बुधवार, 5 सितंबर 2012

संसद एक मंदिर का शोर



घूम फिर कर ठीकरा फिर फूटा आम आदमी के सिर....... 
आज बाबा जी ने जब आईना दिखाने की कोशिश की तो सब सांसद एक हो गए और बात आई कि यदि समाज अच्छा होगा तो ही संसद अच्छी बन पाएगी |
एक बात और उठ कर आई कि जनता चुन कर भेजती है इन सांसदों को और यदि वे दागी हैं तो गलती किस की है - जनता की.
हम सब जानते हैं कि मर्यादित भाषा का प्रयोग होना ही चाहिए-
 बाबा जी ने अपने दिल की भड़ास कुछ तल्ख़ शब्दों में निकाल दी......साल भर का घाव था ....साल भर मलहम न मिला तो तड़प के आह निकल ही गयी.......
अब एक सज्जन कहते हैं कि जब जहाज डूब रहा होता है तो कप्तान को सब से आखिर में  निकलना चाहिए.......और जब बाबा जी पर आफत आई तो वे सब से पहले निकल छूटे.......
यो भाई हमारा प्रश्न है कि कौन सी आफत???कृपया बताईये ......बाबा जी और उन के अनशनकारी रात को सो रहे थे फिर कौन सी आफत आ टपकी उन पर ???
क्या ??
 रात जो पुलिस का तांडव  हुआ था किसी के इशारे पे क्या इशारा उस आफत पर है?
वो ही आफत न जिस में राजबाला जी की मृत्यु हो गयी थी?
अच्छा !!!
 बाबा जी को उस की याद बिलकुल अपने दिल से निकाल देनी चाहिए
 और
 पीड़ा को व्यक्त करने का अधिकार तो किसी भी भारतीय को है ही नहीं.......कोई आन्दोलन का अधिकार नहीं है....कोई व्यवस्था परिवर्तन पर बोलने और जन जागरण करने का अधिकार नहीं है ......जनता कुछ नहीं कह सकती ....आखिर आप ने इन सांसदों को चुन कर भेजा है और अब आप का अधिकार ख़त्म ......अब आप सिर्फ उन को चुनाव के समय ही कुछ कह सकते हैं और तब भी साम ,दाम,दंड,भेद की नीति को ले कर ये फिर जीतने की कोशिश करेंगे और कामयाब होएंगे.......
जनता यदि कुछ कहने की कोशिश  करती है तो संसद  का अपमान माना जाता है,यदि जनता को जागृत करने की कोशिश की जाती है तो विशेषाधिकार हनन  का प्रस्ताव लाया जाता है,बार बार कहा जाता है कि संसद एक मंदिर है और इसे तोड़ने की कोशिश न की जाए |
बोला जाता है कि यदि आप कुछ बदलाव लाना चाहते हैं तो सुझाव दीजिये न ,यदि आप आज कि व्यवस्था से खुश नहीं हैं तो सुझाव दीजिये न ...सारे राजनैतिक दल मिलकर उस पे आम राय बनाने कि कोशिश करेंगे और लागू करने कि पहल करेंगे ........सो साहब कोशिश तो कर ही रही है जनता साल भर से और कई सालों से......आप सुनते ही कब हैं????
बदलाव लाना है तो संसद में आईये,चुनाव लड़िये,गेरुए वस्त्र त्यागिये राजनीति में आईये........
तो आप सब से सवाल है........
यदि राजनीति में स्वयं ही आना होता तो किसी ने रोका था क्या जो नहीं आते,आज आप को अपना नुमाएंदा चुना है तो क्या आप हमारी बात पर अमल नहीं करेंगे???गेरुए वस्त्रों को धारण करने का अर्थ क्या ये है कि अब समाज से कट गए हैं और इस में व्याप्त बुराईयों के विरुद्ध जनता को जगा न पायेंगे???
बार बार ये कहा जाता है कि यदि आप किसी कि तरफ एक ऊँगली दिखाते हैं तो तीन आप कि तरफ भी होती हैं......तो भाई हमारा कहना है कि उन तीन उँगलियाँ अगर हमारा भ्रष्टाचार उजागर करना चाहती हैं तो कीजिये न उसे भी लोकपाल कि जद में लाईये ओर सज़ा दिलाईये पर एक सशक्त  लोकपाल तो लाईये..........
हमें आईना तो दिखाईये.....

