध से लोग बुरी तरह घिरते जा रहे हैं। इसके साथ ही ऐसी घटनाओं की आशंकाएं तेज हुई हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो हाल के दौर में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। दूसरी तरफ धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ से यह मापा जा सकता है कि समाज का बड़ा हिस्सा किस स्तर पर असुरक्षा बोध से ग्रस्त होता जा रहा है। आधुनिक राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर बनी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कई तरह की पुरातन असुरक्षा बोध से मुक्त और सामाजिक सुरक्षा से बेफिक्र समाज का निर्माण करना था, लेकिन संसदीय व्यवस्था उस तरह का समाज निर्मित करने में बुरी तरह से विफल रही है। बल्कि वह उसकी पिछलग्गू हो गई है। इसीलिए संसदीय लोकतंत्र की राजनीति ने जिस तरह से एक भीड़ तंत्र को खड़ा किया है, वह धार्मिक विचारों द्वारा खड़े तंत्र से भिन्न नहीं दिखता है। धार्मिक स्थलों पर भगदड़ का रिश्ता विचारों से भी जुड़ा है। यदि माना जाए कि प्रशासनिक लापरवाही होती है, लेकिन उस लापरवाही का सिलसिला भी लंबे समय से जारी है तो वह विचारों से ही जुड़ा हुआ है। उसकी पहचान की जानी चाहिए।
(लल्लूजी)

जिस पेड़ ने छाया दी उसे क्यों दुतकारते हो –

जब पौधा बोया जाता है तो उससे यही उम्मीद की जाती है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ वह अपना फल और छाया अन्य लोगों को प्रदान करेगा. लेकिन जब वह पेड़ बूढ़ा हो जाता है तो किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं जाता. कोई उस वृक्ष की ओर ध्यान नहीं देता जिसने पूरी जिंदगी दूसरों का ही हित सोचा. इतना ही नहीं उसे मात्र एक बोझ ही मान लिया यह एक पेड़ की कहानी नहीं बल्कि हर उस इंसान की कहानी है जो उम्र के बढ़ते पड़ाव में परिवार द्वारा वृद्धाश्रम में धकेल दिए जाते हैं, उन्हें अपने परिवार से ही दूर रहने के लिए विवश कर दिया जाता है. उम्र बढ़ने का एक अर्थ अनुभव बढ़ने से भी लिया जा सकता है लेकिन आज की युवा पीढ़ी जो स्वयं से आगे कुछ सोच ही नहीं पाती वह परिवार के बुजुर्गों को अपने ऊपर एक बोझ समझने लगती है.

जिस परिवार को व्यक्ति अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, जिसकी खुशियों के लिए अपनी खुशियां छोड़ देता है वही परिवार उसके वृद्ध होते ही उसे तुच्छ समझने लगता है. वैसे तो हम अपने संस्कारों की बात करते हैं लेकिन बुजुर्गों के साथ होते ऐसे व्यवहार को देखकर हमारी ओछी मानसिकता प्रदर्शित होने लगती है.

वृद्ध होने के बाद इंसान को कई रोगों का सामना करना पड़ता है. चलने-फिरने में भी दिक्कत होती है. लेकिन यह इस समाज का एक सच है कि जो आज जवान है उसे कल बूढ़ा भी होना होगा और इस सच से कोई नहीं बच सकता. लेकिन इस सच को जानने के बाद भी जब हम बूढ़े लोगों पर अत्याचार करते हैं तो हमें अपने मनुष्य कहलाने पर शर्म महसूस होती है. हमें समझना चाहिए कि वरिष्‍ठ नागरिक समाज की अमूल्‍य विरासत होते हैं. उन्होंने देश और समाज को बहुत कुछ दिया होता है. उन्‍हें जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों का व्‍यापक अनुभव होता है.

आज का युवा वर्ग राष्‍ट्र को उंचाइयों पर ले जाने के लिए वरिष्‍ठ नागरिकों के अनुभव से लाभ उठा सकता है. अपने जीवन की इस अवस्‍था में उन्‍हें देखभाल और यह अहसास कराए जाने की जरूरत होती है कि वे हमारे लिए खास महत्‍व रखते हैं. हमारे शास्त्रों में भी बुजुर्गों का सम्मान करने की राह दिखलायी गई है.

respectforeldersअंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस का इतिहास

संपूर्ण विश्व में बुजुर्गों के प्रति होने वाले अन्याय और उनके साथ दुर्व्यवहार पर लगाम लगाने के साथ-साथ वृद्धों को उनके अधिकारों के प्रति जागरुक करने के उद्देश्य से 14 दिसंबर, 1990 के दिन संयुक्त राष्ट्र ने यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस के रूप में मनाया जाएगा. इससे बुजुर्गों को भी उनकी अहमियत का अहसास होगा और समाज के अलावा परिवार में भी उन्हें उचित स्थान दिलवाया जा सकेगा. सबसे पहले 1 अक्टूबर, 1991 को बुजुर्ग दिवस मनाया गया और तब से यह सिलसिला निरंतर जारी है.

