गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

जोधपुर










जोधपुर
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विवरण जोधपुर शहर, जोधपुर ज़िले का प्रशासनिक मुख्यालय, राजस्थान राज्य, पश्चिमोत्तर भारत में स्थित है।
राज्य राजस्थान
ज़िला जोधपुर
स्थापना सन 1459 ई. में एक राजपूत राव जोध द्वारा स्थापित
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 26° 17' - पूर्व- 73°01
प्रसिद्धि जोधपुर क़िले, हवेलियाँ, मेले और अन्य उत्सवों के लिए प्रसिद्ध है।
कैसे पहुँचें हवाई जहाज़, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है।
हवाई अड्डा जोधपुर हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन जोधपुर रेलवे स्टेशन
बस अड्डा प्रताप नगर बस स्टैंड, पाओटा बस स्टैंड
यातायात ऑटो रिक्शा, टोंगा, टैक्सी और बस
क्या देखें मेहरानगढ़ क़िला, जसवंत थाड़ा, उम्मेद महल
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
क्या खायें मावा का लड्डू, क्रीम युक्‍त लस्‍सी, मावा कचौड़ी और दूध फिरनी आदि।
क्या ख़रीदें हाथीदाँत का सामान, काँच की चूड़ियाँ, छुरी—काँटा, रंगे हुए वस्त्र, लाख की वस्तुएँ, नमदे, चमड़े का सामान आदि।
एस.टी.डी. कोड 0291
ए.टी.एम लगभग सभी
Map-icon.gif जोधपुर हवाई अड्डा
अन्य जानकारी 15वीं शदी में निर्मित क़िला और महलें यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा है।
बाहरी कड़ियाँ आधिकारिक वेबसाइट
अद्यतन‎
जोधपुर शहर, जोधपुर ज़िले का प्रशासनिक मुख्यालय, राजस्थान राज्य, पश्चिमोत्तर भारत में है। जोधपुर प्रमुख सड़क और रेल जंक्शन वाला शहर है। जोधपुर शहर के कुछ हिस्से 18वीं शताब्दी के परकोटे से घिरे हुए हैं। यह दुर्ग, जिसमें महल और ऐतिहासिक संग्रहालय हैं, एक अलग-थलग, लेकिन ऊँची चट्टान पर बना हुआ है, जो दूर से ही दिखाई देता है। इसके ठीक उत्तर में मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मंडौर के चौथी शताब्दी के अवशेष विद्यमान हैं। जोधपुर मारवाड़ों का मुख्‍य वित्तिय राजधानी था, जहाँ राठौड़ वंश ने शासन किया था। जोधपुर थार मरुस्थल के दाहिने छोर पर स्थित है।
जोधपुर का एक दृश्य

स्थापना

जोधपुर की स्थापना एक राजपूत राव जोधा (1438-89 ई.) ने 1459 में की थी और यह भूतपूर्व जोधपुर रियासत की राजधानी था। मंडोर से हटाकर नयी राजधानी यहाँ बसायी गयी थी। नयी राजधानी को सुरक्षित रखने के लिए चिड़ियाटुंक पहाड़ी पर एक दुर्ग भी बनाया गया था, जो आज भी जोधपुर के किले के नाम से प्रसिद्ध है।

इतिहास

जोधपुर पर 1565 ई. में मुग़लों का अधिकार हो गया। जोधपुर राज्य के राव चन्द्रसेन ने 1570 ई. में अकबर से भेंट की लेकिन अकबर ने उसके प्रतिद्वन्द्वी भाई मोटा राजा उदयसिंह को जोधपुर राज्य का अधीन शासक मान लिया। चन्द्रसेन निराश लौट गया और जीवनपर्यंत विरोध करता रहा। 1961 में मुग़ल बादशाह अकबर के आक्रमण के बाद इसने मुग़लों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। 1679 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने मारवाड़ पर हमला करके इसे लूटा और यहाँ के निवासियों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने को मज़बूर किया, लेकिन जोधपुर, जयपुर और उदयपुर की रियासतों ने गठबंधन बनाकर मुसलमानों के नियंत्रण को रोके रखा। इसके बाद जयपुर और जोधपुर के राजकुमारों को उदयपुर परिवार के साथ वैवाहिक सम्बन्ध करने का अधिकार (जो मुग़लों के साथ मित्रता के कारण समाप्त हो गया था) इस शर्त पर फिर से प्राप्त हो गया कि उदयपुर की राजकुमारियों से उत्पन्न बच्चे पहले उत्तराधिकारी होंगे।
फूलमहल, मेहरानगढ़ क़िला, जोधपुर
लेकिन इस शर्त से उत्पन्न झगड़ों के कारण अन्ततः यहाँ मराठों का प्रभुत्व क़ायम हो गया। औरंगजेब के समय जोधपुर का शासक जसवंतसिंह की मृत्यु (1678 ई.) के पश्चात औरंगजेब और जोधपुर राज्य के मध्य लम्बे समय तक संघर्ष चलता रहा। यह संघर्ष जोधपुर की गद्दी पर अजीतसिंह (जसवंतसिंह के पुत्र) के अधिकार को लेकर हुआ। संघर्ष का अंत औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात मुग़ल सम्राट फर्रुखशिखर के समय ही हो सका। 1818 में जोधपुर ब्रिटिश सत्ता के अंतर्गत आ गया। 1949 में यह राजस्थान राज्य में शामिल हो गया।

कृषि और खनिज

जोधपुर शहर कृषि उपज, ऊन, मवेशी, नमक और चमड़े का विपणन केन्द्र है।

उद्योग और व्यापार

यहाँ इंजीनियरिंग और रेल की कार्यशालाएँ हैं व साथ ही सूती वस्त्र, पीतल तथा लोहे के बर्तन, साइकिल, स्याही और पोलो के उपकरणों का निर्माण होता है। जोधपुर अपने हस्तशिल्प उत्पादों के लिए प्रख्यात है, जिसमें हाथीदाँत का सामान, काँच की चूड़ियाँ, छुरी—काँटा, रंगे हुए वस्त्र, लाख की वस्तुएँ, नमदे, चमड़े का सामान, संगमरमर के पत्थर का काम और क़ालीनों की बुनाई प्रमुख है।

उच्च न्यायालय

मेहरानगढ़ के क़िले में वाद्य यंत्र बजाता जोधपुर वासी
राजस्थान के दूसरे सबसे बड़े शहर जोधपुर में राज्य का उच्च न्यायालय स्थित है।

शिक्षण संस्थान

यहाँ अन्य संस्थानों के साथ-साथ:-
  • जोधपुर विश्वविद्यालय
  • एम.बी.एम. इंजीनियरिंग कॉलेज
  • डाक्टर एस.एन. मेडिकल कॉलेज
  • जे.डी. मेमोरियल फ़ैकल्टी आफ़ फ़ार्मेसी
  • गवर्नमेंट पालीटेक्निक कॉलेज
  • जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (1962 में स्थापित)