स्वार्थ और राजनीति



आखिर सोनिया जी गरजीं...
पर गलत गरजीं......
उन का कद बढ़ता अगर सही समय पर जनता के साथ गरजतीं.....
एक सही व्यक्ति वो ही होता है और सही राजनीतिज्ञ भी वही है जो जनता की नब्ज़ पकड़ना जानता हो.....
सोनिया जी अभी परिपक्व राजनीतिज्ञ की श्रेणी में अपने आप को स्थापित नहीं कर पायीं हैं.....
ऊपर से लादी गयी या कहें थाली में परसी गयी मलाई को सडपना  भी एक कला है......
उस में उन की शून्यता उजागर हो गयी है.....
हाँ उन की मजबूरियाँ भी रही हैं कि अवसरवादियों की इस पार्टी में एक मूक सेवक को किस प्रकार नकार सकतीं हैं वे...

आखिर बेटे का मोह तो कमजोरी बन कर बांधे रखा है उन्हें.......

ये ही उन की Achilles Heel साबित होगा ......

भाजपा ने सही समय पर आन्दोलनरत जनता की भाषा को समझा और स्वयं आन्दोलनरत जनता से अपना जुड़ाव दिखा दिया...
उन ही का मुद्दा संसद में उछाल के और संसद का काम-काज ठप कर के......

फिर चाहे दलाली के छींटे उन के दामन पर भी पड़ रहे हों.......

जनता की आवाज़ संसद के अन्दर तो भाजपा द्वारा ही पहुंची.......कांग्रेस तो जनता को नकार ही रही थी......भाजपा ने स्वार्थवश ही सही उस मुद्दे को उठाया तो ........

सोनिया जी ने ललकारा है अपने अंध-भक्तों को ......सड़कों पर उतर कर जवाब देने को......

सड़कों पर सोनिया जी????
क्या आप सड़कों की ओर देखती भी हैं ?????
क्या आप आन्दोलन की भाषा समझती भी हैं ????

आप जब आह्वान करती हैं तो अपने आप पर शर्म तो महसूस होती होगी...... 

जनता को सड़कों पर पिछले डेढ़  साल से आन्दोलन रत देख कर भी अनदेखा करने वाली गांधारी  आज स्वयं जब अपने पिछलग्गुओं को आदेश देती हैं तो वे सड़कों का महत्त्व जानती तो हैं.....

खैर स्वार्थियों के आज के भारत में सड़कों के आन्दोलन के महत्त्व को अब सब पार्टियां जानने और मानने तो लगी ही हैं.........

नव-क्रान्ति के बीज



निस्स्वार्थ  चिंतन ले एक व्यापक चिंतन की ओर अग्रसर  हैं जीवन ......
एक चेतना पुंज,एक नव जीवन संचार का बीड़ा उठाये  हैं .....

अगर ये ज्योति पुंज ही नव ज्योति न प्रदान कर सब जला के राख करने की दिशा की ओर अग्रसर होने लगे तो अपने क़दमों को थामना है ,
इसे यथासंभव सही पथ पर रखना है .....
इस की लौ को अलौकिक  प्रकाश पुंज में बदलना है,
राह में आने वाले हर कांटे को बुहारना है.....

यह एक संधि-काल है जहाँ से नव-क्रान्ति के बीज का प्रस्फुटन होना है.....

जिसे एक विशाल वट-वृक्ष का रूप धारण करना है....
खर-पतवार को स्वस्थ वातावरण में बहुतायत में पनपना भाता है.....
इस का हमें ध्यान रखना है कि निराई-गुड़ाई करते रहना है....
इसे  मेहनत और प्रेम से सींचना है,ऐसे प्रेम से जिस में रंच मात्र भी स्वार्थ की बू न आती हो......
 हमें एक स्वस्थ पौधा चाहिए.......
जो कालांतर में एक ऐसा मज़बूत वृक्ष का रूप धारण करे जिस के अमृत समान मीठे फलों का  देश अनिश्चितकाल तक  रस्सास्वादन   कर सके..... 
हमें अब और सावधान रहने की ज़रुरत है......
अमृत-रुपी विष से बचना होगा....
हर पग सावधानी से उठाना होगा....
अब हम सब को आगे आ एक ऐसे माली का कार्य  करना है जो अपने आने वाले पीढ़ियों को अपने तन,मन और धन  से सींची  गयी विरासत सौंप के जाए जिस से वे पीढियां हम पर गौरवान्वित अनुभव कर सकें.....