भारत में बुजुर्गों की स्थिति
वैसे तो भारत में भी बुजुर्गों की रक्षा और उन्हें अधिकार दिलवाने के लिए भारत में भी कईकानूनों का निर्माण किया गया है लेकिन आज भी उनका पालन सही तरीके से नहीं किया जाता. केंद्र सरकार ने भारत में वरिष्‍ठ नागरिकों के आरोग्‍यता और कल्‍याण को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1999 में वृद्ध सदस्‍यों के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार की है. जिसके तहत व्‍यक्तियों को स्‍वयं के लिए तथा उनके पति या पत्‍नी के बुढ़ापे के लिए व्‍यवस्‍था करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता है और साथ ही परिवार वालों को वृद्ध सदस्‍यों की देखभाल करने के लिए प्रोत्‍साहित करने का भी प्रयास किया जाता है.
इसके साथ ही 2007 में माता-पिता एवं वरिष्‍ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक संसद में पारित किया गया है. इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्‍थापना, चिकित्‍सा सुविधा की व्‍यवस्‍था और वरिष्‍ठ नागरिकों के जीवन और सं‍पत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है.
लेकिन इन सब के बावजूद हमें अखबारों और समाचारों की सुर्खियों में वृद्धों की व्यथा और लूटमार की घटनाएं देखने को मिल ही जाती हैं. वृद्धाश्रमों में बढ़ती संख्या इस बात का साफ सबूत है कि वृद्धों को उपेक्षित किया जा रहा है. हमें समझना होगा कि अगर समाज के इस अनुभवी स्तंभ को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा तो हम उस अनुभव से भी दूर हो जाएंगे जो इनके पास है.
सबसे बड़ी बात तो ये है कि वृद्ध एक दिन हम सभी होंगे और तब हमारे साथ क्या होगा! क्या हमें भी वृद्धाश्रम में धकेल दिया जाएगा या उपेक्षित किया जाएगा. यदि आज हमने अपने बच्चों और स्वयं अपने भीतर वृद्धों का सम्मान करने का संस्कार नहीं पैदा किए तो कल तो वाकई बड़ा भयानक होगा.
(लल्लूजी )