पर्यटन

भारत में राजस्‍थान को मरुस्‍थलों का राजा कहा जाता है। यहाँ अनेक ऐसे स्‍थान हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्‍हीं में से एक है-जोधपुर। 15वीं शदी में निर्मित क़िला और महलें यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा है। पहाड़ी के शिखर और शहर के अंतिम छोर पर अवस्थित मेहरानगढ़ क़िला मध्‍यकालीन राजशाही का मानो प्रति‍बिंब है।

खानपान

यहाँ ख़ासतौर पर दूध निर्मित खाद्य पदार्थों का ज्‍यादा प्रयोग होता है। जैसे मावा का लड्डू, क्रीम युक्‍त लस्‍सी, मावा कचौड़ी, और दूध फिरनी आदि।

उत्‍सव

  • जोधपुर में कुछ प्रमुख उत्सव है जो बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है।
  • मारवाड़ उत्‍सव, नागौर का प्रसिद्ध पशु मेला, कागा में शीतलामाता का उत्‍सव और पीपर का गंगुआर मेला।

जनसंख्या

जोधपुर शहर की जनसंख्या 2001 8,46,408 है। और जोधपुर ज़िले की कुल जनसंख्या 28,80,777 है।

जयपुर


जयपुर
गुलाबी शहर
जयपुर का हवामहल
जयपुर का हवामहल


Flag of India.svg भारत

राजस्थान

जयपुर

6,663,971 (2011 के अनुसार )

200.4 कि.मी² (77 वर्ग मील)
• 431 मीटर (1,414 फी॰)

 जयपुर  जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता है, भारत में राजस्थान राज्य की राजधानी है। आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन रजवाड़े की भी राजधानी रहा है। इस शहर की स्थापना १७२८ में आंबेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खूबी है। १८७६ में तत्कालीन महाराज सवाई रामसिंह ने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से आच्छादित करवा दिया था। तभी से शहर का नाम गुलाबी नगरी पड़ा है।
शहर चारों ओर से दीवारों और परकोटों से घिरा हुआ है, जिसमें प्रवेश के लिए सात दरवाजे हैं। बाद में एक और द्वार भी बना जो न्यू गेट कहलाया। पूरा शहर करीब छह भागों में बँटा है और यह १११ फुट(३४ मी.) चौड़ी सड़कों से विभाजित है। पाँच भाग मध्य प्रासाद भाग को पूर्वी, दक्षिणी एवं पश्चिमी ओर से घेरे हुए हैं, और छठा भाग एकदम पूर्व में स्थित है। प्रासाद भाग में हवा महल परिसर, व्यवस्थित उद्यान एवं एक छोटी झील हैं। पुराने शह के उत्तर-पश्चिमी ओर पहाड़ी पर नाहरगढ़ दुर्ग शहर के मुकुट के समान दिखता है। इसके अलावा यहां मध्य भाग में ही सवाई जयसिंह द्वारा बनावायी गईं वेधशाला, जंतर मंतर, जयपुर भी हैं।
जयपुर को आधुनिक शहरी योजनाकारों द्वारा सबसे नियोजित और व्यवस्थित शहरों में से गिना जाता है। शहर के वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य का नाम आज भी प्रसिद्ध है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस पर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था। १९वीं सदी में इस शहर का विस्तार शुरु हुआ तब इसकी जनसंख्या १,६०,००० थी जो अब बढ़ कर २००१ के आंकड़ों के अनुसार २३,३४,३१९ हो चुकी है। यहाँ के मुख्य उद्योगों में धातु, संगमरमर, वस्त्र-छपाई, हस्त-कला, रत्न व आभूषण का आयात-निर्यात तथा पर्यटन आदि शामिल हैं। जयपुर को भारत का पेरिस भी कहा जाता है। इस शहर की वास्तु के बारे में कहा जाता है , कि शहर को सूत से नाप लीजिये, नाप-जोख में एक बाल के बराबर भी फ़र्क नही मिलेगा।

इतिहास

सत्रहवीं शताब्दी मे जब मुगल अपनी ताकत खोने लगे,तो समूचे भारत में अराजकता सिर उठाने लगी,ऐसे दौर में राजपूताना की आमेर रियासत,एक बडी ताकत के रूप में उभरी.जाहिर है कि महाराजा सवाई जयसिंह को तब मीलों के दायरे में फ़ैली अपनी रियासत संभालने और सुचारु राजकाज संचालन के लिये आमेर छोटा लगने लगा,और इस तरह से इस नई राजधानी के रूप में जयपुर की कल्पना की गई, और बडी तैयारियों के साथ इस कल्पना को साकार रूप देने की शुरुआत हुई. इस शहर की नींव कहां रखी गई,इसके बारे मे मतभेद हैं,किंतु इतिहासकारों के अनुसार तालकटोरा के निकट स्थित शिकार की होदी से इस शहर के निर्माण की शुरुआत हुई।
राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने यह शहर बसाने से पहले इसकी सुरक्षा की भी काफी चिंता की थी और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही सात मजबूत दरवाजों के साथ किलाबंदी की गई थी। जयसिंह ने हालाँकि मराठों के हमलों की चिंता से अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनवाई थी, लेकिन उन्हें शायद मौजूदा समय की सुरक्षा समस्याओं का भान नहीं था। इतिहास की पुस्तकों में जयपुर के इतिहास के अनुसार यह देश का पहला पूरी योजना से बनाया गया शहर था और स्थापना के समय राजा जयसिंह ने अपनी राजधानी आमेर में बढ़ती आबादी और पानी की समस्या को ध्यान में रखकर ही इसका विकास किया था। नगर के निर्माण का काम १७२७ में शुरू हुआ और प्रमुख स्थानों के बनने में करीब चार साल लगे। यह शहर नौ खंडों में विभाजित किया गया था, जिसमें दो खंडों में राजकीय इमारतें और राजमहलों को बसाया गया था। राजा को शिल्पशास्त्र के आधार पर यह नगर बसाने की राय एक बंगाली ब्राह्मण विद्याधर भट्टाचार्य ने दी थी।
यह शहर प्रारंभ से ही 'गुलाबी' नगर नहीं था बल्कि अन्य सामान्य नगरों की ही तरह था, लेकिन १८५३ में जब वेल्स के राजकुमार आए तो महाराजा रामसिंह के आदेश से पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंग जादुई आकर्षण प्रदान करने की कोशिश की गई थी। उसी के बाद से यह शहर 'गुलाबी नगरी' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुंदर भवनों के आकर्षक स्थापत्य वाले, दो सौ वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जयपुर में जलमहल, जंतर-मंतर, आमेर महल, नाहरगढ़ का किला, हवामहल और आमेर का किला राजपूतों के वास्तुशिल्प के बेजोड़ नमूने हैं।
जयपुर में आतंकवाद - १३ मई, २००८ को जयपुर में श्रृंखलाबद्ध सात बम विस्फोट किए गए। विस्फोट १२ मिनट की वधि के भीतर जयपुर के विभिन्न स्थानों पर हुए‍। आठवाँ बम निष्क्रिय पाया गया। घटना में ८० से अधिक लोगों कि मृत्यु व डेढ़ सौ से अधिक घायल हुए।

