मंगलवार, 13 मार्च 2012

भारतीय पुरुषों को क्यों नहीं भाती आत्मनिर्भर पत्नी?



depressed husbandक्या भारतीय परिदृश्य में ऐसे परिवार की कल्पना की जा सकती है जिसमें पति से ज्यादा कमाई करने वाली पत्नी को परिवार में उचित मान-सम्मान दिया जाता हो, उसका पति उससे ईर्ष्या या द्वेष नहीं बल्कि उसके घर लौटने तक बच्चों की देखभाल किया करे और जब वह काम से थकी हारी घर लौटे तो उसे अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाए.


भारत जैसे परंपरागत समाज में ऐसी परिस्थितियों के विषय में सोचना भी निंदनीय माना जाता है. यहां हमेशा और हर दृष्टिकोण से पुरुषों को महिलाओं से ज्यादा अहमियत और अव्वल दर्जे का स्थान दिया जाता रहा है. विवाह के पश्चात पत्नियों को अपने पति के अधीन रहने का आदेश दिया जाता है. प्राय: यही देखा जाता है कि विवाहित महिला के स्वतंत्र अस्तित्व और उनकी काबिलियत को कोई महत्व देना ससुराल वाले अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. उसकी अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को दबा कर वह महिला को मात्र एक गृहणी के रूप में ही देखना चाहते हैं. महिला का कर्तव्य और जिम्मेदारियां सिर्फ परिवार जनों तक ही सिमट कर रह जाती हैं. अपने कॅरियर और उपलब्धियों को लेकर उसने जो सपने संजोए थे सब पर निराशा के बादल छा जाते हैं. ऐसे हालातों में जिस पुरुष को अपने सुख-दुख का साथी मानकर उसने विवाह किया था वह भी उसकी अपेक्षाओं को नजरअंदाज कर देता है. क्योंकि कहीं ना कहीं वह भी यह समझता है कि एक आत्मनिर्भर पत्नी को अपने आधिपत्य में रखना बहुत मुश्किल काम है.


लेकिन अगर कोई महिला विवाह के पश्चात बाहर जाकर काम करने का निर्णय लेती है तो उसके समक्ष पहले ही यह शर्त रख दी जाती है कि घरेलू मामलों के प्रति भी वह पूर्ण उत्तरदायी रहेगी. पति, बच्चों और सास-ससुर की देखभाल करने में कोई भी चूक सहन नहीं की जाएगी.


इन हालातों के मद्देनजर आप ऐसे पति की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं जो अपनी पत्नी से कम कमाता हो और फिर भी अपना जीवन संतुष्टि और प्रसन्नता से व्यतीत कर रहा हो.


लेकिन एक नए अध्ययन ने यह बात प्रमाणित की है कि भले ही भारतीय पति अपनी पत्नी की आत्म निर्भरता को सहन नहीं कर सकते लेकिन विदेशी पुरुषों की मानसिकता इस मसले पर थोड़ी अलग है. वह ना सिर्फ अपनी पत्नी का बाहर जाकर काम करना पसंद करते हैं बल्कि अगर उनकी पत्नी उनसे ज्यादा कमाती है तो इसमें भी उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती. इससे उनके वैवाहिक जीवन में कोई परेशानी या मनमुटाव विकसित नहीं होते.


पुरुषों की स्वास्थ्य संबंधी पत्रिका द्वारा संपन्न इस अध्ययन में यह प्रमाणित हुआ है कि समय के साथ-साथ पारिवारिक मान्यताएं और हालात भी पूरी तरह परिवर्तित हो चुके हैं. एक समय पहले जब पत्नी का पति से कम कमाना या गृहणी के रूप में काम करना ही खुशहाल जीवन के लिए उपयोगी माना जाता था आज वहीं अगर पत्नी ज्यादा आय लेती है तो पति को घर में रहकर बच्चों की देखभाल करने में कोई परेशानी नहीं होती.


सर्वेक्षण में शामिल 45% पुरुषों ने यह स्वीकार किया है कि अगर उनकी पत्नी ज्यादा कमाती हैं तो उन्हें अपना घर संभालने में खुशी होगी. जिनमें से हर पांच में से एक पहले से ऐसा कर रहे हैं और वहीं दूसरी ओर आधे पुरुषों का यह भी कहना है कि ऐसा करने के लिए उन्हें अपने पौरुष स्वभाव के साथ थोड़ा समझौता करना पड़ा, लेकिन उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है.


डेली मेल में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार पत्रिका के संपादक पीटर मूरे का कहना है कि आज के पति परंपरागत मानसिकता और अपनी पुरानी छवि को नकार चुके हैं. उनके लिए अच्छा और संपन्न जीवन जरूरी है. पत्नी की कमाई से उनकी जरूरतें पूरी होती हैं तो उन्हें यह सब अच्छा ही लगता है.


उल्लेखनीय है कि इस विदेशी शोध के बाद यह तथ्य सामने आया है कि जिन विदेशी लोगों को हम गैर-जिम्मेदार और अत्याधुनिक सरीखी संज्ञाएं देकर भारतीयों को उनसे कहीं ऊंचे स्थान से नवाजते हैं, उस विदेशी जीवनशैली में अब कौन ज्यादा कमाता है या घर की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए यह कोई बड़ा मसला नहीं रह गया है. कहीं ना कहीं पाश्चात्य देशों में महिलाओं की समान भागीदारी को आदरपूर्ण स्वीकार कर लिया गया है. अगर उनके पीछे पति घर और बच्चों की देख-रेख करता है तो भारतीय परिवेश की तरह उस परिवार को निंदनीय या उपहास योग्य नहीं समझा जाता. लेकिन हम भारतीय जो हमेशा विदेशों की नकल करना ही अपनी प्राथमिकता समझते हैं, वहां ऐसे हालात कब बनेंगे, कब महिलाओं के पृथक और स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार किया जएगा. वर्तमान हालातों को देखते हुए यह कहना किसी के लिए भी संभव नहीं है.

