बुधवार, 14 नवंबर 2012

विदेशी कंपनियों के अनुसार चलती भारतीय दिवाली



सुबह रास्ते में एक विद्यालय के बालक पटाखों के विरोध मे हाथों मे कुछ पट्टिकायें लिये, नारे लगाते हुए चल रहे थे। पटाखों से मुझे कोई विशेष लगाव नही है, इन से धुंआ उठता है, ये प्रदूषण फैलाते हैं, इन से आग लगने का भय होता है, इन से चोट लगने का खतरा होता है, यह सभी बातें सत्य हैं, और जब श्री राम अयोध्या आये तो उस समय पटाखों का चलन भी नहीं था, अतः यह कहना भी उचित नही है कि यह श्री राम के अयोध्या पहुंचने के समय से चला आ रहा है।
जो बात मुझे सबसे अधिक सालती है वह यह कि दिपावली आने पर विभिन्न समाचार चैनलों पर एक युद्ध का शंखनाद कर दिया जाता है कि मिठाई ना खायें, यह मिठाई जहरीली है, यह मिठाई अस्पताल पहुंचा देगी और दूसरी ओर विदेशी कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापन की आवृति और तीव्रता बढ जाती है। इन दोनों को मिला कर यदि विश्लेषण किया जाये तो लगता है कि यह भारतीय उपभोक्ता को बरगलाने का प्रयास है, जिसमे एक ओर उसे भय दिखाया जाता है कि वो भारतीय बाजारों मे बनने वाली मिठाई को ना खरीदे और दूसरी ओर विदेशी कंपनियां इन्हीं चैनलों पर प्रचार कर उपभोक्ता के मन मे पैदा किये गये भय को अपना सामान बेचने के लिये प्रयोग करते हैं। क्योंकि इन कंपनियों के उत्पाद स्वाद और मूल्य मे भारतीय मिठाईयों के आगे कहीं नही ठहर सकते, अतः उपभोक्ता के मन मे भय पैदा करने की रणनीति बना कर समाचार चैनलों को एक टूल के रूप मे अपनी योजना मे शामिल किया जाता है।
जहां तक परंपरा का विषय है, मैं छोटा था तो मिठाई अधिक नही आती थी, उस समय अधिकांशतः खील, बताशे और खिलौने लाये जाते थे, और दीपावली के दिन उन्हीं का एक दूसरे के परिवारों मे वितरण होता था। इसमे किसी प्रकार की मिलावट की शंका नही थी। और सर्दियों मे सभी लोग उन्हीं खील बताशों को धूप तापते हुए खाते थे। बढते उपभोक्तावाद ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को भी बाजार से नियंत्रित करना आरंभ कर दिया। जिसे अपना उत्पाद बेचना था उसने मीडिया मे पहली तारीख होने पर चॉकलेट लाने की परंपरा को शुरु करने का प्रयास किया। किसी ने भारतीय पर्व के सांस्कृतिक पहलू "एक दूसरे के प्रति मन से दुर्भावना निकालना" के लिये भी अपने उत्पाद की उपस्थिति को अनिवार्य करने का प्रयास किया।इसी प्रकार से विभिन्न कंपनियों ने अनेकों प्रकार से अपने अपने उत्पाद बेचने के लिये प्रपंचपूर्ण विज्ञापन दिखाने आरंभ किये। यह सब इसलिये नही था कि वह भारतीय परंपराओं मे बदलाव लाने को प्रयासरत थे, यह अपने उत्पाद को बेचने के लिये भारतीय परंपरा मे परिवार और प्रेम के बंधन का इस्तेमाल करने का प्रयास था। 