स्थापत्य

आमेर का किला
नियोजित तरीके से बसाये गये इस जयपुर में महाराजा के महल,औहदेदारों की हवेली और बाग बगीचे,ही नही बल्कि आम नागरिकों के आवास और राजमार्ग बनाये गये.गलियों का और सडकों का निर्माण वास्तु के अनुसार और ज्यामितीय तरीके से किया गया,नगर को सुरक्षित रखने के लिये,इस नगर के चारो ओर परकोटा बनवाया गया,और पश्चिमी पहाडी पर नाहरगढ का किला बनवाया गया.पुराने दुर्ग जयगढ मे हथियार बनाने का कारखाना बनवाया गया,जिसे देख कर आज भी वैज्ञानिक चकित हो जाते हैं,इस कारखाने और अपने शहर जयपुर के निर्माता सवाई जयसिंह की स्मॄतियों को संजोये विशालकाय जयबाण तोप आज भी सीना ताने इस नगर की सुरक्षा करती महसूस होती है.महाराजा सवाई जयसिंह ने जयपुर को नौ आवासीय खण्डों मे बसाया,जिन्हें चौकडी कहा जाता है,इनमे सबसे बडी चौकडी सरहद में राजमहल,रनिवास,जंतर मंतर,गोविंददेवजी का मंदिर,आदि हैं,शेष चौकडियों में नागरिक आवास, हवेलियां और कारखाने आदि बनवाये गये.प्रजा को अपना परिवार समझने वाले सवाई जयसिंह ने सुन्दर शहर को इस तरह से बसाया कि यहां पर नागरिकों को मूलभूत आवश्यकताओं के साथ अन्य किसी प्रकार की कमी न हो,सुचारु पेयजल व्यवस्था,बागबगीचे,कल कारखाने आदि के साथ वर्षाजल का संरक्षण और निकासी का प्रबंध भी करवाया.सवाई जयसिंह ने लम्बे समय तक जयपुर में राज किया,इस शहर में हस्तकला,गीत संगीत,शिक्षा,और रोजगार आदि को उन्होने खूब प्रोत्साहित किया.वास्तु अनुरुप ईशर लाट,हवामहल,रामनिवास बाग,और विभिन्न कलात्मक मंदिर, शिक्षण संस्थान,आदि का निर्माण करवाया.
बाजार- जयपुर प्रेमी कहते हैं कि जयपुर के सौन्दर्य को को देखने के लिये कुछ खास नजर चाहिये, बाजारों से गुजरते हुए,जयपुर की बनावट की कल्पना को आत्मसात कर इसे निहारें तो पल भर में इसका सौन्दर्य आंखों के सामने प्रकट होने लगता है. लम्बी चौडी और ऊंची प्राचीर तीन ओर फ़ैली पर्वतमाला सीधे सपाट राजमार्ग गलियां चौराहे चौपड भव्य राजप्रसाद.मंदिर और हवेली,बाग बगीचे,जलाशय,और गुलाबी आभा से सजा यह शहर इन्द्रपुरी का आभास देने लगता है,जलाशय तो अब नहीं रहे,किन्तु कल्पना की जा सकती है,कि अब से कुछ दशक पहले ही जयपुर परकोटे में ही सिमटा हुआ था,तब इसका भव्य एवं कलात्मक रूप हर किसी को मन्त्र मुग्ध कर देता होगा. आज भी जयपुर यहां आने वाले सैलानियों को बरसों बरस सहेज कर रखने वाले रोमांचकारी अनुभव देता है.

जयपुर का बदलाव

जयपुर की रंगत अब बदल रही है। हाल ही में जयपुर को विश्व के दस सबसे खूबसूरत शहरों में शामिल किया गया है।महानगर बनने की ओर अग्रसर जयपुर में स्वतन्त्रता के बाद कई महत्वाकांक्षी निर्माण हुए। एशिया की सबसे बडी आवासीय बस्ती मानसरोवर, राज्य का सबसे बडा सवाई मानसिंह चिकित्सालय, विधानसभा भवन, अमर जवान ज्योति, एम.आई.रोड, सेन्ट्रल पार्क और विश्व के प्रसिद्ध बैंक इसी कडी में शामिल हैं। पिछले कुछ सालों से जयपुर में मेट्रो संस्कॄति के दर्शन होने लगे हैं। चमचमाती सडकें, बहुमंजिला शापिंग माल, आधुनिकता को छूती आवासीय कालोनियां, आदि महानगरों की होड करती दिखती हैं। पुराने जयपुर और नये जयपुर में नई और पुरानी संस्कॄति के दर्शन जैसे इस शहर के विकास और इतिहास दोनों को स्पष्ट करते हैं।