अब समय की मांग है कि हमें एक आदर्श स्थापित कर के ही इस संसार से विदा लें......

कदम दर कदम जीत की ओर




हमारे देशवासियों  का  जब धैर्य का बाँध टूटने लगा
 तो
 दैवीय  प्रेरणा से,
ब्रह्मांडीय मस्तिष्क ने अपना ताना बाना बुनना शुरू किया........
कुछ  ने देखा एक स्वप्न,
एक परिकल्पना से विचार रुपी बीज का हुआ प्रस्फुटन
 और
 देखते ही देखते यह एक जन सैलाब में परिवर्तित हो गया .......

एक आशा की किरण हम सब को नज़र आई.......
सब जनता तन,मन,धन से जुट गयी इस लड़ाई में........
जन मानस उद्वेलित......
आशा का संचार.....
भ्रष्टाचार से मुक्त जीवन की परिकल्पना से हर भारतीय झूमा.......
बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया आन्दोलन  में......


समीक्षात्मक तौर पर देखें तो काफी कुछ पाया है इस आन्दोलन ने.......
आज जनता में आत्मविश्वास का संचार हुआ है......
आज हम ये दावा तो नहीं कर सकते कि भ्रष्टाचार रुपी दानव का सर हम काट पायें हैं....
परन्तु इस की जड़ों पर चोट करने में हम सफल तो हुए ही हैं......
आज भ्रष्टाचार है ,
परन्तु डेढ़ साल के आन्दोलन की ये उपलब्धि तो रही ही है न कि इतने कम समय में आज ये परिवर्तन तो स्पष्टरूपेण दृष्टिमान है कि जो भ्रष्टाचार भारत में एक शिष्टाचार का रूप धारण कर चुका था, उस में संलिप्तता को लोग छिपाते हैं......
आज हर भ्रष्टाचारी में एक भय विद्यमान है......
इसी से हमें संबल प्राप्त कर इसी पथ पर अनवरत बढ़ते जाना है.....
अर्जुन के समान लक्ष्य  पर ध्यान केन्द्रित रखते हुए पथ से न डिगना है......

जीत अन्तत: हमारी ही होगी और हम एक भ्रष्टाचार मुक्त भारत में सांस ले पायेंगे.......

आइये इस कर्म -क्षेत्र में अपने आप पर भरोसा रखें........

मंथन एक सतत प्रक्रिया........




मंथन एक सतत प्रक्रिया........
सात्विक सोच से जुड़ा मन न जाने क्यों मंथन ,सतत चिंतन में डूबा रहता है......
कई मुद्दों को तकता है,कई मुद्दे समझता है......
कई प्रश्न घुमड़ते हैं.....
उत्तर की राह तकता है.......
सोच शायद नयी है परन्तु प्रश्न पुराने हैं........
क्या व्यवस्था से हारे हैं ????
या व्यक्ति के मारे हैं ???
जवाब तो स्वयं ही ढूँढने हैं .........
ये प्रश्न पुकारे हैं........

 व्यवस्था पर हावी होता व्यक्तिवाद.........
सरकार योजना बनाती है.....अमली जामा पहनाया जाता है.......
जनता के टैक्स के पैसे के सदुपयोग की घोषणा होती है.....
जनता खुश.....
नामकरण होता है.......
राजीव गाँधी अमुक-अमुक योजना,इंदिरा गाँधी अमुक-अमुक योजना.........
क्या व्यक्तिवाद से परे जा कर जनता के पैसे से,जनता के लिए  बनायी  गयी योजना का नामकरण किसी व्यक्ति विशेष के नाम से न जुड़ कर सिर्फ प्रधान मंत्री अमुक योजना,मुख्या मंत्री अमुक योजना  नहीं कहलाई जा सकती ????
क्यों हम व्यक्तिवाद के पोषक हैं ???
हम जनता के पैसे का दुरूपयोग अपने निहित स्वार्थ (किसी की निगाहों में आने के लिए या जनता के मसीहा कहलाने) के लिए नहीं कर रहे ???
क्या हमें ये सब करने का अधिकार है???
क्या संविधान में इस प्रकार का अधिकार जनसेवकों या जनप्रतिनिधियों को प्रदत है????
सोचनीय प्रश्न है......
अपने आप में इस का उत्तर खोजिये.....
प्रश्न कीजिये और हर व्यवस्था को सार्थकता की और ले जाने का संकल्प लीजिये....
व्यवस्था परिवर्तन आप के स्वयं के हाथों में है........
आप स्वयं सक्षम हैं.........
आप के हाथों में दुनिया का सब से असरदार हथियार है.....