सोमवार, 12 मार्च 2012

खानाबदोश जातियों की त्रासदी



इटली के तुरि
 शहर के उपनगर वेलेट का वह दृश्य देखकर भारत के किसी शहर या नगर की याद ताजा हो सकती है जब यूरोप के खानाबदोश कहे गए रोमाओं की बस्ती, जिन्हें जिप्सी भी कहा जाता है-इतालवी लोगों के हमले एवं आगजनी का शिकार हुए। दरअसल 10 दिसंबर को वहां तुरिन शहर के उपनगर वेलेट के पास स्थिति रोमाओं की बस्ती पर वहां बसे इतालवी लोगों ने हमला कर भयंकर आगजनी की और वहां लंबे समय से बसे जिप्सियों को खदेड़ दिया। बहाना बना 16 साल की एक इतालवी लड़की का यह झूठा दावा कि उसके साथ दो रोमाओं ने अत्याचार किया। अधिकतर हमलावर खुद निम्न तबके से थे जो तूरिन की अब बंद हो चुकी फैक्टि्रयों में काम करने के लिए गए थे। मालूम हो कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब रोमाओं की बस्ती पर हमले हुए या उन्हें खदेड़ा गया। कुछ समय पहले इटली के नेपल्स शहर में भी रोमाओं की बस्ती हमले का शिकार हुई थी। मालूम हो कि किसी रोमा महिला द्वारा किसी बच्चे को चुराए जाने के आरोप के बाद इस बस्ती का ऐसा हाल किया गया। नेपल्स के वे युवा जिन्होंने मोलोटोव काकटेल्स की बोतलें फेंककर बस्ती का यह हाल किया वह यह कहते हुए दिखे कि वे नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम में जुटे हैं।

भारत में रहने वाले विभिन्न खानाबदोश समुदायों की तरह ही यूरोप के रोमाओं की स्थिति है। वे विभिन्न तरह के नस्लीय उत्पीड़न का शिकार होते आए हैं। आज के समय में इटली में रोमाओं की अर्थात जिप्सियों की आबादी डेढ़ लाख हैं। इनमें 70 हजार बाकायदा इटली के नागरिक हैं। 2001 में जब दक्षिण अफ्रीका के डरबन में नस्लवाद तथा वंश आधारित उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में विश्व सम्मेलन हुआ तो उसमें भी रोमा लोगों के खराब होते हालत पर निगाह डाली गई थी। ब्रिटेन के सम्मानित अखबार गार्डियन ने कुछ समय पहले इटली में किए गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए विस्तृत समाचार दिया था। इसके मुताबिक 68 फीसदी लोगों ने बताया कि वे चाहते हैं कि रोमाओं को देशनिकाला दे दिया जाए। यही समय था जब तत्कालीन नवनिर्वाचित इटली के राष्ट्रपति बर्लुस्कोनी ने अप्रवासियों को शैतान की सेना घोषित किया और वह राजधानी रोम में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार मुसोलिनी के मुरीद मेयर पद पर काबिज होने में कामयाब हुए थे।

द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर काल में इटली के आर्थिक विकास के दिनों में तुरिन की फैक्टि्रयों में काम करने के लिए दक्षिण इटली से आने वाले प्रवासियों के लिए बसे वेलेट उपनगर पर इटली के आर्थिक संकट की छाया आसानी से देखी जा सकती है। विकसित यूरोप का हिस्सा कहे गए इटली से रोमाओं को देश निकाला देने की तैयारियां देश के कुछ हिस्सों में खानाबदोश समुदाय पर हुए अत्याचारों की याद ताजा करती हैं। नेपल्स की घटना के कुछ समय पहले सूबा मध्य प्रदेश के मुल्तई जिले से खबर आई थी जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों ने उस इलाके में लंबे समय से रह रहे खानाबदोश समुदाय के लोगों पर यह कहकर हमला किया था कि उन्होंने किसी महिला के साथ अत्याचार किया। हमले में इस समुदाय के दो लोगों को मार डाला गया। आसपास के इलाके के रहने वाले लोगों की भीड़ इतनी आक्रामक थी कि उन्हें रातों रात 300 किलोमीटर दूर भोपाल भेज दिया गया। वहां आज भी वह बदहाल घूमने के लिए अभिशप्त हैं। उसी दौरान एक घटना बिहार के वैशाली जिले से आई जहां नट नाम के खानाबदोश जाति के लोगों को चोरी के शक में मार डाला गया, जो गांव में अपने किसी परिचित के यहां शादी के सिलसिले में आए थे। पुलिस वालों ने भी तत्काल इन मृतकों के खिलाफ चोरी का केस दर्ज किया।