दर्शनीय स्थल

शहर में बहुत से पर्यटन आकर्षण हैं, जैसे जंतर मंतर, जयपुर, हवा महल, सिटी पैलेस, गोविंद देवजी का मंदिर, बी एम बिड़ला तारामण्डल, आमेर का किला, जयगढ़ दुर्ग आदि। जयपुर के रौनक भरे बाजारों में दुकानें रंग बिरंगे सामानों से भरी हैं , जिनमें हथकरघा उत्पाद, बहुमूल्य पत्थर, हस्तकला से युक्त वनस्पति रंगों से बने वस्त्र, मीनाकारी आभूषण, पीतल का सजावटी सामान,राजस्थानी चित्रकला के नमूने, नागरा-मोजरी जूतियाँ, ब्लू पॉटरी, हाथीदांत के हस्तशिल्प और सफ़ेद संगमरमर की मूर्तियां आदि शामिल हैं। प्रसिद्ध बाजारों में जौहरी बाजार, बापू बाजार, नेहरू बाजार, चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया बाजार और एम.आई. रोड़ के साथ लगे बाजार हैं ।
सिटी पैलेस
राजस्थानी व मुगल शैलियों की मिश्रित रचना एक पूर्व शाही निवास जो पुराने शहर के बीचोंबीच है। भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिके नक्काशीदार मेहराब, सोने व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों ले अलंकृत है। संगमरमर के दो नक्काशीदार हाथी प्रवेश द्वार पर प्रहरी की तरह खड़े है। जिन परिवारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजाओं की सेवा की है। वे लोग गाइड के रूप में कार्य करते है। पैलेस में एक संग्राहलय है जिसमें राजस्थानी पोशाकों व मुगलों तथा राजपूतों के हथियार का बढ़िया संग्रह हैं। इसमें विभिन्न रंगों व आकारों वाली तराशी हुई मूंठ की तलवारें भी हैं, जिनमें से कई मीनाकारी के जड़ऊ काम व जवाहरातों से अलंकृत है तथा शानदार जड़ी हुई म्यानों से युक्त हैं। महल में एक कलादीर्घा भी हैं जिसमें लघुचित्रों, कालीनों, शाही साजों सामान और अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ खगोल विज्ञान की रचनाओं का उत्कृष्ट संग्रह है जो सवाई जयसिंह द्वितीय ने विस्तृत रूप से खगोल विज्ञान का अध्ययन करने के लिए प्राप्त की थी।
जंतर मंतर, जयपुर
एक पत्थर की वेधशाला। यह जयसिंह की पाँच वेधशालाओं में से सबसे विशाल है। इसके जटिल यंत्र, इसका विन्यास व आकार वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया गया है। यह विश्वप्रसिद्ध वेधशाला जिसे २०१२ में यूनेस्को ने विश्व धरोहरों में शामिल किया है, मध्ययुगीन भारत के खगोलविज्ञान की उपलब्धियों का जीवंत नमूना है! इनमें सबसे प्रभावशाली रामयंत्र है जिसका इस्तेमाल ऊंचाई नापने के लिए (?) किया जाता है।
हवा महल
ईसवी सन् 1799 में निर्मित हवा महल राजपूत स्थापत्य का मुख्य प्रमाण चिन्ह। पुरानी नगरी की मुख्य गलियों के साथ यह पाँच मंजिली इमारत गुलाबी रंग में अर्धअष्टभुजाकार और परिष्कृत छतेदार बलुए पत्थर की खिड़कियों से सुसज्जित है। शाही स्त्रियां शहर का दैनिक जीवन व शहर के जुलूस देख सकें इसी उद्देश्य से इमारत की रचना की गई थी।
गोविंद देवजी का मंदिर
भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्ध, बिना शिखर का मंदिर। यह चन्द्रमहल के पूर्व में बने जन-निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। संरक्षक देवता गोविंदजी की मूर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था।
सरगासूली-
(ईसर लाट) - त्रिपोलिया बाजार के पश्चिमी किनारे पर उच्च मीनारनुमा इमारत जिसका निर्माण ईसवी सन् 1749 में सवाई ईश्वरी सिंह ने अपनी मराठा विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
रामनिवास बाग
एक चिड़ियाघर, पौधघर, वनस्पति संग्रहालय से युक्त एक हरा भरा विस्तृत बाग, जहाँ खेल का प्रसिद्ध क्रिकेट मैदान भी है। बाढ राहत परियोजना के अंतर्गत ईसवी सन् 1865 में सवाई राम सिंह द्वितीय ने इसे बनवाया था। सर विंस्टन जैकब द्वारा रूपांकित, अल्बर्ट हाल जो भारतीय वास्तुकला शैली का परिष्कृत नमूना है, जिसे बाद में उत्कृष्ट मूर्तियों, चित्रों, सज्जित बर्तनों, प्राकृतिक विज्ञान के नमूनों, इजिप्ट की एक ममी और फारस के प्रख्यात कालीनों से सुसज्जित कर खोला गया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए एक प्रेक्षागृह के साथ रवीन्द्र मंच, एक आधुनिक कलादीर्घा व एक खुला थियेटर भी इसमें बनाया गया हैं।
गुड़िया घर - (समयः 12 बजे से सात बजे तक)- पुलिस स्मारक के पास मूक बधिर विद्यालय के अहाते में विभिन्न देशों की प्यारी गुड़ियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं।
बी एम बिड़ला तारामण्डल
(समयः 12 बजे से सात बजे तक)- अपने आधुनिक कम्पयूटरयुक्त प्रक्षेपण व्यवस्था के साथ इस ताराघर में श्रव्य व दृश्य शिक्षा व मनोरंजनों के साधनों की अनेखी सुविधा उपलब्घ है। विद्यालयों के दलों के लिये रियायत उपलब्ध है। प्रत्येक महीने के आखिरी बुघवार को यह बंद रहता है।
गलताजी
एक प्राचीन तार्थस्थल, निचली पहाड़ियों के बीच बगीचों से परे स्थित। मंदिर, मंडप और पवित्र कुंडो के साथ हरियाली युक्त प्राकृतिक दृश्य इसे आनन्ददायक स्थल बना देते हैं। दीवान कृपाराम द्वारा निर्मित उच्चतम चोटी के शिखर पर बना सूर्य देवता का छोटा मंदिर शहर के सारे स्थानों से दिखाई पड़ता है।
जैन मंदिर
आगरा मार्ग पर बने इस उत्कृष्ट जैन मंदिर की दीवारों पर जयपुर शैली में उन्नीसवीं सदी के अत्यधिक सुंदर चित्र बने हैं।
मोती डूंगरी और लक्ष्मी नारायण मंदिर
मोती डूंगरी एक निजी पहाड़ी ऊंचाई पर बना किला है जो स्कॉटलैण्ड के किले की तरह निर्मित है। कुछ वर्षों पहले, पहाड़ी पादगिरी पर बना गणेश मंदिर और अद्भुत लक्ष्मी नारायण मंदिर भी उल्लेखनीय है।
स्टैच्यू सर्किल - चक्कर के मध्य सवाई जयसिंह का स्टैच्यू बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से बना हुआ है। इसे जयपुर के संस्थापक को श्रद्धांजलि देने के लिए नई क्षेत्रीय योजना के अंतर्गत बनाया गया है। इस में स्थापित सवाई जयसिंह की भव्यमूर्ति के मूर्तिशिल्पी स्व.महेंद्र कुमार दास हैं.
अन्य स्थल