आप का वोट जो कि बिना खून-खराबा किये देश की तस्वीर  बदल सकता है......

किस बात का इंतज़ार है हमें ????

बाट जोहता देश




हम भारतीयों ने समयानुसार काम में आने वाली कई कहावतें गढ़ रखी हैं .........
जब जागो तभी सवेरा........
परन्तु जब ये सत्ता हथियाने,अवसरवादिता और अपना काम न करना आदि पर पर्दा डालने हेतु प्रयोग की जाती हैं तो ये कहावतें खोखली सी प्रतीत होती हैं.......या इन के दुरूपयोग की बू आने लगती है तो हम ठिठक से जाते हैं.....कि या तो हम जनता का आकलन गलत है या ये अवसरवादी लोग गलत हैं........

मंथन चल रहा है - हर भारतीय के मन में.......
इस पोस्ट को किसी व्यक्ति विशेष,आन्दोलन विशेष या किसी राजनीतिक पार्टी विशेष को इंगित कर के लिखा हुआ न माना जाए.....खरी-खरी बोलने की आदत सी है...हृदय द्रवित हुआ सो लेखनी अपने आप चल उठी.....

जनता का आन्दोलन.....

विपक्ष अपनी भूमिका सही प्रकार से नहीं निभा रहा था.....जनता का गुस्सा महंगाई और भ्रष्टाचार को ले कर अपनी सहनशीलता को जब लांघ गया तो हम सब सड़कों पर उतर आये.....जन्म हुआ जन आन्दोलन  का......

 जनता सड़कों पर उतर उतर कर थक गयी......सरकार नहीं चेती.....और तो और विपक्ष ने भी सरकार को न घेरा ......दांव पेच के खेल खेलते रहे सब.....अपना उल्लू  सीधा करने की फिराक में बैठे थे......सही समय की दरकार थी विपक्ष को.....(पुराने खिलाडी हैं न राजनीति और अवसरवादिता के मैदान में.......) जनता की भूलने की कमजोरी को जानते हैं.....जनता कुछ समय हुआ नहीं कि सब ज्यादतियां भूल जाती है....अपना समय व् शक्ति का क्षरण क्यों करें...जब चुनाव नज़दीक आ जायेंगे तभी चोट कर अवसर का लाभ उठाएंगे हमारे जनप्रतिनिधि और राजनैतिक  पार्टियां...वे मैदान में हैं अपने स्वयं के लिए | जनता के साथ का तो ढोंग मात्र है......

अब तेरह अगस्त को ही ले लें सब दूध के धुले बन ऐसे मंच पर आये मानों जनता ही नहीं बुला रही थी वे तो जीजान से काला धन लाने के लिए प्रयासरत थे.......
शर्म आती है हम पर कि हम ने इन पर भरोसा किया, अपना देश चलाने का अवसर प्रदान किया......ये अवसरवादी लोग सिर्फ अवसर को पकड़ना जानते हैं......देश सेवा और देश का कोई मोल नहीं है इन के ह्रदय में........
ये सत्ता -लोलुप सत्ता के दलाल अवसर मिलते ही सरकार पर चोट करने पहुँच गए.......
तब कहाँ थे जब जनता पर लाठियां भांजी जा रही थीं????
जब जनता का चीख चीख कर गला बैठ गया भ्रष्टाचार दूर करने के लिए जनता के जन लोकपाल बिल लाने के लिए.....
तब क्यों न चेती ये विपख में बैठी हुई पार्टियां???
तब देश और जनता याद क्यों न आयीं.......जब विशेषाधिकार प्रस्ताव ला रहे थे.......

आज सब को जन आन्दोलन से सत्ता प्राप्ति का सुख मिलने का सुखद स्वप्न दीख रहा है तो सीधे,निर्र्लज्ज भाव से मंच चढ़ गए.....

क्या जनता पार्टी का हश्र भूल गयी जनता???

