तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो
मा ज्योतिर्गमय का सामान्य अर्थ यह है कि अंधकार से प्रकाश की ओर चलो,
बढो। देखा गया है कि मानव इसका गूढार्थ नहीं समझ पाता। कतिपय ऋषि-मुनियों
ने समझकर इसका अनुगमन किया और अपने जीवन को कृतार्थ किया है। उनमें बहुतों
के नाम लिए जा सकते हैं। अंधकार को त्यागकर प्रकाश के मार्ग पर बढना साधना
का अध्याय है। भौतिकता और सांसारिकता के व्यामोह में लिप्त व्यक्ति इस आप्त
वचन को जानने को उत्सुक नहीं हैं। विज्ञान की उपलब्धियों से वह रात के
अंधेरे को दूर करने के उपाय खोजकर अपने को सुखी अनुभव कर रहा है। जल का
दोहन करते हुए विद्युत उत्पादन से बडी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है। जगत
की यात्रा में नए-नए प्रयोगों से अंतरिक्ष पर काबिज होने के प्रयास से अपने
को सुपर मानव घोषित करने में लगा है। यद्यपि ये सारे प्रयास मानव जीवन के
लिए अत्यंत घातक हैं। सच्चे अर्थो में मानव उपरोक्त वचन को नकारते हुए
प्रकृति के साथ अन्याय कर रहा है। सूर्य की प्रात: रश्मियों से रात का
अंधकार विलुप्त हो जाता है। उसी तरह मानव रात के अंधेरे को अपने अनुसंधानों
से दूर करने में लगा है। वास्तविकता तो यह है कि मानव के लिए भीतर के
व्याप्त अंधकार से प्रकाश की ओर चलने का उपरोक्त वचन संकेत है। आसक्ति और
मोह का अंधकार, काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का अंधकार, ईष्र्या-द्वेष,
परछिद्रान्वेषण, आत्म प्रवंचना, धन, पद, प्रतिष्ठा के बल पर अहित की भावना
के अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश का स्वागत करते हुए चलने का ध्येय है- तमसो
मा ज्योतिर्गमय। जब अज्ञान के अंधकार से मानव पार होता है तब शांति और
संतोष की अनुभूति होती है। तत्पश्चात आत्मा आनंद विभोर होकर नृत्य करने
लगती है। आनंद से परमानंद की ओर बढता है। अंततोगत्वा ब्रांह्मानंद का पडाव
स्वत: मिल जाता है। यही है वास्तविक तमसो मा ज्योतिर्गमय। संत कवि तुलसीदास
जी ने कहा है,,
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