आमेर मार्ग पर रामगढ़ मार्ग के चौराहे के पास रानियों की याद में बनी आकर्षक महारानी की कई छतरियां है। मानसागर झील के मध्य, सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा निर्मित जल महल, एक मनोहारी स्थल है। परिष्कृत मंदिरों व बगीचों वाले कनक वृंदावन भवन की पुरातन पूर्णता को विगत समय में पुनर्निर्मित किया गया है। इस सड़क के पश्चिम में गैटोर में शाही शमशान घाट है जिसमें जयपुर के सवाई ईश्वरी सिंह के सिवाय समस्त शासकों के भव्य स्मारक हैं। बारीक नक्काशी व लालित्यपूर्ण आकार से युक्त सवाई जयसिंह द्वितीय की बहुत ही प्रभावशाली छतरी है। प्राकृतिक पृष्ठभूमि से युक्त बगीचे आगरा मार्ग पर दीवारों से घिरे शहर के दक्षिण पूर्वी कोने पर घाटी में फैले हुए हैं।
गैटोर
सिसोदिया रानी के बाग में फव्वारों, पानी की नहरों, व चित्रित मंडपों के साथ पंक्तिबद्ध बहुस्तरीय बगीचे हैं व बैठकों के कमरे हैं। अन्य बगीचों में, विद्याधर का बाग बहुत ही अच्छे ढ़ग से संरक्षित बाग है, इसमें घने वृक्ष, बहता पानी व खुले मंडप हैं। इसे शहर के नियोजक विद्याधर ने निर्मित किया था।
आमेर
यह कभी सात सदी तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी थी।
आमेर और शीला माता मंदिर - लगभग दो शताब्दी पूर्व राजा मान सिंह, मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है। मावठा झील के शान्त पानी से यह महल सीधा उभरता है और वहाँ सुगम रास्ते द्वारा पहुंचा जा सकता है। सिंह पोल और जलेब चौक तक अकसर पर्यटक हाथी पर सवार होकर जाते हैं। चौक के सिरे से सीढ़ियों की पंक्तियाँ उठती हैं, एक शिला माता के मंदिर की ओर जाती है और दूसरी महल के भवन की ओर। यहां स्थापित करने के लिए राजा मानसिंह द्वारा संरक्षक देवी की मूर्ति, जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते है, पूर्वी बंगाल (जो अब बंगला देश है) के जेसोर से यहां लाई गई थी। एक दर्शनीय स्तंभों वाला हॉल दीवान-ए-आम और एक दोमंजिला चित्रित प्रवेशद्वार, गणेश पोल आगे के प्रांगण में है। गलियारे के पीछे चारबाग की तरह का एक रमणीय छोटा बगीचा है जिसकी दाई तरफ सुख निवास है और बाई तरफ जसमंदिर। इसमें मुगल व राजपूत वास्तुकला का मिश्रित है, बारीक ढंग से नक्काशी की हुई जाली की चिलमन, बारीक शीशों और गचकारी का कार्य और चित्रित व नक्काशीदार निचली दीवारें । मावठा झील के मध्य में सही अनुपातित मोहन बाड़ी या केसर क्यारी और उसके पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग ऊपर बने महलों का मनोहर दृश्य दिखाते है।
पुराना शहर - कभी राजाओं, हस्तशिल्पों व आम जनता का आवास आमेर का पुराना क़स्बा अब खंडहर बन गया है। आकर्षक ढंग से नक्काशीदार व सुनियोजित जगत शिरोमणि मंदिर, मीराबाई से जुड़ा एक कृष्ण मंदिर, नरसिंहजी का पुराना मंदिर व अच्छे ढंग से बना सीढ़ियों वाला कुआँ, पन्ना मियां का कुण्ड समृद्ध अतीत के अवशेष हैं ।
जयगढ़ किला
मध्ययुगीन भारत के कुछ सैनिक इमारतों में से एक। महलों, बगीचों, टांकियों, अन्य भन्डार, शस्त्रागार, एक सुनोयोजित तोप ढलाई-घर, अनेक मंदिर, एक लंबा बुर्ज और एक विशालकाय तोप - जयबाण जो देश की सबसे बड़ी तोपों में से एक है। जयगढ़ के फैले हुए परकोटे, बुर्ज और प्रवेश द्वार पश्चिमी द्वार क्षितिज को छूते हैं. नाहरगढः जयगढ की पहाड़ियों के पीछे स्थित गुलाबी शहर का पहरेदार है - नाहरगढ़ किला। यद्यपि इसका बहुत कुछ हिस्सा ध्वस्त हो गया है, फिर भी सवाई मान सिंह द्वितीय व सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा बनाई मनोहर इमारतें किले की रौनक बढाती हैं सांगानेर - (१२ किलोमीटर) - यह टोंक जाने वाले राजमार्ग पर स्थित है। इसके ध्वस्त महलों के अतिरिक्त, सांगानेर के उत्कृष्ट नक्काशीदार जैन मंदिर है। दो त्रिपोलिया (तीन मुख्य द्वार ) के अवशेषो द्वारा नगर में प्रवेश किया जाता है।
शिल्प उद्योग के लिए शहर महत्वपूर्ण केन्द्र है और ठप्पे व जालीदार छपाई की इकाइयों द्वारा हाथ से बने बढिया कपड़े यहां बनते है। यह कपड़ा देश व विदेश में प्रसिद्ध है।
बगरू - (३४ किलोमीटर) - अजमेर मार्ग पर, पुराना किला, अभी भी अच्छी अवस्था में है। यह अपने हाथ की छपाई के हथकरघा उद्योग के लिए उल्लेखनीय है, जहां सरल तकनीको का प्रयोग होता है। इस हथकरघाओं के डिजाइन कम जटिल व मटियाले रंगो के होते है।
रामगढ़ झील - (३२ किलोमीटर उत्तर - पूर्व) - पेड़ो से आच्छादित पहाड़ियो के बीच एक ऊंचा बांध बांध कर एक विशाल कृत्रिम झील की निर्माण किया गया है। यद्यपि जमवा माता का मंदिर व पुराने किले के खंडहर इसके पुरावशेष है। विशेषकर बारिश के मौसम में इसके आकर्षक प्राकृतिक दृश्य इसको एक बेहतर पिकनिक स्थल बना देते है।
सामोद - (४० किलोमीटर उत्तर - पूर्व) - सुन्दर सामोद महल का पुनर्निमाण किया गया है तथा यह राजपूत हवेली वास्तुकला का बेहतर नमूना है व पर्यटन लिए उत्तम स्थल।
विराट नगर- (शाहपुरा - अलवर मार्ग 86 किलोमीटर दूर) - खुदाई करने पर निकले एक वृत्ताकार बुद्ध मंदिर के अवशेषों से युक्त एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान है जो राजस्थान का असाधारण व भारत का आरंभिक प्रसिद्ध मंदिर है। बैराठ में मौर्य, मुगल व राजपूत समय के स्मृतिचिन्ह भी हैं. अकबर द्वारा निर्मित एक खान (?), एक रमणीय मुगल बगीचा और जहांगीर द्वारा निर्मित चित्रित छतरियों व दीवारों से युक्त असाधारण इमारत अन्य आकर्षण हैं. सांभर
(पश्चिम से 14 किलोमीटर) - नमक की विशाल झील, पवित्र देवयानी कुंड, महल और पास ही स्थित नालियासार के प्रसिद्ध है।
जयसिंहपुरा खोर - (अजमेर मार्ग से 12 किलोमीटर) - मीणा कबीले के इस आवास में एक दुर्गम किला, एक जैन मंदिर और हरे भरे वृक्षों के बीच एक बावड़ी है।
माधोगढ़ - तुंगा (बस्सी लालसोट आगरा मार्ग से 40 किलोमीटर) - जयपुर व मराठा सेना के बीच हुए एतिहासिक युग का तुंगा गवाह है। सुंदर आम के बागों के बीच यह किला बसा है।
चाकसू -- चाकसू से 2 किमी पूर्व मे शीतला माता का मंदिर है जिसमे प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण प्रतिपदा अष्टमी को यहां मेला भरता है जिसमे लाखो की तादात मे लोग इक्टटे होते है ।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