श्रद्धा तो जीवन का अनुष्ठान है

श्राद्ध का मतलब श्रद्धा ही नहीं, आस्था भी है और वह प्रकृति, परिवेश व पर्यावरण, किसी के प्रति भी हो सकती है। यही श्रद्धा का विराट दर्शन है। श्राद्ध हमें संयम सिखाते हैं तो एक व्यापक दर्शन भी देते हैं। यह दर्शन है सर्वे भवंतु सुखिन- सर्वे संतु निरामय का, लेकिन सब सुखी तभी तो रहेंगे, जब हम श्रद्धा को जीवन का अनुष्ठान बना लें और इसके लिए पूर्वजों की भावनाओं का सम्मान करना जरूरी है। यही श्राद्ध है। पितृपक्ष ऐसा पर्व है, जो हममें संरक्षण करने वालों के प्रति श्रद्धा का भाव जगाता है, लेकिन परंपराओं की जकड़न के कारण हमने मान लिया कि सिर्फ दिवंगत ही श्रद्धा के पात्र हैं, जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। श्रद्धा इतना व्यापक शब्द है, जितना कि यह संसार। अगर संसार के प्रति ही श्रद्धा का भाव न रहे तो जीवन के प्रति कैसे हो सकता है। इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि पुरानी लकीर को पीटना कोई बुद्धिमता नहीं हीं। क्यों न श्राद्ध में हम कुछ ऐसा करें, जिससे किसी न किसी रूप में प्राणियों को अनंतकाल तक लाभ पहुंचता रहे। ऐसा प्रकृति के संरक्षण से ही संभव है।
श्रद्धा से जो दिया, वही श्राद्ध
श्राद्ध यानी श्रद्धया दीयते यत् तत श्राद्ध अर्थात श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। वेदों में डेढ़ हजार मंत्र श्राद्ध के बारे में हैं। पुराण, स्मृति व अन्य प्राचीन ग्रंथों में श्राद्ध का नाम कनागत भी है। कनागत कन्यार्कगत का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है सूर्य (अर्क) का कन्या राशि में जाना। श्राद्धों का यही समय होता है, इसीलिए इसे कन्यार्कगत अथवा कनागत कहा जाता है।
प्रकृति के संरक्षण का पर्व-
कौवे को अन्य पक्षियों की अपेक्षा तुच्छ समझा जाता है, किंतु श्राद्धपक्ष में दही में डुबोकर पूरियां सबसे पहले उसी को दी जाती हैं। कौवे एवं पीपल को पितरों का प्रतीक माना गया है। पितृपक्ष के इन 16 दिनों में कौवे को ग्रास एवं पीपल को जल देकर पितरों को तृप्त किया जाता है।
जीवित भी हैं श्रद्धा के पात्र-
श्राद्ध पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा के प्रतीक हैं। जब हम मृतकों के प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तो जीवित बुजुर्ग उससे अधिक ही श्रद्धा के पात्र होंगे। यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता कि जीवित बुजुर्ग पर्याप्त भोजन, औषधि और देखभाल के अभाव में दम तोड़ दें और मृत्य उपरांत उनके श्राद्ध पर हजारों रुपये व्यय कर दें। श्राद्ध हमसे श्रद्धा चाहते हैं, पाखंड नहीं।
यह श्राद्या सभी बुजुगरें के प्रति होनी चाहिए, चाहे वह जीवित हों या दिवंगत।
सत्रह दिन, सोलह श्राद्ध-
इस बार अधिकमास की तिथियों के कारण पितृपक्ष 17 दिन का हो गया है, हालांकि श्राद्ध 16 ही होंगे। तीन अक्टूबर को कोई श्राद्ध नहीं है। इस दिन चतुर्थी व्रत रहेगा और चतुर्थी का श्राद्ध चार अक्टूबर को होगा।
खास बातें-
29 सितंबर- पूर्णिमा का श्राद्ध, सुबह 8.03 बजे से
30 सितंबर- प्रतिपदा
1 अक्टूबर- द्वितीया श्राद्ध, सुबह 10.04 बजे बाद
2 अक्टूबर- तृतीया श्राद्ध, पूर्वाह्न 11.47 बजे बाद
4 अक्टूबर- चतुर्थी
5 अक्टूबर- पंचमी
6 अक्टूबर- षष्ठी
7 अक्टूबर- सप्तमी
8 अक्टूबर- अष्टमी
9 अक्टूबर- नवमी
10 अक्टूबर- दशमी
11 अक्टूबर- एकादशी
12 अक्टूबर- द्वादशी
13 अक्टूबर- त्रयोदशी
14 अक्टूबर- चतुदर्शी
15 अक्टूबर- अमावस्या
शुभकायरें का निषेधकाल नहीं पितृपक्ष
सीधा-सा, लेकिन गंभीर सवाल, पितृपक्ष में नई वस्तु खरीदने से परहेज क्यों। क्या पितरों को हमारी तरक्की पसंद नहीं। वेदोक्त दृष्टि से देखें तो पितर देवताओं में भी श्रेष्ठ हैं।
(लल्लूजी)

रविवार, 23 सितंबर 2012

तमसो मा ज्योतिर्गमय


तमसो मा ज्योतिर्गमय का सामान्य अर्थ यह है कि अंधकार से प्रकाश की ओर चलो, बढो। देखा गया है कि मानव इसका गूढार्थ नहीं समझ पाता। कतिपय ऋषि-मुनियों ने समझकर इसका अनुगमन किया और अपने जीवन को कृतार्थ किया है। उनमें बहुतों के नाम लिए जा सकते हैं। अंधकार को त्यागकर प्रकाश के मार्ग पर बढना साधना का अध्याय है। भौतिकता और सांसारिकता के व्यामोह में लिप्त व्यक्ति इस आप्त वचन को जानने को उत्सुक नहीं हैं। विज्ञान की उपलब्धियों से वह रात के अंधेरे को दूर करने के उपाय खोजकर अपने को सुखी अनुभव कर रहा है। जल का दोहन करते हुए विद्युत उत्पादन से बडी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है। जगत की यात्रा में नए-नए प्रयोगों से अंतरिक्ष पर काबिज होने के प्रयास से अपने को सुपर मानव घोषित करने में लगा है। यद्यपि ये सारे प्रयास मानव जीवन के लिए अत्यंत घातक हैं। सच्चे अर्थो में मानव उपरोक्त वचन को नकारते हुए प्रकृति के साथ अन्याय कर रहा है। सूर्य की प्रात: रश्मियों से रात का अंधकार विलुप्त हो जाता है। उसी तरह मानव रात के अंधेरे को अपने अनुसंधानों से दूर करने में लगा है। वास्तविकता तो यह है कि मानव के लिए भीतर के व्याप्त अंधकार से प्रकाश की ओर चलने का उपरोक्त वचन संकेत है। आसक्ति और मोह का अंधकार, काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का अंधकार, ईष्र्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण, आत्म प्रवंचना, धन, पद, प्रतिष्ठा के बल पर अहित की भावना के अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश का स्वागत करते हुए चलने का ध्येय है- तमसो मा ज्योतिर्गमय। जब अज्ञान के अंधकार से मानव पार होता है तब शांति और संतोष की अनुभूति होती है। तत्पश्चात आत्मा आनंद विभोर होकर नृत्य करने लगती है। आनंद से परमानंद की ओर बढता है। अंततोगत्वा ब्रांह्मानंद का पडाव स्वत: मिल जाता है। यही है वास्तविक तमसो मा ज्योतिर्गमय। संत कवि तुलसीदास जी ने कहा है,,