खानाबदोश जातियों को आज डीनोटिफाइड ट्राइब्स यानी विमुक्त जाति नाम से जाना जाता है। यह वही जातियां हैं, जिन्हें ब्रिटिश उपनिवेश के दिनों में अपराधी जातियां कहा जाता था और कहा जाता था कि वे अलग-अलग किस्म के गैर जमानती अपराधों को अंजाम देने के आदी हैं। एक बार जब किसी जाति को अपराधी के तौर पर मान लिया जाता था, तब उसके सदस्यों की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वे स्थानीय मजिस्ट्रेट के यहां अपना नाम दर्ज कराएं और ऐसा न करने पर भारतीय दंड विधान के तहत उन्हें अपराध के लिए जिम्मेदार माना जाता था। आजादी के बाद क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1952 में भले ही इस नोटिफिकेशन को समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसका स्थान हैबिचुअल अफेंडर्स एक्ट ने लिया। यह कानून पुलिस को इजाजत देता है कि वह संदिग्ध की आपराधिक प्रवृत्ति को जांचे और पड़ताल करे कि क्या उसका व्यवसाय स्थाई किस्म की जीवनशैली के लिए अनुकूल है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की भेदभाव विरोधी इकाई कमेटी ऑन द एलिमिनेशन ऑफ रेशियल डिसक्रिमिनेशन ने भारत सरकार से यह अपील की है कि वह इस अधिनियम को खारिज कर दे और इन विमुक्त जातियों का प्रभावी पुनर्वास करे। मगर अभी इस दिशा में कोई खास पहल नहीं हो सका है।

वर्ष 1931 में इन जातियों की समुदाय आधारित आखिरी जनगणना हुई थी। इसके बाद से इनकी आबादी का अनुमान प्रोजेक्शन के आधार पर ही किया जाता है। वैसे समुदाय विशेष के समूचे लोगों का अपराधीकरण का सिलसिला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ रहा है। सांप्रदायिक तनाव की स्थिति में या जातिगत तनावों की पृष्ठभूमि में ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती हैं। एक तरह से देखें तो राज्य और सिविल समाज के वर्चस्वशाली हिस्से के बीच इस मामले में साफ अपवित्र गठबंधन दिखता है। इस मामले में राजस्थान की हालिया घटनाएं प्रमाण पेश करने वाली हैं। जयपुर की एक अदालत ने पिछले दिनों ऐसे 11 निरपराध लोगों को बरी किया जिन्हें 2008 के जयपुर बम धमाके की घटना को अंजाम देने के आरोप में जेल में ठूंसा गया था। याद रहे कि इन बम धमाकों में साठ से अधिक लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हो गए थे और उसमें शक की सुई कथित तौर पर बांग्लादेश में बने संगठन हूजी पर था। पुलिस के इस संदेह की गाज राजस्थान में जगह-जगह बसे बांग्लाभाषियों विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय से संबद्ध लोगों पर गिरी। यही हाल मालेगांव बम धमाके 2006 तथा मक्का मस्जिद बम धमाके के बाद भी दिखी थी। सभी जानते हैं कि हमारे समाज में आम नागरिकों को अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों के बावजूद पुलिस के हाथों आएदिन प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है।

अक्सर ऐसे मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय भी अपनी चिंता का इजहार करता रहता है। इस पृष्ठभूमि से समझा जा सकता है कि ऐसा कोई कदम बांग्लादेशियों के नाम पर आबादी के कितने बड़े हिस्से के मानवाधिकार उल्लंघन का सबब बन सकता है। विडंबना यही है कि आतंकी हमले जैसी किसी घटना के बाद समूचा वातावरण इतना जज्बाती किस्म का हो जाता है कि यह प्रश्न उठाना भी खतरे से खाली नहीं होता कि क्या ऐसा कदम संविधान की मूल भावना के अनुकूल है और क्या संविधान के तहत समूचे समुदाय को निशाने पर रखने की छूट दी गई है?

क्या दंड के बिना सुधार संभव है?



corporal punishmentजब भी व्यक्ति के चारित्रिक या मानसिक सुधार की बात आती है तो बिना किसी ठोस आधार के हम ऐसा मानकर चलते हैं कि सुधार करने के उद्देश्य से दंड देना अनिवार्य और प्रभावकारी है. जब तक व्यक्ति को उसकी सजा के अनुरूप दंड नहीं दिया जाएगा वह कभी भी अपनी गलती को पहचान नहीं पाएगा.

दंड की यह अवधारणा या प्रक्रिया बचपन से ही व्यवहारिक रूप ग्रहण कर लेती है. जब बच्चा कोई गलती करता है तो माता-पिता उसे समझाने की बजाए उस पर हाथ उठा देते हैं. कभी-कभार अभिभावक बच्चे को उसकी गलती का अहसास दिलवाने के लिए अन्य लोगों के सामने ही उसे डांटने या मारने लगते हैं. कोई भी माता-पिता अपने बच्चे का बुरा नहीं चाहते इसीलिए इस कदम के पीछे उनका यही उद्देश्य रहता है कि बच्चे को यह समझ आए कि उसने क्या गलत किया है ताकि आगामी जीवन में कभी भी वो ऐसी हरकत ना करे.

अध्यापकों की मानसिकता भी दंड के इसी विधान पर केन्द्रित रहती है. अगर छात्र स्कूल में कोई गलती करें या दिया गया काम समय पर पूरा ना करें तो वह उन्हें शारीरिक दंड देना ही बेहतर समझते हैं. क्लास के अन्य बच्चों के सामने उस पर हाथ उठा कर उन्हें लगता है बच्चे को सही राह पर ले जाने का उनका उद्देश्य पूरा हो गया.

लेकिन क्या ऐसे बच्चे जो अपनी हर छोटी गलती के लिए अभिभावकों और अध्यापकों के क्रोध का शिकार बनते हैं आगे चलकर एक अच्छे सामाजिक नागरिक बन सकते हैं?