नदी नहीं हैं गंगा

संस्कृति हैं गंगा: गंगा – यह एक शब्द नहीं, नदी नहीं, जलधारा नहीं, सिंचाई साधन नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। संस्कृति की यह पहचान होती है कि वह चिरकालिक होती है। देश मिट जाते हैं, सीमाएं बदल जाती हैं, नाम बदल जाते हैं, पर संस्कृति इन सब परिवर्तनों से अछूती रहती है। पर्शिया का नाम सुना होगा आपने, वह देश खत्म हो गया, पर संस्कृति जीवित रही। बहुत थोड़े से लोगों ने अपनी उसी विरासत को संभाल भारत में शरण ली और वे पारसी आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। संस्कृति का अर्थ स्पष्ट करने के बाद अब यह बताना आसान हो चला है कि गंगा संस्कृति कैसे हैं। भारत का आधार हिंदुत्व है और हिंदुत्व सम्पूर्णता में त्रिदेवॉ से संचालित है। जगत के रचेयता ब्रह्मा जी, पालक विष्णु जी और संहारकर्ता शिवजी। गंगा इन तीनों से संबंध रखती हैं। वामनावतार में देवताओं ने विष्णु जी के चरण धोये तो उस चरणामृत को ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में रख लिया। भगीरथ की तपस्या से जब गंगा उस कमंडल से निकल कर पृथ्वी पर आयीं तो स्वयं शिवजी ने उन्हें अपने शीश पर धारण किया। हर पूजा में सबसे पहले गणेश पूजन होता है, पर गंगा जल से शुद्धिकरण उस गणेश पूजन से भी पहले होता है। गंगा जल के छींटे पड़ते ही भूमि, शरीर, आत्मा परम पवित्र हो जाती है। कहा जाता है कि गंगा में डुबकी लगाते ही व्यक्ति समस्त पापों से छूट जाता है। इस प्रकार हिंदुत्व की कोई धारा, कोई पूजा, कोई विधि गंगा से अछूती नहीं है। गंगा हिन्दू संस्कृति का आधार हैं।
जीवित हैं गंगा: जीवित और मृत में सबसे बड़ा अंतर यह है कि जीवित शरीर का क्षरण नहीं होता और प्राण के स्थूल शरीर से अलग होते ही शरीर का क्षरण शुरू हो जाता है। कोई भी जल लीजिये, शुद्ध से शुद्ध, कुछ समय बाद वह सड़ जाएगा। गंगा जल को वर्षों रखे रहिए, वह कभी नहीं सड़ता। वैज्ञानिकों ने जाने कितने सौ सालों पुराने गंगाजल के सैंपल अपनी लैब में रखे हैं, जो जस के तस हैं। गंगा जल में कभी कीड़े नहीं पड़ते और न ही इसमें कभी दुर्गंध आती है। हमारे पूर्वजों को भी गंगाजल के इस गुण का पता था। पूजा पद्धति में लिखा है कि पूजा में बासी जल नहीं रखना चाहिए, पर यह नियम गंगाजल पर लागू नहीं है। गंगाजल किसी भी जल के साथ मिलकर अपनी प्रकृति नहीं बदलता। नदियां, नाले गंगा में मिलकर गंगाजल ही हो जाते हैं। जीवित हैं गंगा इसीलिए जीवनदायिनी भी हैं। जो जीवित है वही दूसरे को भी जीवन दे सकता है। जो स्वयं जीवन से च्युत है वह किसी और को भी जीवन नहीं दे सकता। गंगा सदियों से भारत की शारीरिक और आध्यात्मिक प्यास बुझा रही हैं। यह भारतभूमि गंगा जल से सिंचित है। अन्न के भंडार गंगा की देन हैं। इस भूमि को उर्वरा शक्ति गंगा का उपहार है। आध्यात्मिक शक्ति हैं गंगा: यह केवल कपोल कल्पित कल्पना या अंधविश्वास नहीं बल्कि स्थापित सत्य है कि गंगा एक आध्यात्मिक शक्ति हैं। जाने कितने ऋषि-मुनियों ने गंगा तट पर बैठ कर साधना की है। यह क्रम एक-दो वर्ष का नहीं बल्कि अनंत काल से चला आ रहा है। शायद तब से जब से धरती पर गंगा का अवतरण हुआ। उन सभी की आध्यात्मिक ऊर्जा का अंश गंगाजल में विद्यमान है। जब भी कोई व्यक्ति साधनारत होता है तो उसके शरीर का ऊर्जापुंज ब्रह्मांड की ऊर्जा से एकाकार हो जाता है। इसके साथ ही उसके चारों ओर की ऊर्जा भी सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती है। उसका आभामंडल उसकी साधना के साथ बढ़ता जाता है, इसके साथ ही उस आभामंडल का दायरा भी बढ़ता है। जल में ऊर्जा को अवशोषित करने का गुण सर्वाधिक होता है। ऐसे में यदि जलराशि के निकट कोई व्यक्ति साधनरत है तो उस जलराशि पर उसका प्रभाव पड़ेगा ही पड़ेगा। यही कारण है कि उन लाखों-करोड़ों ऋषियों की साधना की शक्ति से गंगा स्वयं भी एक आध्यात्मिक शक्ति हो गयी हैं। इस लेख में जितनी बार मैंने ‘गंगा’ लिखा उतनी बार कुछ क्षणो के लिए मैं विचारशून्य हो गयी, मेरे शब्द समाप्त हो गए। इस एक शब्द के आगे क्या लिखूँ समझ नहीं आया। अभी भी लग रहा है, कि सब कुछ छूट गया। गंगा माँ हैं, गंगा देवी हैं, गंगा देवों का उपहार हैं, गंगा भारत हैं, गंगा जीवन हैं। गंगा पापहरणी हैं, मोक्षदायिनी हैं। गंगा में विलीन होकर गंदा नाला भी गंगाजल हो जाता है। समस्त नदियां सागर में गिरकर अपना अस्तित्व खो देती हैं, पर गंगा वह नदी हैं जो सागर में गिरकर सागर को भी सागर नहीं रहने देतीं, उसे गंगासागर बना देती हैं।
देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे! त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे! शंकर मौली विहारिणी विमले! मम मतिरास्ताम तव पदकमले !

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

कम मात्रा में 5-6 बार खाना सेहत को बेहतर

बरसों तक दिन में तीन बार खाने का सिस्टम बना रहा। फिर इसमें कुछ बदलाव आए और एक्सपर्ट्स ने दिन में तीन बार मेन मील (ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर) के बीच में 2-3 बार स्नैक्स खाने की सिफारिश की। हाल में एक स्टडी में कहा गया कि रोजाना 9 बार खाना सेहत के लिए सबसे मुफीद है।
हाल में एक स्टडी आई, जिसमें कहा गया कि दिन में 9 बार खाने से ब्लड प्रेशर और कॉलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है। साथ ही, वजन भी कंट्रोल में रहेगा। यह स्टडी लंदन के इंपीरियल कॉलेज के प्रफेसरों ने की। स्टडी में ब्रिटेन, अमेरिका, चीन और जापान के 2000 लोगों को शामिल किया गया। सभी को बराबर मात्रा और बराबर कैलरी का खाना दिया गया। लेकिन आधे लोगों ने दिन में 6 बार से कम बार खाया और बाकी ने 6 बार से ज्यादा। जिन लोगों ने कम बार खाना खाया, उनका ब्लड प्रेशर दूसरे लोगों से ज्यादा दर्ज किया गया। पहले ग्रुप के लोगों का वजन भी स्टडी में शामिल बाकी लोगों से थोड़ा ज्यादा पाया गया। यहां इस बात का ध्यान रखा गया कि खाना बेशक कई बार खाया लेकिन खाने की मात्रा काफी कम थी। हर बार 300 कैलरी का खाना दिया गया और हर बार खाने के बीच में कुछ भी खाने से परहेज किया गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बार बार, पर ठूस-ठूस कर खाने से बेहतर है कम मात्रा में कई बार खाना।