ग्रामीण क्षेत्रों मे दूध और घी की कमी ना होने के कारण वहाँ नकली मावे और मिठाई में मिलावट के होने की आशंका बहुत कम होती है, लेकिन शहरों के बाजारीकरण और गांवो के शहरोन्मुख होते जाने के कारण अब यह खतरा बढने लगा है, किंतु जिस प्रकार से मीडिया ने अपने दायित्व को निभाने के स्थान पर कंपनियों के बाजारीकरण और उनके उत्पाद की खरीद को बढाने के लिये सहयोग देना आरंभ किया है वह छोटे मिठाई के व्यवसायियों के लिये मारक है। यह सत्य है कि लोभ मे आकर अनेकों लोग नकली मिठाईयों के व्यापार मे संलग्न हैं, किंतु क्या उसके लिये भारतीय उपभोक्ताओं को जागरूक करने के स्थान पर उनके अंदर भय पैदा करना उचित है? क्या यह नही कहा जा सकता कि विश्वसनीय दुकानों से ही खरीदारी की जाये? क्या सत्ता पर दबाव डालकर मिठाईयों की दुकानों से नमूने उठा कर उन्हें प्रमाणपत्र नही दिया जा सकता, जिसे वह अपनी दुकान पर लगाये और ग्राहक निश्चिंत हो उस दुकान से खरीदारी कर सके। क्या ग्राहकों को अपनी पुरानी परंपरा का निर्वाह करने के लिये प्रेरित नही किया जा सकता कि वह उपहार के स्थान पर प्रेम और आपसी संबधों के ऊपर अधिक ध्यान दे। किंतु इस प्रकार का एक भी कार्यक्रम मीडिया चैनल पर नही दिखाई देगा। कारण एक ही है, मीडिया और कंपनियां दोनो सामाजिक परंपरा के स्थान पर अपनी आमदनी पर ध्यान देती हैं।
विदेशी कंपनियां जानती हैं कि जब पूरे विश्व मे कहीं भी उनका सामान ना बिक रहा हो, भारत मे कोई भी पर्व / उत्सव आने पर लोग खरीदारी को टूट पड़ते हैं, और यहॉ अपने आप ही आर्थिक मंदी दूर होने लगती है। किंतु भारतीय परंपरा मे यह विशेषता भी है कि जो सामान पर्व मनाने के लिये आवश्यक है वह भारत के छोटे व्यापारी ही दे सकते है या बना सकते हैं जैसे कि होली पर गुजिया इत्यादि बनाने का सामान या फिर दीपावली मे खील बताशे खिलौने। अतः अपने उत्पाद बेचने के लिये छोटे व्यापारियों और भारतीय उपभोक्ता के बीच के इस सांस्कृतिक जुडाव को सबसे पहले निशाना बनाया गया। इसके लिये विज्ञापनो मे भारतीय परंपरा को दिखाते हुए उसे अपने उत्पादों से जोडने का प्रयास किया, किंतु जब उसमे भरपूर सफलता नही मिली तो मीडिया का प्रयोग कर भारतीय उपभोक्ता को भयभीत करने का प्रयास किया जाने लगा। मीडिया ने भी अपनी आमदनी के अवसर को देख भारतीय उपभोक्ता को जागरूक करने के स्थान पर विदेशी कंपनियों की योजना के कार्यान्वयन को प्राथमिकता दी और मूर्ख मीडिया अपने दायित्व को भूल अपनी सनातन परंपरा के प्रवाह को आगे बढाने के स्थान पर अपनी आमदनी को ध्यान मे रख इस योजना का सहकार बना।
इस प्रकार की स्थिति यदि जारी रहती है और भारतीय उपभोक्ता ने इस कुचक्र को नही समझा तो इसका परिणाम पहले छोटे व्यापारियों को और फिर उपभोक्ताओं को भी भुगतना पड़ेगा, क्योंकि हमारी संस्कृति मे पूरा समाज एक दूसरे से अप्रत्यक्ष रूप से जुडा हुआ है, हम बाहर से एक दूसरे से भले ही अलग दिखें लेकिन हमारी संस्कृति परोक्ष रूप से हमें एक दूसरे का सहयोगी बनाये रखती है। यह आवश्यक है कि भारतीय उपभोक्ता छोटे व्यापारियों के हितों को ध्यान मे रखते हुए विदेशी कंपनियों के दुष्चक्र से बचे और व्यापारियों के लिये भी यह आवश्यक है कि वह स्वयं के लाभ के लिये कोई भी ऐसा कार्य ना करे जिस से मीडिया और विदेशी कंपनी को भारतीय परंपरा के उस मूल पर हमला करने का मौका मिले जिस ने हमें आज तक बचाया हुआ है। यह समझना होगा कि हमारी संस्कृति हमारी आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा करने मे पूरी तरह सक्षम है, आवश्यकता स्वहित के स्थान पर समाजहित के चिंतन की है।
(अरविन्द कु पाण्डेय )