प्राय: देखा जाता है कि जिन बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है वह आगे चलकर असामाजिक तत्वों में परिवर्तित हो जाते हैं और अपने परिवार और आसपास के लोगों के लिए परेशानी बन जाते हैं. पहले वह अपने अभिभावकों और अध्यापकों को परेशान करते थे अब वह अपने समाज के लिए एक खतरा बन जाते हैं. उनके मन में एक बात बैठ जाती है अगर वह पकड़े गए तो ज्यादा से ज्यादा उन्हें शारीरिक दंड ही तो दिया जाएगा जिसकी उन्हें अब आदत पड़ चुकी है. यही मानसिकता उनसे हर गलत काम करवाती है और जिसके लिए उन्हें किसी भी प्रकार की ग्लानि या पछतावा नहीं होता. इस व्यवहार के बच्चे अत्याधिक क्रोधी और जिद्दी बन जाते हैं. उन्हें सही राह पर लाना लगभग असंभव हो जाता है.

बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं. अगर हमारे भविष्य की नींव ही खराब हो या नैतिक विचारों से पूरी तरह दूर हो तो हम कैसे एक सुखद भविष्य और प्रगतिशील समाज की कल्पना कर सकते हैं.

स्कूल और घरेलू मसलों को छोड़ भी दें तो हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि भारतीय जेलों को आपराधिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण संस्थान माना जाता है. जब एक छोटा सा चोर जेल जाता है तो वहां से निकलने के बाद वह एक शातिर अपराधी बन जाता है. इस परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण जेल में उसके साथ किया गया कठोर और अमानवीय व्यवहार ही होता है. अगर उस चोर को जेलकर्मियों द्वारा मारा-पीटा ना जाता बल्कि मनोवैज्ञानिक सहायता और पूरी परिपक्वता के साथ उसे अपनी गलती का अहसास करवाया जाता तो शायद वह इस बात को समझ सकता था कि चोरी करना एक अनैतिक काम है. लेकिन सजा देकर हम कैसे किसी व्यक्ति के भीतर चारित्रिक सुधार विकसित कर सकते हैं. एक बार अपराध के क्षेत्र में कदम रखने के बाद व्यक्ति को सजा या दंड का भय नहीं रहता. क्योंकि अगर उन्हें ऐसा कोई भय होता तो वह कभी भी यह राह नहीं चुनते.

वैसे तो यह बात हमेशा से ही विवाद और बहस का विषय रही है कि क्या दंड के बिना सुधार संभव है?  अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यह बात स्पष्ट है कि दंड और सुधार कभी साथ-साथ चल ही नहीं सकते. दंड आपराधिक वारदातों और इसके पीछे की सोच को और अधिक प्रबल बनाता है. अगर हम दंड देते हैं तो हमें सुधार की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए.

परिवार और स्कूल का सकारात्मक वातावरण ही बच्चे के भीतर सही सोच और समझ विकसित करता है. गांधी जी जिन्होंने अहिंसा को ही अपना परम धर्म स्वीकार कर लिया था उनका कहना था कि दंड और अहिंसा कभी साथ-साथ नहीं चल सकते. सुधार करने का अर्थ कतई यह नहीं हो सकता कि बच्चे को मारा या प्रताड़ित किया जाए. अभिभावकों और अध्यापकों द्वारा दी गई नैतिक शिक्षा ही बच्चे के भीतर चारित्रिक गुणों का विकास करती है. बचपन में दी गई सीख ही आगामी जीवन में सही-गलत की पहचान करना सिखाती है. न्याय संस्था या विधान ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति की सोच व उसकी दूषित मानसिकता को बदलने में कामयाब हो. शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर व्यक्ति को सिर्फ जटिल और जिद्दी ही बनाया जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप उसके आपराधिक चरित्र को और अधिक बढ़ावा मिलता है.

स्त्री-विमर्श का सच

स्त्री-विमर्श के विषय में बात करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या वाकई हमें उस अधिकार और स्वतंत्रता की जरूरत है जिसे पाने के बाद समाज और परिवार दो भागों में बंट सकता है?

भारतीय समाज में हमेशा से ही महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा दूसरे दर्जे का स्थान दिया गया है. उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति शोषित और असहाय से अधिक नहीं देखी गई. महिलाओं को हमेशा और हर क्षेत्र में कमतर ही आंका गया जिसके परिणामस्वरूप उनके पृथक अस्तित्व को कभी भी पहचान नहीं मिल पाई. पति या पिता के बिना महिला के औचित्य, उसकी संपूर्णता के विषय में गंभीरता से चिंतन करना किसी ने जरूरी नहीं समझा.


फिर दौर आया प्रगतिशील लेखकों और कवियों का जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से महिलाओं की शोषित सामाजिक और पारिवारिक छवि को सार्वजनिक किया. स्त्रियों पर होते अत्याचार और उनकी मार्मिक दशा पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर प्रगतिशील लेखकों ने महिलाओं को समाज की मुख्य धारा से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया. निश्चित तौर पर इस दौरान महिलाओं की दमित और शोषित परिस्थितियां उल्लेखनीय ढंग से परिमार्जित हुईं. जहां एक ओर महिलाओं को पुरुषों के ही समान कुछ आवश्यक और मूलभूत अधिकार मिलने लगे, वहीं शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण महिलाएं भी स्वयं अपनी महत्ता को समझने लगीं.