कई बार, पर रेग्युलर खाएं
यह सच है कि दिन भर में 9 बार खाना प्रैक्टिकली मुमकिन नहीं लगता। ऐसे में एक्सपर्ट मानते हैं कि 9 बार न सही, लेकिन दिन भर में कम मात्रा में 5-6 बार खाना सेहत को बेहतर करता है।

1. बढ़ता है मेटाबॉलिज्म
कई बार खाना खाने से हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ता है। मेटाबॉलिज्म उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें खाना पचने के बाद उस रूप में बदलता है, जो शरीर के सेल्स और टिश्यूज इस्तेमाल करते हैं। मेटाबॉलिज्म के दौरान खाना एनर्जी, एंजाइम्स और फैट में बदलता है। एनर्जी विभिन्न काम करने में इस्तेमाल हो जाती है, एंजाइम्स हॉर्मोंस बनाते हैं और पाचन में मदद करते हैं, जबकि फैट शरीर में जमा हो जाता है। मेटाबॉलिज्म ठीक से नहीं होता तो शरीर में फैट बढ़ जाता है। इससे कॉलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर, दोनों बढ़ने की आशंका होती है।

2. हॉर्मोंस होते हैं बेहतर
कई बार खाना खाने से खून में मौजूद फैटी एसिड्स ज्यादा स्थिर रहते हैं। उनमें ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता। साथ ही इससे इम्युनिटी भी बढ़ती है। इससे हॉर्मोंस बेहतर होते हैं और डिप्रेशन नहीं होता। वहीं, लंबे समय तक भूखा रहने से शरीर को खाने की कमी महसूस होती है और इंसान चिड़चिड़ापन महसूस करता है।

3. ज्यादा फैट नहीं होगा जमा
कई बार खाने के साथ-साथ नियमित रूप से खाना भी जरूरी है। अगर आप नियमित रूप से नहीं खाएंगे तो शरीर यह जान नहीं पाएगा कि अगली बार खाना कब मिलेगा। ऐसे में शरीर एक डिफेंस मैकेनिज्म के तहत ज्यादा खाने को फैट के रूप में स्टोर करना शुरू कर देता है। इसके अलावा, मेटाबॉलिज्म के दौरान रिलीा होनेवाले एंजाइम्स भी बेकार जाते हैं। वे अपने तय वक्त पर रिलीज होते रहेंगे लेकिन खाना नहीं मिलने से शरीर इनका सही इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।

फल और सब्जियां बेहद जरूरी
हाल में ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक ने एक रिसर्च की। इसके अनुसार एक दिन में 7 हिस्से (सर्विंग) सब्जी-फल खाने वाले लोग दिमागी और शारीरिक रूप से ज्यादा फिट रहते हैं। ऐसे लोग खुश भी ज्यादा रहते हैं। स्टडी में एक सर्विंग 80 ग्राम की मानी गई। इस स्टडी में 80 हजार लोगों को शामिल किया गया था।

कितना खाएं
एक सर्विंग का मतलब एक सेब या एक नाशपाती या एक अमरूद या 15-20 अंगूर या पपीते की 2-3 फांक से है। इसी तरह सब्जियों का अनुमान कटोरी से लगा सकते हैं। मसलन एक सर्विंग का मतलब एक छोटी कटोरी। यानी तमाम फल और सब्जियां मिलाकर अगर दिन भर में 7 सर्विंग खाते हैं तो यह हमारी सेहत को सुधारता है। सब्जियों को खाने के साथ और फलों को बतौर स्नैक्स मील्स के बीच में खाना बेहतर है। इससे ज्यादा मात्रा में फल-सब्जियां खा पाएंगे और तले-भुने स्नैक्स से भी दूर रहेंगे।

क्या है फायदा
फल और सब्जियों में विटामिन और मिनरल्स होते हैं, जो शरीर की इम्युनिटी बढ़ाते हैं।
इनमें फाइबर काफी ज्यादा होता है, जो कॉलेस्ट्रोल को कम करने में मदद करता है।
फल-सब्जियों में फैट काफी कम होते हैं।
अगर ऊपर से नमक डाले बिना खाएं तो शरीर में फालतू सोडियम नहीं जाएगा। इससे ब्लड प्रेशर और कॉलेस्ट्रोल, दोनों कम रहेंगे।

ऐसे बांटें डाइट को
मेन मील: ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर
3-4 बार स्नैक्स: 2-3 बार फल और 1-2 बार हेल्दी स्नैक्स जैसे कि स्प्राउट्स, सूप आदि।
लिक्विड: दिन भर में 8-10 गिलास पानी। साथ में नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ, दूध आदि भी फायदेमंद।

शुगर में डाइट: टॉप गलतियां
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी बहुत-सी बीमारियों की वजह बन गई है। इनमें डायबीटीज सबसे ज्यादा होने वाली बीमारी है। डायबीटीज के मरीज कई बार अधूरी जानकारी और जागरूकता की कमी से खानपान में कुछ गलतियां करते हैं, जो कई बार बेहद नुकसानदेह साबित होती हैं। जाने-अनजाने अपनी खुराक को लेकर डायबीटीज के मरीजों द्वारा की जाने वाले 10 प्रमुख गलतियों की जानकारी दे रही हैं सर्वोदय हॉस्पिटल, फरीदाबाद में कंसल्टेंट न्यूट्रिशनिस्ट प्रियंका वर्मा:

1. सिर्फ 3 बार खाना
दिन में 6 से 7 बार खाना खाना चाहिए। हम जब भी खाना खाते हैं, हमारा खाना ग्लूकोज में बदलता है। उस वक्त इंसुलिन नामक हॉर्मोन उसे खून में जाने से रोकता है, लेकिन डायबीटीज होने पर इंसुलिन की कमी हो जाती है, जिससे ग्लूकोज को खून में मिलने से रोका नहीं जा सकता। अगर हम पुराने तरीके से 3 बार खाना (ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर) खाते हैं तो बीच में वक्त ज्यादा होने के कारण ज्यादा मात्रा में खाना खाया जाता है, जिससे ज्यादा ग्लूकोज बनता है और थोड़ा इंसुलिन उसे कंट्रोल नहीं कर पाता। अगर 6-7 बार थोड़ा-थोड़ा खाते हैं तो थोड़ा-थोड़ा ग्लूकोज बनता हैं और कम इंसुलिन भी उसे कंट्रोल कर लेता है।

2. अनियमित समय
डायबीटीज के मरीज को खाना तय वक्त पर लेना चाहिए। यह बीमारी शरीर के मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ देती है। अगर खाना वक्त-बेवक्त लिया जाए यानी किसी भी वक्त खाना खाएं तो मेटाबॉलिज्म पर और भी बुरा असर पड़ता है, जिससे शुगर कंट्रोल से बाहर हो जाती है। तय वक्त पर खाना खाने से मेटाबॉलिज्म में सुधार के साथ-साथ ब्लड शुगर पर भी अच्छा असर होता है।