दीपावली की शाम


तुम यूं कौंधे ....
भरी धूप में किसी ने तुरंत धोया हो आँगन
गीले पत्थरों से उठी हो नर्म सी महक
फिर तुम यूं बसे
हर अजनबी रात की आदत हो मानो
और हर पहचाने से दिन से अनचिन्हा हो कोई .....

(अरविन्द कु पाण्डेय)

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा / अन्न कूट

अन्न कूट, गोवर्धन पूजा
Annakoot, Govardhan Pooja
दीपावली के दूसरे दिन सायंकाल ब्रज में गोवर्धन पूजा का विशेष आयोजन होता है । भगवान श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन इन्द्र का मानमर्दन कर गिरिराज पूजन किया था । इस दिन मन्दिरों में अन्नकूट किया जाता है । सायंकाल गोबर के गोवर्धन बनाकर पूजा की जाती है । वेदों में इस दिन वरुण, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं की पूजा का विधान है। इसी दिन बलि पूजा, गोवर्धन पूजा, मार्गपाली आदि होते हैं। इस दिन गाय-बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर, फूल माला, धूप, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है।
यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई। उस समय लोग इन्द्र भगवान की पूजा करते थे तथा छप्पन प्रकार के भोजन बनाकर तरह-तरह के पकवान व मिठाइयों का भोग लगाया जाता था। ये पकवान तथा मिठाइयां इतनी मात्रा में होती थीं कि उनका पूरा पहाड़ ही बन जाता था।
अन्नकूट एक प्रकार से सामूहिक भोज का आयोजन है जिसमें पूरा परिवार और वंश एक जगह बनाई गई रसोई से भोजन करता है। इस दिन चावल, बाजरा, कढ़ी, साबुत मूंग, चौड़ा तथा सभी सब्जियां एक जगह मिलाकर बनाई जाती हैं। मंदिरों में भी अन्नकूट बनाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
इस दिन प्रात:गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है। अनेक स्थानों पर इसके मनुष्याकार बनाकर पुष्पों, लताओं आदि से सजाया जाता है। शाम को गोवर्धन की पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे आदि का प्रयोग किया जाता है। गोवर्धन में ओंगा (अपामार्ग) अनिवार्य रूप से रखा जाता है। पूजा के बाद गोवर्धनजी के सात परिक्रमाएं उनकी जय बोलते हुए लगाई जाती हैं। परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य खील (जौ) लेकर चलते हैं। जल के लोटे वाला व्यक्ति पानी की धारा गिराता हुआ तथा अन्य जौ बोते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं।
गोवर्धनजी गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं। इनकी नाभि के स्थान पर एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रख दिया जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि पूजा करते समय डाल दिए जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।
अन्नकूट में चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है। यदि प्रतिपदा में द्वितीया हो तो अन्नकूट अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन प्रात:तेल मलकर स्नान करना चाहिए। इस दिन पूजा का समय कहीं प्रात:काल है तो कहीं दोपहर और कहीं पर सन्ध्या समय गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन सन्ध्या के समय दैत्यराज बलि का पूजन भी किया जात है।
गोवर्धन गिरि भगवान के रूप में माने जाते हैं और इस दिन उनकी पूजा अपने घर में करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है। आज का दिन तीन उत्सवों का संगम होता है।
इस दिन दस्तकार और कल-कारखानों में कार्य करने वाले कारीगर भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी करते हैं। इस दिन सभी कल-कारखाने तो पूर्णत: बंद रहते ही हैं, घर पर कुटीर उद्योग चलाने वाले कारीगर भी काम नहीं करते। भगवान विश्वकर्मा और मशीनों एवं उपकरणों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है।