प्रगतिशील कवियों की रचनाओं में यह साफ प्रदर्शित होता है कि वे स्त्री-पुरुष के स्वभाव और व्यक्तित्व में व्याप्त भिन्नताओं के आधार पर किसी को उच्च या निम्न नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में पेश करते थे. उनका मानना था कि विपरीत लिंगों में भिन्नता होना उन्हें एक-दूसरे को संपूर्णता प्रदान करने में बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. लंबे समय से स्त्री को पुरुष की संपत्ति के रूप में देखा और स्वीकार किया गया लेकिन इस मानसिकता और सामाजिक आचरण को चुनौती देने वाले आंदोलन ने कभी भी समाज में आपसी टकराव को विकसित नहीं किया.


feministलेकिन जो काम प्रगतिशील रचनाकार नहीं कर पाए, वह काम उन लोगों ने कर दिखाया जिन्हें आज हम नारीवादी या फेमिनिस्ट के तौर पर ज्यादा बेहतर जानते हैं. नारी के अधिकारों और स्वतंत्रता के पक्षधर इन लोगों ने आज ऐसे हालात विकसित कर दिए हैं जिन्हें अगर हम टकराव या मतभेद कहें तो कदापि गलत नहीं होगा.


नारीवादी लोगों का सैद्धांतिक उद्देश्य लैंगिक असमानता और भेदभाव को राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से दूर कर महिला और पुरुष दोनों को ही जीवन यापन करने और अपने अस्तित्व को निखारने के लिए समान अवसरों और अधिकारों की पैरवी करना है. उनके आदर्शों में प्रजनन संबंधी अधिकार, घरेलू हिंसा, समान वेतन संबंधी अधिकार, यौन उत्पीड़न, भेदभाव एवं यौन हिंसा जैसे विषय प्रमुखता के साथ शामिल हैं.


लेकिन नारीवादी लोगों के सिद्धांतों और व्यवहारिक कार्यों में अत्याधिक अंतर है. स्त्रियों को समानता और न्याय दिलवाने का उद्देश्य भले ही एक सकारात्मक पहल हो परंतु उनके मंतव्यों पर हमेशा ही प्रश्न चिंह लगा रहा है. उन्होंने महिला और पुरुष को एक-दूसरे के पूरक से बदलकर आपसी विरोधी के रूप में पेश कर दिया है. जिसके परिणामस्वरूप आपसी संबंधों में बरती जाने वाली सहनशीलता और सहयोग की भावना में दिनोंदिन कमी आने लगी है.


स्त्री-विमर्श का मूल कथ्य यही रहता है कि किसी भी प्रकार या दृष्टिकोण से कानूनी और सामाजिक अधिकारों का आधार लिंग ना बने. लेकिन आधुनिक स्त्री विमर्श पर पूर्ण रूप से पश्चिमी दर्शन और मूल्य हावी हो चुके हैं. नारीवादी स्त्रियों के अधिकारों की पैरोकारी तो करते हैं लेकिन उन्हें जिन कर्तव्यों का पालन करना चाहिए इस ओर वह ध्यान देना जरूरी नहीं समझते.

समाज और परिवार के भीतर स्त्री-पुरुष दोनों को कुछ जरूरी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वाह करना पड़ता है. हो सकता है कि कुछ स्वतंत्र आचरण रखने वाली महिलाओं को विवाह के पश्चात अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियां उठाना अच्छा ना लगे लेकिन परिवार और आपसी संबंधों में खुशहाली बनाए रखने के लिए इस संदर्भ में उनका समझौता करना एक आवश्यकता बन जाता है. लेकिन नारीवादी जो किसी भी प्रकार के समझौते के सख्त विरोधी हैं वह इसे भी महिलाओं के साथ होता अत्याचार और उनका शोषण ही मानते हैं. अगर थोड़े बहुत समझौते और सहयोग से गृहस्थी और परिवार की खुशहाली बनी रहती है तो इसमें किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए. स्त्री-विमर्श की कटु सच्चाई यही है कि इसमें दो विपरीत लिंग के लोगों की मौलिक विशेषताओं और उन दोनों के बीच की स्वाभाविक भिन्नताओं को पूरी तरह नजर अंदाज कर दिया गया है.


आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं जहां महिलाएं अपने हितों के लिए जागरुक हुई हैं वहीं परिवार और समाज भी उन्हें सम्मान देने में कोई कोताही नहीं बरतता. बेटे के ही समान बेटी को भी शिक्षा और उपयुक्त आजादी दी जाती है. उसे भी अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर दिया जाता है. लेकिन अगर आज कोई परिवार बेटी के बाद बेटे की चाह रखता है तो नारीवादी इसे महिलाओं के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ समझते हैं जबकि हकीकत यह है कि हमारी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार विवाह के पश्चात बेटी अपने ससुराल चली जाती है. ऐसे में अभिभावक अकेले ना रह जाएं इसीलिए वह एक बेटे की भी आशा रखते हैं. इसमें भेदभाव की बात कहीं भी स्थान नहीं रखती.