दरिद नाशन दान

सुख और दुख यह जीवन की अवस्थाएं बताई गई हैं। सभी लोगों के जीवन में सुख और दुख आते-जाते रहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उनके जीवन में कभी दुख आए या गरीबी से कभी भी उनका सामना हो। इस संबंध में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-

दरिद नाशन दान, शील दुर्गतिहिं नाशियत।
बुद्धि नाश अज्ञान, भय नाशत है भावना।।

दान से दरिद्रता या गरीबी का नाश होता है। शील या व्यवहार दुखों को दूर करता है। बुद्धि अज्ञानता को नष्ट कर देती है। हमारे विचार सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाते हैं। आचार्य चाणक्य के अनुसार यदि कोई इंसान उसकी कमाई से कुछ हिस्सा दान करता रहे तो उसे कभी भी गरीबी का सामना नहीं करना पड़ेगा। व्यक्ति जो भी कमाता है, जो भी धन प्राप्त करता है उसमें कुछ भाग हमेशा ही जरूरतमंद लोगों की मदद में लगाना चाहिए, धार्मिक कार्य करना चाहिए। ऐसा करने पर हमारे पुण्य कर्मों की वृद्धि होती है जिससे महालक्ष्मी की कृपा सदैव हम पर बनी रहती है। इंसान के जीवन में काफी दुखों के कारण से उसके बुरे स्वभाव से संबंधित ही होते हैं। अत: अच्छे गुण और नम्र व्यवहार रखने से सभी लोगों से सुख प्राप्त होता है और दुख या कष्ट हमसे दूर ही रहते हैं। जो लोग नियमित रूप से भगवान की भक्ति में लगे रहते हैं, धर्म ग्रंथ पढ़ते हैं, उनसे ज्ञान प्राप्त करते हैं वे ज्ञानी हो जाते हैं। उन लोगों की अज्ञानता नष्ट हो जाती है। साथ ही इन कार्यों से हमारे विचार भी शुद्ध होते हैं और जीवन-मृत्यु, सुख-दुख के सभी भय दूर हो जाते हैं
 

रविवार, 9 सितंबर 2012


"प्रिय बंधुओं, मेरी प्रस्तुत रचना, उम्र की उस ढलान को प्रदर्शित करती है, जिसमे हमारे पास सिमित-समयाविधि होती है, और जहाँ से वापस लौट पाना असंभव होता है I इस सिमित-समयाविधि में ही मनुष्य अपने द्वारा किये कार्यों से अपना अनुमान लगा पाता है की उसने क्या सही, क्या गलत किया...!! त्रुटिपूर्ण कार्य करने की अवस्था में मात्र खिन्नता ही प्राप्त होती है, क्यूंकि हमारे पास उन्हें सुधारने हेतु समय का अभाव होता
है.....

"उम्र- एक खेद-पूर्ण यात्रा-साथी!!"................

मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का,
क्या रह सकते हो मेरी आँखों में, उम्मीदों की किरण बनके?
क्या कर सकते हो रोशन, मेरे बुझते चिरागों को ?
क्या मिटा सकते हो, मेरे चेहरे पर पड़ी उम्र की सिलवटों को?
क्या रोक सकते हो, मेरी जाती हुई श्वांस-रूपी डोर को?

नहीं,
जानता था मैं, पर क्या करूँ?
जीना चाहता हूँ, कुछ और पल,
अपनी भूल-सुधार में,
रहना चाहता हूँ, उनके साथ, जिन्हें छोड़ चूका हूँ,
समय के गर्भ में कोसों दूर,
बांटना चाहता हूँ, वोह स्नेह, जिसे छीन चूका हूँ,
स्वार्थ्य-परक उद्देश्यों में,
पाना चाहता हूँ, वो सम्मान, जिसे खो दिया है,
स्व-अहम् में,
बिताना चाहता हूँ, शेष जीवन
आत्म-चिंतन व ईश्वरीय-अनुभूति में.....!!
.............मैं तन्हा-पथिक हूँ, अँधेरी रातों का.........!!