कथा

एक बार एक महर्षि ने ऋषियों से कहा कि कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन व अन्नकूट की पूजा करनी चाहिए। तब ऋषियों ने महर्षि से पूछा-' अन्नकूट क्या है? गोवर्धन कौन हैं? इनकी पूजा क्यों तथा कैसे करनी चाहिए? इसका क्या फल होता है? इस सबका विधान विस्तार से कहकर कृतार्थ करें।'
महर्षि बोले- 'एक समय की बात है- भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गउएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि हज़ारों गोपियां 56 (छप्पन) प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही थीं। पूरे ब्रज में भी तरह-तरह के मिष्ठान्न तथा पकवान बनाए जा रहे थे।
श्रीकृष्ण ने इस उत्सव का प्रयोजन पूछा तो गोपियां बोली-'आज तो घर-घर में यह उत्सव हो रहा होगा, क्योंकि आज वृत्रासुर को मारने वाले मेघदेवता, देवराज इन्द्र का पूजन होगा। यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है, ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है, गायों का चारा मिलता है तथा जीविकोपार्जन की समस्या हल होती है।'
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा-'यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो तुम्हें यह उत्सव व पूजा ज़रूर करनी चाहिए।' गोपियों ने यह सुनकर कहा- 'कोटि-कोटि देवताओं के राजा देवराज इन्द्र की इस प्रकार निंदा नहीं करनी चाहिए। यह तो इन्द्रोज नामक यज्ञ है। इसी के प्रभाव से अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि नहीं होती।'
श्रीकृष्ण बोले- 'इन्द्र में क्या शक्ति है, जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा यह गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है। अत: हमें इन्द्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।'
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के वाग्जाल में फंसकर ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं। सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से सुमधुर, मिष्ठान्न पकवान लाकर गोवर्धन की तलहटी में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से गोवर्धन पूजा करने लगे।
उधर श्रीकृष्ण ने अपने आधिदैविक रूप से पर्वत में प्रवेश करके ब्रजवासियों द्वारा लाए गए सभी पदार्थों को खा लिया तथा उन सबको आशीर्वाद दिया। सभी ब्रजवासी अपने यज्ञ को सफल जानकर बड़े प्रसन्न हुए।
तथी नारद मुनि इन्द्रोज यज्ञ देखने की इच्छा से वहां आए। गोवर्धन की पूजा देखकर उन्होंने ब्रजवासियों से पूछा तो उन्होंने बताया- 'श्रीकृष्ण के आदेश से इस वर्ष इन्द्र महोत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा की जा रही है।'
यह सुनते ही नारद उल्टे पांव इन्द्रलोक
गोवर्धन पूजा
Govardhan Pooja
पहुंचे तथा उदास तथा खिन्न होकर बोले-'हे राजन! तुम महलों में सुख की नींद सो रहे हो, उधर गोकुल के निवासी गोपों ने इद्रोज बंद करके आप से बलवान गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी है। आज से यज्ञों आदि में उसका भाग तो हो ही गया। यह भी हो सकता है कि किसी दिन श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे तुम्हारे राज्य पर आक्रमण करके इन्द्रासन पर भी अधिकार कर लें।'
नारद तो अपना काम करके चले गए। अब इन्द्र क्रोध में लाल-पीले हो गए। ऐसा लगता था, जैसे उनके तन-बदन में अग्नि ने प्रवेश कर लिया हो। इन्द्र ने इसमें अपनी मानहानि समझकर, अधीर होकर मेघों को आज्ञा दी- 'गोकुल में जाकर प्रलयकालिक मूसलाधार वर्षा से पूरा गोकुल तहस-नहस कर दें, वहां प्रलय का सा दृश्य उत्पन्न कर दें।'
पर्वताकार प्रलयंकारी मेघ ब्रजभूमि पर जाकर मूसलाधार बरसने लगे। कुछ ही पलों में ऐसा दृश्य उत्पन्न हो गया कि सभी बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। भयानक वर्षा देखकर ब्रजमंडल घबरा गया। सभी ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर बोले- 'भगवन! इन्द्र हमारी नगरी को डुबाना चाहता है, आप हमारी रक्षा कीजिए।'
गोप-गोपियों की करुण पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले- 'तुम सब गऊओं सहित गोवर्धन पर्वत की शरण में चलो। वही सब की रक्षा करेंगे।'
कुछ ही देर में सभी गोप-ग्वाल पशुधन सहित गोवर्धन की तलहटी में पहुंच गए। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी गोप-ग्वाल अपने पशुओं सहित उसके नीचे आ गए। सात दिन तक गोप-गोपिकाओं ने उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टि से अपना बचाव किया। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं पड़ा। इससे इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ।
यह चमत्कार देखकर और ब्रह्माजी द्वारा श्रीकृष्ण वतार की बात जानकर इन्द्र को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। वह स्वयं ब्रज गए और भगवान कृष्ण के चरणों में गिरकर अपनी मूर्खता पर क्षमायाचना करने लगे।
सातवें दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा- 'अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो।' तभी से यह उत्सव (पर्व) अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