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की पीड़ा


संसदीय गतिरोध और नीतियों पर असहमति के कारण देश की कई योजनाएं खटाई में पड़ती दिख रही हैं। संसद के शीतकालीन सत्र में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। चाहे वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामला रहा हो, खाद्य सुरक्षा बिल या फिर भ्रष्टाचार निरोधी उपाय के रूप में लोकपाल बिल। भारतीय संसद की करीब 60 वर्षो की गरिमामय यात्रा में हमने अधिकांश समय गतिरोध और असहमति में बीतते देखा है। बहुदलीय शासन व्यवस्था के परिणाम मानकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते है, परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी दल सत्ता में आने के लिए संसदीय गरिमा को ताक पर रखने में झिझक महसूस नहीं करता। बहरहाल, शीतकाली संसद सत्र से लोगों ने काफी उम्मीदें बांध रखी थी, लेकिन इन उम्मीदों के बीच हमने असंगठित क्षेत्रों के लगभग 43 करोड़ श्रमिकों के लिए जरूरी कल्याणकारी योजनाओं पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। संप्रग सरकार के चुनावी घोषणापत्र में इनके कल्याणार्थ व्यापक आश्वासन भी दिए गए थे, परंतु ये आश्वासन संभवत: साकार होते नहीं दिख रहे हैं। समानता के साथ विकास में विश्वास रखने वाले भारतीय लोकतंत्र को असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के शोषण व असुरक्षा पर व्यापक ध्यान देने की जरूरत है।

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल श्रम शक्ति का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा इन असंगठित श्रमिकों का ही है जबकि सकल घरेलु उत्पाद में इनका योगदान 65 प्रतिशत के आसपास है। राष्ट्रीय बचत में भी इनका योगदान अत्यल्प लगभग 45 प्रतिशत है। इसके पीछे कारण यह है कि एक तो ये श्रमिक अपने नियोक्ताओं से कई तरह के शोषण के शिकार हैं दूसरे इनको किसी प्रकार की भविष्यनिधि या सामाजिक सुरक्षा का कवच प्राप्त नहीं है। न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम कीमत पर ये अपना श्रम बेचने को मजबूर हैं, क्योंकि इनकी आवाज संगठित श्रमिकों की तरह मजबूत नहीं है। इनके पास विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं पहुंच पाता है और बिचौलिए अथवा अपने नियोक्ताओं द्वारा भी ये काफी उपेक्षित रहते हैं। कार्ल मा‌र्क्स के वर्ग संघर्ष की अवधारणा व साम्यवाद लाने के लिए श्रमिक शक्ति के योगदान की बात भी इन असंगठित श्रमिको पर खरी नहीं उतरती। वर्तमान में श्रमिक संघ जिनकी आवाज सरकार की सत्ता तक हिलाने की औकात रखती थी भी असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के मामले में कुछ नहीं कर पाती। इसके अलावा भी कुछ तथ्य ऐसे हंै जो इन श्रमिक संगठनों की स्थिति में परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं।

वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन संगठनो के प्रभाव में व्यापक कमी आई है। उद्योग प्रधान देशों में श्रमिकों के रहन-सहन का स्तर ऊंचा उठने, आमदनी में वृद्धि होने के कारण अब श्रमिक संघ या संगठन के प्रति ज्यादा सक्रिय नहीं हो पाते। इंग्लैंड में 1970 के दशक में गोल्डथोर्प, लॉकवुड व अन्य विद्वानों ने वर्गो के ढांचे में संपन्न श्रमिक विषय पर एक अध्ययन किया जिसका उद्देश्य यह पता करना था कि क्या वाकई संपन्न वर्गो व श्रमिक वर्गों की अवधारणा में इस तरीके के बदलाव आए हैं। इस अध्ययन के बाद प्राप्त निष्कर्षो से पता चला कि मजदूर अपने कार्य को जीवन निर्वाह का एक साधन भर समझता है। अत: वह अपने कार्यस्थल से किसी तरह का घनिष्ठ लगाव महसूस नहीं करता और न ही अपने साथियों से मेल-मिलाप बढ़ा पाता है। मा‌र्क्स ने इसी के एक रूप को अलगाव से संबंधित किया है जिसमें श्रमिकों का अपने उत्पादित वस्तु पर कोई अधिकार नहीं होता। इससे उनमें एक तरह के भावनात्मक अलगाव का बोध होता है। उनके श्रम और उत्पादित वस्तु के मूल्य में भारी अंतर होता है और यह अंतर ही उनके शोषण का लाभ मूल्य है जिसका पूंजीपति उपभोग करते हैं। हालांकि श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने और देश की आय वृद्धि में इन सामाजिक तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान श्रमिक चाहे वह संगठित क्षेत्र में हों या असंगठित, पूंजीवाद को मौन स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं। कहीं-कहीं छिटपुट आंदोलनों और साथियों के संघर्षो से उन्हें ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। यही वजह है कि उनके इस निष्कि्रय भाव का बाजार, पूंजीपति और यहां तक कि समाजवादी प्रशासन का दावा करने वाली सरकार भी व्यापक शोषण करती है।

आधुनिक प्रौद्योगिकी की वजह से भी श्रमिक नए-नए मशीनों के साथ काम करते हुए भाव शून्य होते जा रहे हैं। पूंजी प्रधान समाज में उनकी एकमात्र अभिलाषा अधिक से अधिक आय करना भर रह गया है। ओवर टाइम के प्रचलन के बाद से इसमें और भी तीव्रता आई है। पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था के साथ उनका भी पूंजीकरण होता जा रहा है और यह मानवीय गरिमा के विरुद्ध है जिसमे व्यक्ति के श्रम को मशीनी श्रम के बराबर माना जाता है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए वैश्वीकृत आर्थिक व्यवस्था में सहभागिता का अभाव है। इस कारण उनकी स्थिति के प्रति किसी का ध्यान ज्यादा आकर्षित नहीं हो पाता। असंगठित श्रमिकों की संख्या तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ बढ़ रही है। इन श्रमिकों में बुनकर, रिक्शा चालक, बीड़ी बनाने वाले, घरेलू नौकर, सब्जी बेचने वाले, फेरी लगाने वाले से लेकर सेवा क्षेत्र के कई नियोजनों में लगे असंगठित श्रमिक तक शामिल हैं। उत्पादन के बदलते तरीकों और सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन में बदलती परिस्थितियों के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र तथा श्रमिकों का स्वरूप व अवधारणाएं भी बदली हैं। जटिल आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था के बढ़ने से इन कामगारों का दैनिक जीवन अत्यंत व्यस्त व जीवन स्तर अत्यंत निम्न हो गया है।