(अरे हाँ हमें तो भूलने की बीमारी है न जिस के चलते राजनीति अपनी रोटियाँ सेकती है....)

क्या हम फिर अपने आप को इन के द्वारा ठगा जाने देंगे????
क्या हम अपने आन्दोलन को इन अवसरवादियों के हाथ का खिलौना बनने देंगे???
क्या हम अपनी नियति का गला अपने हाथों से घोंट देंगे......
आज पैंसठ साल बाद हम जागे हैं ....क्या इसी जागृति को खो देंगे???
क्या हम फिर से अवसरवादिता का शिकार होंगे???
क्या हम फिर से एक लम्बी नींद में खो जायेंगे और अपने स्वार्थों को प्राथमिकता देंगे???
क्या देश का हमारे मन में कोई मोल नहीं??????

अब हम ऐसा क्या करेंगे कि हमें  अपने आप को रोज़ सुबह दर्पण में  देख आँखें न चुरानी पड़ें????
अब हम ऐसा क्या करेंगे जिस से जब हमारे आगे आने वाली पीढियां हम से प्रश्न करें कि आप ने हमारे लिए क्या किया..तो हम उन कि आँख में आँख डाल कर उत्तर दे पायें.....

इन प्रश्नों का उत्तर जोहते हैं हम सब जनता ...अपने आप से.....

अभी नहीं तो कभी नहीं का समय है.....

अपने आप से प्रश्न करने का और अपने आप से जवाब लेने का समय है.......
अब हमें अवसर मिला है अपने देश और अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का......अवसरवादी बनिए...इस अवसर को न खोइए......
कम से कम चैन की नींद तो ले पायेंगे ये सोच के कि एक सबक सिखाया तो है हम ने......इस देश को लूटने वालों को....
अपने आप को जानने और झकझोरने का समय है...इसे व्यर्थ न जाने दीजिये.....
किसी की सत्ता प्राप्ति का साधन मात्र न बन के रहिये.....
देश परिवर्तन मांग रहा है..अपने देश की पीड़ा के प्रति संवेदनशील बनिए.....

आइये देश के प्रति अपने दायित्व को पूरा करें.........
देश हमारी बाट जोह रहा है.......

द कोल ओपरा शो -




कोल-गेट काण्ड ही सिर्फ एक ऐसा घोटाला नहीं है जहाँ भारत की खनिज सम्पदा का बेहताशा दोहन हुआ हो.......
अभी पिक्चर बाकी हैं मेरे दोस्त.......

इन सब पर यदि हम एक वृहद् नज़र डालें तो राजनीति का  कालापन,स्वार्थ और अवसरवादिता 
और
 जनता की उदासीनता और स्वार्थ 
दोनों ही का मुखौटा उतर कर असलियत सामने आ जाती है......

राजनीति आज शीघ्रातिशीघ्र संपन्न बनने का साधन मात्र बन कर रह गयी है......
आज हर व्यक्ति सत्ता और सम्पन्नता की दौड़ में शामिल हो बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहता है.......
ये तो हुई व्याख्या आज की राजनीति की 

अब जनता  ???

राजनीतिज्ञ कौन हैं???

जनता......

समझे  न आप!!!!!!

आगे व्याख्या करना बेमानी है.......

चेतन भगत जी का लेख पढ़ रहे थे जहाँ उन्होंने एक संयुक्त परिवार का उदहारण देते हुए मैनेजर यानी के जनप्रतिनिधियों और मालिक यानी कि जनता का ज़िक्र किया.......
सही ही तो है......
अपार हीरे जवाहरातों के धनी एक संयुक्त परिवार ने अपने में से ही एक सदस्य को  मैनेजर नियुक्त किया और उस को अपनी आपार दौलत संभलवा दी.....
बेचने को नहीं,वरन,उस के स्वयं के  द्वारा तैयार किये गए मापदंडों की कसौटी पर, चयन कर के देने को......

अब शुरू होता है स्वार्थ का एक नंगा खेल.......

अपने चुनिन्दा लोगों में रेवड़ियां बाँट दी जाती हैं.......

परिवार नाखुश हो मैनेजर बदल देता है......

परिणाम वही ढाक के तीन पात........

अब रेवड़ियां दूसरी ओर बंटने लगती हैं.......