आधुनिक भारत में वृद्धों की स्थिति


आधुनिक होते भारत की बदलती जीवन शैली एक बार तो आंखों में चमक भर देती है किंतु जब हकीकत से सामना होता है तो स्थिति काफी भयावह और संकटपूर्ण नजर आती है. परिवार और समाज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाले बड़े-बुजुर्ग आज उपेक्षित होने लगे हैं और साथ ही उनकी स्थिति काफी दयनीय और बेसहारा की हो चली है. हालांकि आज भी भारत के अंदरूनी भागों में वृद्धों के लिए सम्मान पूर्ववत बरकरार है किंतु विकास की दौड़ में आगे निकल चुके बड़े शहरों की हालत वृद्धों के सम्मान और महत्व के मामले में काफी खराब है.
इसे आप सांस्कृतिक अधःपतन कहें या महात्वाकांक्षा की अंधी दौड़, मेट्रो शहरों की अधिकांश आबादी अपने बड़े-बुजुर्गों के सम्मान के मामले में नाकारा साबित हो रही है. कई संपन्न परिवारों के बुजुर्ग तो वृद्धाश्रम में धकेले जा रहे हैं, जो घर में ही रहना चाहते हैं उनके साथ नौकरों से भी बुरा बर्ताव होता है और इसके बावजूद उनकी शारीरिक प्रताड़ना तो एक बेहद चिंतनीय तथ्य है. उदारीकृत भारत के विकासवान नवयुवक बुजुर्गों के साथ अपनी हिंसात्मक और उपेक्षात्मक व्यवहार के लिए जाने जाने लगेंगे क्या इसे कभी सोचा भी जा सकता था?
जिन्हें कभी परिवार की संपत्ति समझा जाता था आज वही बुजुर्ग अपने परिवार पर एक बोझ बनकर रह गए हैं. जिनके आदेशों पर कभी कोई सवाल तक नहीं किया जा सकता था, आज अगर वे आदेश ना मानें तो परिवार में उनका जीना तक दूभर हो जाता है. माता-पिता जिन्होंने अपनी संतान की खुशी और जरूरतों को पूरा करने के लिए ना जाने कितनी परेशानियों का सामना किया, आज वह अपना सर्वस्व लुटा देने के बाद अकेले और बेसहारा रह गए हैं. परिवार के भीतर उनकी स्थिति इस कदर शोषित कर दी जाती है कि जीवन यापन करने के लिए उनके पास दो ही विकल्प रह जाते हैं. पहला, या तो वे अपना सारा जीवन परिवार से अलग वृद्धाश्रम में ही व्यतीत करें. दूसरे, यदि वे अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें हर पल पराश्रित होने का अहसास कराया जाता है जिसे उन्हें सहना सीखना होता है.
परिवार के भीतर व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता की तलाश को प्रमुखता दी जाने लगी है, जिसके परिणामस्वरूप जिन बच्चों का पालन-पोषण अभिभावक बड़े लाड-प्यार से करते हैं, बड़े हो जाने के बाद बच्चों को उनके साथ रहना तक पसंद नहीं आता. परिवार में माता-पिता की उपस्थिति स्वतंत्रता की राह में बाधा बन जाती है. भौतिकवाद इस कदर लोगों की मानसिकता पर हावी हो गया है कि अब अपने का बोध समाप्त होता जा रहा है. आर्थिक तौर पर सक्षम होने और आत्म-निर्भर होने की चाह लोगों में प्रबल रूप से विद्यमान होने लगी है, जिसकी पूर्ति व्यक्ति माता-पिता से अलग अपनी स्वतंत्र दुनियां बसा कर करने लगा है. एक ऐसी दुनियां जिसमें बुजुर्गों की जरूरत ना रहे.
ऐसे हालात केवल उन्हीं बुजुर्गों के नहीं हैं जो पूर्णत: अपने बच्चों पर आश्रित हैं. ऐसे वृद्धों की भी कमी नहीं है जो अपने ही बच्चों की धोखाधड़ी का शिकार बने हैं. स्वार्थ और लालच का अंधा आधुनिक मानव अवैध रूप से अपने माता-पिता की संपत्ति हथिया कर उनसे किनारा करने और उन्हें अपने हाल पर छोड़ने से भी नहीं हिचकिचाता. ऐसे भी कई बुजुर्ग हैं जिनके बच्चे काम की तलाश में देश के बाहर गए और फिर वहीं बस गए. वे अभिभावकों के लिए मासिक खर्च भेजकर ही अपने कर्तव्य को पूरा कर लेते हैं. वे यह नहीं समझते कि पैसा केवल भौतिक आवश्यकताएं पूरा कर सकता है. पैसे से भावनाओं का मोल नहीं लगाया जा सकता. घर में अकेले तन्हा जीवन जीते हुए अभिभावक या तो अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं या फिर अपने बच्चों से उम्मीद रखना ही छोड़ आस-पास की दुनियां को अपना लेते हैं जो धीरे-धीरे उनके जीने का एक सहारा बन जाता है. लेकिन कभी-कभी यही दुनियां उनके लिए घातक सिद्ध भी होती है. क्योंकि अकेले बुजुर्ग व्यक्ति आसानी से अपराधियों की नजर में जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप चोरी और हत्याएं जैसी घटनाएं बढ़ने लगी हैं.