आय व व्यय की असंगतता ने इनकी आर्थिक स्थिति को इस लायक नहीं छोड़ा कि ये बेहतर जीवन जी सकें। अपनी आजीविका का स्थायित्व बोध न पाकर ये काफी हतोत्साहित भी रहते हैं। इनके अंदर रोजगार तुष्टि का भाव कम ही होता है। एक नई बात और भी सामने आई है जिस पर कुछ मनोचिकित्सकों ने पिछले दिनों एक अध्ययन में स्पष्ट किया कि इनमे मानसिक असंतुलन व व्यवहारगत बीमारियों का खतरा भी संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की अपेक्षा ज्यादा होता है। कई समस्याओं को अपने साथ लिए ये श्रमिक आजादी के 64 वर्षो के बाद भी अपनी स्थिति पर लाचार बने हुए हैं और इनके लिए स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। आर्थिक विकास के सारे परिणाम इनके लिए कोई मायने नहीं रखते। राजनीतिक आश्वासनों व अपने समर्थन में दो शब्द सुनकर ही ये तृप्त हो लेते हैं जबकि वे हमारे समाज के एक अंग और लाभकारी सदस्य हैं। उनकी उपेक्षा किसी भी रूप में उचित नहीं है। हमें उनके रोजगार व सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कई कानूनी प्रावधान किए गए, जिससे इनकी बेहतरी की आशा जगी है परंतु जैसा कि कई योजनाओं के साथ होता आया है ये योजनाएं व कानून भी अपने मूल रूप में लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाई। भारतीय संविधान निर्माताओं ने इनके लिए संविधान में सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यवस्था की है जिसका पालन होना चाहिए।

क्या गीता चरमपंथी साहित्य है?



रूस की एक अदालत ने भगवद् गीता के रूसी संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ी मांग को खारिज कर दिया. साइबीरिया के शहर टॉम्सक में अभियोजन पक्ष की दलील थी कि यह संस्करण कट्टरपंथी है.


हिंदू धर्म और जीवनशैली में भागवत गीता को एक विशेष स्थान और सर्वआयामी महत्व प्रदान किया गया है. इसे वेदों और उपनिषदों के सार के रूप में प्रस्तुत किया गया है. गीता ना सिर्फ हमें जीवन के सही अर्थ से अवगत करवाती है बल्कि भौतिक दुनियां में बढ़ रहे क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को नकार कर मनुष्य को सही राह पर चलने और जीवन के उच्च मूल्यों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करती है. श्रीमद भागवत गीता की इसी खूबी के कारण इसे हिंदुओं के पवित्र धार्मिक ग्रंथ के रूप में अपनाया गया है.


bhagwat gitaमहाभारत के समय जब अर्जुन को अपने निकट संबंधियों और परिवारजनों से युद्ध करने की चुनौती मिली थी तो उन्हें यही डर सता रहा था कि अगर वह युद्ध में हार गए तो भी उन्हें दुख होगा और अगर अपने भाइयों की जान लेकर युद्ध में विजयी हो भी जाते हैं तो भी उन्हें आंतरिक हानि और कष्ट पहुंचेगा. इस समय कृष्ण ने उन्हें समझाया था कि जीवन ही सबसे बड़ी युद्ध भूमि है. श्री कृष्ण ने अर्जुन को सत्य की रक्षा के लिए अहंकार और लालच से लड़ने के लिए प्रेरित किया था.


याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि गीता का यह उपदेश युद्ध के लिए प्रेरित करता है और इस्कॉन शाखा द्वारा स्थानीय तौर पर गीता का वितरण कर श्री कृष्ण की महिमा का गुणगान करना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देता है इसीलिए इस पर सार्वजनिक रूप से प्रतिबंधित लगा दिया जाए. किंतु अदालत ने भगवद् गीता के रूसी संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ी  मांग को खारिज कर दिया.


bhagwat gita गीता – सर्व धर्म समभाव से ओतप्रोत

गीता में वर्णित उपदेश हमें सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए इच्छाओं और भय से मुक्त रहना सिखाते हैं. मनुष्य का काम सही कर्म करना है उसे फल देना नियति के हाथों में है.


गीता भले ही हिंदुओं का धार्मिक ग्रंथ हो लेकिन इसमें लिखे उपदेश किसी भी रूप में किसी विशेष जाति समुदाय या धर्म से संबंधित नहीं हैं. गीता को पढ़कर मनुष्य को अपने कर्तव्यों और अध्यात्म की जरूरत का ज्ञान होता है.


मनुष्य अपने जीवन में कई भूमिकाओं का निर्वाह करता है. ऐसे में जाहिर है उसके कर्तव्य और प्राथमिकताएं भिन्न-भिन्न होंगी. श्री कृष्ण ने गीता में दिए गए अपने उपदेशों के जरिए इन्हीं भूमिकाओं पर अडिग रहने को ही जीवन का सही मूलमंत्र कहा है.