3. दूसरों का डाइट चार्ट अपनाना
हर इंसान की शारीरिक बनावट और लाइफस्टाइल अलग-अलग होती है, जिसके मुताबिक उसका खाना और खाने की मात्रा तय की जाती है। आमतौर पर जो डाइट किसी एक के लिए फायदेमंद होगी, जरूरी नहीं कि बिल्कुल वही डाइट दूसरे इंसान के लिए भी उसी तरह फायदेमंद होगी। डायबीटीज के मरीज कई बार दूसरों के डाइट चार्ट को फॉलो करने लगते हैं। डायबीटीज के मरीज को किसी डाइट एक्सपर्ट की सलाह के बिना किसी और का डाइट चार्ट फॉलो नहीं करना चाहिए।

4. तय मात्रा से ज्यादा खाना
मरीज को खाना तय मात्रा में ही लेना चाहिए। ज्यादा मात्रा (चाहे खाना मरीज की सेहत के अनुकूल हो) लेने पर शुगर कंट्रोल से बाहर हो सकती है। इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि मनपसंद चीज को भी लिमिट में ही खाएं।

5. शुगर-फ्री चीजों का खूब इस्तेमाल
डायबीटीज के मरीज को शुगर, मिठाइयां आदि अपने खाने से बाहर करनी होती हैं लेकिन अगर मरीज शुगर-फ्री मिठाई, आइसक्रीम, जूस आदि का इस्तेमाल कर रहा है तो थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत हैं क्योंकि शुगर-फ्री चीजों में बेशक शुगर की जगह शुगर-फ्री इस्तेमाल की जाती है लेकिन फैट और कॉलेस्ट्रॉल इनमें होता ही है। यहां ध्यान देने की बात है कि डायबीटीज के मरीज को मीठे के साथ साथ फैट भी कम लेना चाहिए।

6. फलों को नजरअंदाज करना
फल और सब्जियां विटामिन और मिनरल का अच्छा सोर्स हैं। जिन फलों का (आम, चीकू, शरीफा, तरबूज आदि) ग्लाइसिमिक इंडेक्स ज्यादा होता है, उन्हें छोड़कर बाकी फलों को अपने रोजाना के खाने में जरूर शामिल करना चहिए। फल फाइबर के अच्छे सोर्स हैं, जो इंसुलिन की संवेदनशीलता को मजबूत करते हैं। इससे ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। फल मीठे की इच्छा को भी कम करते हैं।

7. डेयरी प्रॉडक्ट्स का ज्यादा इस्तेमाल
डेयरी प्रॉडक्ट्स नेचरल फैट के अच्छे सोर्स होते हैं। यहां यह याद रखने लायक बात है कि अगर आप डेयरी पदार्थ जैसे दूध, पनीर, खोआ आदि का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो वह फैट-फ्री हो। फुल क्रीम के बजाय टोंड मिल्क और उससे बनी चीजें खाएं।

8. खाना पकाने का गलत तरीका
डायबीटीज के मरीज को खाने में परहेज के साथ-साथ खाना बनाने के तरीके पर भी ध्यान देना चाहिए। खाना बनाने का तरीका उसकी क्वॉलिटी पर असर डाल सकता है, जैसे मांड निकला उबला चावल डायबीटीज के मरीज खा सकते हैं, जबकि बिरयानी या पुलाव इनके लिए अच्छा नहीं है। इसी तरह लौकी और भिंडी की सादा सब्जी डायबीटीज के मरीज के लिए अच्छी है लेकिन लौकी के कोफ्ते या क्रिस्पी मसालेदार भिंडी से इन्हें परहेज करना चाहिए। शुगर के मरीजों के लिए प्रेशर कुकिंग, रोस्टिंग और बेकिंग खाना बनाने के अच्छे तरीके हैं।

9. गलत कुकिंग का चुनाव
डायबीटीज के मरीज को कुकिंग ऑयल के रूप में सैचुरेटिड फैट जैसे देसी घी, मक्खन, नारियल तेल आदि नहीं लेना चाहिए। इन सैचुरेटिड फैट में कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा होती है, जो दिल पर बुरा असर डालती है। यह डायबीटीज के मरीजों के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। ऑलिव ऑयल, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी या तिल का तेल बदल-बदल कर अपने खाने में शामिल करें।

10. कार्बोहाइड्रेट की पूरी तरह छुट्टी
कार्बोहाइड्रेट को पूरी तरह खाने से बाहर करने की बजाय सेहत के लिए फायदेमंद कार्बोहाइड्रेट को खाने का हिस्सा बनाएं। मीठा, स्टार्च आदि कार्बोहाइड्रेट को अपने खाने में बाहर करें लेकिन फाइबर से भरपूर कार्बोहाइड्रेट जैसे कि फल, सब्जियां, साबुत दालें, साबुत अनाज अपने खाने में जरूर शामिल करें।
(अरविन्द कु पाण्डेय )

सोमवार, 19 नवंबर 2012

रानी लक्ष्मीबाई



रानी लक्ष्मीबाई (जन्म:19 नवंबर, 1835 - मृत्यु:17 अथवा 18 जून, 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।
  • रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्राम कहलाता है।
  • अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे।
  • अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

जीवन परिचय

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 को काशी के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, वाराणसी में हुआ था। इनके पिता का नाम 'मोरोपंत तांबे' और माता का नाम 'भागीरथी बाई' था। इनका बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को 'मनु' पुकारा जाता था। मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं। अपनी माँ की मृत्यु हो जाने पर वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएँ सीखीं। चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाने थे।
रानी लक्ष्मीबाई (1859)

शिक्षा

पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।

विवाह

समय बीता, मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। किन्तु 1853 तक उनके पुत्र एवं पति दोनों का देहावसान हो गया। रानी ने अब एक दत्तक पुत्र लेकर राजकाज देखने का निश्चय किया, किन्तु कम्पनी शासन उनका राज्य छीन लेना चाहता था। रानी ने जितने दिन भी शासन किया। वे अत्यधिक सूझबूझ के साथ प्रजा के लिए कल्याण कार्य करती रही। इसलिए वे अपनी प्रजा की स्नेहभाजन बन गईं थीं। रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्त्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्त्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे।

विपत्तियाँ

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा, इस्कॉन मन्दिर, बंगलोर
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रूप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 में मृत्यु हो गयी।

दयालु स्वभाव

रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन ग़रीबों में वस्त्रादि का वितरण कराया जाए।

झाँसी का युद्ध

उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेज़ों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।
रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श। रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।

अंग्रेज़ों की कूटनीति

रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा
अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।

मृत्यु

रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 18 जून 1858 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। -सुभद्रा कुमारी चौहान

अंग्रेज़ों का ज़ब्ती सिद्धांत

रानी लक्ष्मीबाई
झाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लॉर्ड डलहौज़ी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डटकर वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के सहयोग से शिन्दे की राजधानी ग्वालियर पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए आगरा भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया और महाराष्ट्र की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।

स्वयंसेवक सेना का गठन

झाँसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली।

बाबा गंगादास की कुटिया

रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट
रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार गौस ख़ाँ अब भी रानी के साथ था। उसका रौद्र रूप देख कर गोरे भाग खड़े हुए। स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही बाबा गंगादास की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।
(अरविन्द कु पाण्डेय)