यह हालत केवल परिवार के भीतर तक ही सीमित नहीं है. हम अकसर अपने आस-पास बुजुर्ग लोगों के प्रति असहनीय और अमानवीय अपराध होता देखते हैं और कभी समय की कमी को तो कभी आपसी मामला होने का बहाना बना, ऐसे कृत्यों को अनदेखा कर देते हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि भौतिकवाद और बाजारीकरण से ग्रस्त हमारी भावनाएं एक निश्चित सीमा रेखा में बंध गई हैं, जिसके अंतर्गत हम केवल अपने तक ही सीमित रह गए हैं. जब तक कोई घटना या कृत्य सीधे-सीधे हमें प्रभावित नहीं करते हम उन्हें अहमियत ही नहीं देते. हमारे पड़ोस में ही बुजुर्ग दंपत्तियों के साथ गलत व्यवहार किया जाता है और हम इस पर अपनी कोई भी प्रतिक्रिया देने से बचते फिरते हैं. मेट्रो शहर में आधुनिकता की बयार ने मनुष्य को पारस्परिक सौहार्द जैसी भावनाओं से दूरी बनाना सिखा दिया है. परिवार की जरूरत और उसके मायने अपनी स्वार्थ-पूर्ति के आगे कोई महत्व नहीं रखते.
भले ही सरकार ने बुजुर्गों की जरूरतें पूरी करने और उन्हें आश्रय देने के लिए वृद्धाश्रम खोलने के साथ-साथ उन्हें कई अधिकार भी दिए हैं. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि संबंधों को अपनी आत्मा मानने वाले हमारे भारतीय समाज में ऐसे आश्रमों और कानूनों का क्या औचित्य है जो संबंधों के विघटन और दिनोंदिन घटते भावनात्मक क्षरण को साफ दर्शाते हों?
माता-पिता जब बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को कम नहीं होने देते, उनका पालन-पोषण प्यार और अपनेपन के साथ करते हैं तो बच्चे बड़े होने के बाद उन्हें नकारते क्यों हैं?
शहरों में बढ़ते अपराधों और नकारात्मक परिस्थितियों से बचाने के लिए ऐसा अकसर देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अति-सुरक्षात्मक रवैया अपनाते आए हैं. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसा व्यवहार केवल एक उम्र तक उचित रहता है. बच्चों के बड़े हो जाने पर माता-पिता के प्रति उनकी अपेक्षाएं परिवर्तित हो जाती हैं. अब वह उनमें दोस्त को तलाशने लगते हैं, जो उनकी भावनाओं को समझें और उन्हें महत्व दें. साथ ही उनके सही निर्णयों का सम्मान करना भी अपेक्षित हो जाता है.
इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वह एक रूढ़िवादी सोच और व्यवहार छोड़कर अपने बच्चों को समझने का प्रयास करें. साथ ही बच्चों को भी चाहिए कि वह अपने माता-पिता की भावनाओं को अपने जीवन में महत्व दें. जो माता-पिता उनके बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, उन्हें खुद से दूर रखने के लिए कोई कदम ना उठाएं.
संभवत: परिवार के भीतर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति और बच्चों के साथ मनमुटाव के लिए दो अलग पीढ़ियों की अलग सोच और परिस्थितियों के प्रति भिन्न दृष्टिकोण उत्तरदायी है. इस अंतर को दूर करने के बाद परिवार के बुजुर्गों और अन्य सदस्यों के बीच की खाई को समाप्त किया जा सकता है. साथ ही बच्चों को यह अहसास दिलाया जा सकता है कि जिन अभिभावाकों को वह व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए भूलते जा रहे हैं, उनके बिना कोई भी खुशी और परिवार की संरचना अधूरी ही रहेगी. इसलिए स्वार्थ भावना को त्याग कर कुछ समय के लिए अपने माता-पिता की खुशी में शामिल होकर उनके लिए अपनी भावनाओं का इजहार करने की ओर ध्यान दिया जाए तो जीवन का सही आनंद और औचित्य समझ में सकता है.
(अरविन्द कु पाण्डेय )