मालिक के अपने ऑडिटर से पता चलने पर जब जवाब तलब किया जाता है तो जनाब मैनेजर जो कि अपने आप को परिवार का राजा मानने लगे थे तल्ख़ शब्दों का प्रयोग करते हुए पहले तो नकारते हैं,फिर जोर पड़ने पर दोषारोपण और फिर मालिक को ही नकारने लग जाते हैं......

धीरे धीरे सामने आने लगता है कि हमाम में तो सब ही नंगे हैं.........

अब शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर......

पहला मैनेजर दूसरे मैनेजर पर ज़यादा लालची होने का आरोप लगता है ..

मोटा  माल  और छोटा  माल की व्याख्या होने लगती है.......

और

 परिवार अब फ्री स्टाइल कुश्ती देखने का मज़ा लेने लगता है......

क्या हम इसे हास्यास्पद कह सकते हैं ?????

नहीं

जहाँ अस्तित्व पर आ बनी हो वह स्थिति हास्यास्पद कैसे होगी ???

आज हमारा देश जिस दोराहे पर खड़ा है उसे हम हास्यास्पद कतई नहीं कह सकते......

हमारी अस्मिता और गौरव भी अब इस लड़ाई से जुड़ गया है......

हमारे मैनेजर पर बाहरी लोग टिप्पणी करते हैं और हम उसे सही देख कुछ नहीं कह पाते......
दबी जुबान से विरोध ज़रूर करते हैं कि किसी भी बाहरी व्यक्ति को टिप्पणी का अधिकार नहीं पर गिरेहबान में मुंह डालें तो इसे सही ही पाते हैं.......

आज का भारत अब उस स्थिति में आ चुका है कि अब तो आर या पार हो कर ही रहे......

क्रान्ति आज की मांग है.......

रक्तरंजित नहीं वरन एक वैचारिक क्रान्ति जो कि धरातल पर उतर कर लड़ी जाए और जो कि भारत की तस्वीर बदल कर रख दे.....

ये संभव होगा इस काली राजनीति का त्याग कर के.....

मालिक की उदासीनता और सेवकों पर उन का आँख मूँद कर विश्वास करना आज देश को एक नारकीय खाई में डाल चुका है.....

ये समय है हम मालिकों के चेतने का और अपने प्राकृतिक साधनों और संसाधनों की होती लूट और दोहन को रोकने का.....

अब हमें अपनी स्वार्थपरता ( जी हाँ हम ही तो स्वार्थी है.....ये राजनीतिज्ञ कहाँ से आते हैं...हम में से ही तो.....)को त्यागना होगा और ऐसे जनसेवकों और जन प्रतिनिधियों की फ़ौज खड़ी करनी होगी जो देश को कम से कम इस  स्वार्थ से बाहर निकाल सकें और जो कार्य सम्पादन हेतु इस शासन प्रणाली के अंग बनें न कि सत्ता के उपभोग हेतु......
 
मालिक के अब निद्रा त्यागने और अंगडाई लेने का समय आ गया है........
 हमारे जागने से  खलबली मचने लगी  है........
सही समय पर वार आवश्यक है........

क्या आप तैयार हैं ????

मंगलवार, 4 सितंबर 2012


 पगडण्डी / The Road Less Travelled .


Roads...Immediately conjures up a long stretch of tarmac...with people travelling both sides on the way to somewhere which they can't fathom most of the time . Then what is it that makes us leave these well known roads and venture into lanes and bylanes ? Sometimes the memory of a hurt , sometimes a zing of laughter that rang out in another life, or may be it is just a need to slow down and think ...is there another way to reach where the road carries us ?
     A way in which we have time to turn the pebbles that are strewn on the lanes and reminisce on an old memory ? Or linger on for a while to gaze upon the fascinating old edifices there ? Or may be come across something which has laid there in wait for us for eons- waiting to be discovered ?
     Whatever the reason , lets meander our way through the lanes and bylanes created in this edition , to share the joy of poetry as it walks through the road less travelled .
     As the song says ...इन रेशमी राहों में , एक राह तो वो होगी , तुम तक जो पहुँचती है ...

जहाँ से चले थे ...


आज गाँव जाने  वाली इस पगडंडी  पर 
अकेले खड़ी हूँ ...

याद आता है जब इसकी दहलीज पार कर 
निकली थी 
यही पगडण्डी थी 
जो शहर को जाने वाली बस तक 
खींच गयी थी मेरे साथ,
और कोई नहीं था।

बमुश्किल 
हाथ छुड़ा कर 
सारे सपने बटोर कर 
बैठ गयी थी शहर ले जाने वाली 
उस गाड़ी  में ..

रात जब नींद नहीं आती थी 
ख्यालों में आती थी यही पगडण्डी 
और विपरीत से मौसम में 
उठ खड़े होने का साहस देती थी।

आज मैं हूँ फ़िर गाँव के रास्ते 
और स्वागत में वही पगडण्डी 
मेरे सपने पूरे हुए या अधूरे 
इसे नहीं पता 
ये आतुर है 
किसी ''माँ' की तरह 
बस स्नेहाशीष बरसाने को 
खुश है ...

मै भी सफ़र के बाद लौट आयी हूँ 
वहीँ ..
जहाँ से जड़ें जुड़ीं हैं .

बुधवार, 22 अगस्त 2012

अनुसूया देवी का मंदिर उत्तराखंड

Anusuya Temple Uttarakhand

मंदिर अनुसूया देवी का मंदिरउत्तराखंड के चमोली जिले केमुख्यालय से १३ किलोमीटर औरवहां से  किलोमीटर की दूरी परउत्तर दिश में कीलांचल पर्वत(ऋषयकुल पर्वत) के तलहटी मेंस्थित है! यहाँ पञ्च केदारो के एकश्री रुद्रनाथ की दूरी १४किलोमीटर की दूरी (पैदल मार्ग)रह जाती है! अनुसूया देवी से पश्चिम की और से पंच केदारो में ही एक श्री तुंगनाथ का मंदिर है ! इस प्रकार यह मंदिर तुंगनाथके मध्य ७२०० फीट की ऊँचाई पर अवस्थित एक प्रसिद्ध सिद्दीपीठ के रूप में मान्यता है ! श्री अनुसूया माता के मंदिर निकटमहर्षि आत्री तपोस्थली और दत्तात्रेय है ! पौराणिक कहानी ब्रह्मा के मानस पुत्र  सप्त ऋषियों में वर्णित मह्रिषी अत्री वैदिकसूक्त द्रष्टा ऋषि थे, उन्ही की पत्नी अनुसूया कर्दम प्रजाति और देवहूति की कन्या थी! देवी अनुसूया को पतिव्रताओ कीआर्दश और शालीनता की दिव्य प्रतीक माना जाता है ! पौराणिक कथाओ के अनुसार सती अनुसूया के पति मह्रिषी की लम्बीतपस्या से देवगण घबरा गये और ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अत्री के समक्ष प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा ! महर्षिअत्री ने कहा ऋषि का स्वभाव तप करना है, वरदान लेना नहीं! यदि अनुसूया चाहे तो वरदान मांग सकती है ! लेकिनपतिव्रता अनुसूया ने वरदान लेने से इनकार कर दिया जिससे त्रिदेव रुष्ट हो गये! इसी पौराणिक आख्यान से जुदा एकप्रसंग है की माँ पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती में सतीत्व को लेकर आपस में विवाद हो गया जिसके निराकरण के लिए त्रिदेवब्रह्मा, विष्णु, महेश बदलकर माँ अनुसूया की परीक्षा लेने गए! तीनो ने मांग की माँ अनुसूया नग्न अवस्था में भोजन कराये!देवी अनुसूया तनिक भी विचलित नहीं हुयी और उने नग्न अवस्था में भोजन कराने की स्वीकृति दे दी! देवी अनुसूया ने लौटेसे गंगा जल लेकर तीनो देवो पर छिड़क दिया और तीनो नवजात शिशुओ के रूप में बदल गये और किल्कारिया मरने लगे!माँ अनुसूया ने उन्हें स्तनपान कराया!उधर तीनो देविया पतियों के वियोग से दुखी हो गए और ब्रह्मा के मानस पुत्र ब्रहऋषिनारद के सुझाव पर माँ अनुसूया के समक्ष अपने पतियों को पूर्व रूप में लाने की प्रार्थना करने लगी! अनुसूया माता ने अपनीसतीत्व से तीनो देवो को फिर से पूर्व रूप में कर दिया ! तभी से अनुसूया माता, सती अनुसूया से नाम से प्रसिद्ध हो गयी!त्रिदेवो के वरदान से उन्हें चन्द्रमा, दत्तात्रेय एव दुर्वासा पुत्र प्राप्त हुए!