गीता में कर्म और सत्य को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है. जहां एक ओर गीता हमें शत्रुओं से लड़ना सिखाती है वहीं त्याग, प्रेम और कर्तव्यों का संदेश भी देती है. मनुष्य जीवन का अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति और सांसारिक दुखों से मुक्ति पाना होता है, श्री कृष्ण के अनुसार यह उसी को मिलता है जो अपनी सभी जिम्मेदारियों और गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए ईश्वर की आराधना करता है. मनुष्य को अहंकार, ईर्ष्या, लोभ, लालच आदि जैसे शत्रुओं को त्यागकर मानवता और सत्य के मार्ग पर अग्रसर करना ही गीता का सार और अंतिम उद्देश्य है.


गीता के अंतर्गत सही प्रशासक और जन सेवक की क्या जिम्मेदारियां होनी चाहिए इन सभी का वर्णन किया गया है. ऐसे में संभवत: इन उपदेशों को अपनी समझ के अनुसार ग्रहण कर लिया जाए. गीता में प्रस्तुत श्लोकों को विभिन्न अर्थों में ग्रहण किया जा सकता है ऐसे में इन उपदेशों के सार के साथ छेड-छाड़ होना भी संभव है. लेकिन इस कारण गीता के मौलिक उद्देश्यों से मुंह नहीं फेरा जा सकता जो जन-जागृति फैलाना और मनुष्य को आध्यात्मिक शिक्षा की ओर प्रेरित करना है

क्या तलाक के लिए महिलाएं ही होती हैं जिम्मेदार ?


क्या तलाक के लिए महिलाएं ही होती हैं जिम्मेदार ?

couple fighting
वैवाहिक संबंध किसी भी व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व लाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. आज भले ही अफेयर जैसे संबंधों को स्वीकार्यता देने वाले युवा अपने कॅरियर और स्वतंत्रता को अहमियत देने लगे हैं लेकिन फिर भी एक पड़ाव पर आकर उन्हें अपने जीवन में एक ऐसे साथी की आवश्यकता महसूस होने लगती है जो हर कदम पर उनका साथ देने के अलावा उन्हें भावनात्मक समर्थन भी प्रदान करे.

हालांकि हमारे परंपरागत समाज में विवाह से पहले शारीरिक संबंध स्थापित करने की अनुमति प्रदान नहीं की गई है लेकिन फिर भी आधुनिकता से ग्रसित हमारे युवा बिना किसी परेशानी के इनका अनुसरण कर रहे हैं. लेकिन इन सब के बीच विवाह रूपी संबंध जो पति-पत्नी को भावनात्मक डोर से जोड़ते हैं, को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन कभी-कभार जब विवाहित दंपत्ति के हित आपस में टकराने लगते हैं, एक-दूसरे के प्रति उनकी अपेक्षाएं अपने मायने गंवा देती हैं तो निश्चित ही उनका साथ रहना मुश्किल हो जाता है. उनके पास तलाक लेकर अलग होने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रहता.

लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां एक तलाकशुदा पुरुष को तो किसी खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता, बिना किसी समस्या के वह दूसरा विवाह कर लेता है लेकिन वहीं अपने पति से तलाक लेने वाली महिला को सम्मान नहीं दिया जाता. बिना किसी सोच-विचार के यह मान लिया जाता है कि संबंध विच्छेद होने के पीछे जरूर महिला का ही हाथ होगा.

कुछ नारीवादी जन और महिलाओं से सांत्वना रखने वाले लोग भले ही उन्हें न्याय दिलवाने के पक्ष में हों लेकिन अब स्वीडन के वैज्ञानिकों ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेरने का काम किया है. क्योंकि उन्होंने इस मान्यता को व्यवहारिक रूप प्रदान कर दिया है कि तलाक की जिम्मेदार केवल महिलाएं ही होती हैं.

स्वीडन स्थित कार्नोलिन्स्का इन्स्टीट्यूट के अनुसंधानकर्ताओं ने यह स्थापित किया है कि तलाक की वजह एक मादा जीन होता है. वैवाहिक जीवन कितना सफल और स्थायित्व लिए होगा यह केवल महिला के शरीर में छिपा जीन ही निर्धारित करता है. जीन यह भी बता सकता है कि कोई महिला अपने दांपत्य जीवन को बचाने के लिए संघर्ष कर सकती है या नहीं.

डेली मेल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार जिन महिलाओं के सामान्य जीन में भिन्नता होती है वह दूसरे व्यक्ति के साथ आसानी से नहीं जुड़ पातीं. अगर ऐसी महिला विवाह कर भी ले, तो उसके दांपत्य जीवन के सामान्य होने की संभावना केवल 50 फीसदी ही होती है. ऐसी महिलाओं की अपने पति के साथ ज्यादा नहीं बनती.

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि यह जीन महिलाओं की ऑक्सीटोसिन हार्मोन के लिए संसाधन प्रक्रिया को प्रभावित करता है जो प्यार और मातृत्व संबंधी लगाव के अहसास को बढ़ाता है.

महिलाओं में ऑक्सीटोसिन हार्मोन का उत्पादन बच्चे के जन्म के समय होता है, लेकिन यदि इस हार्मोन का उत्पादन पर्याप्त तरीके से नहीं होगा तो शायद वह महिला अपने पति, मित्रों और तो और संतान के साथ भी सामान्य जुड़ाव नहीं रख पाती.

इस अध्ययन पर गौर करेंगे तो यह उस स्थापना को झुठलाता प्रतीत होता है जिसके अनुसार महिलाएं स्वभाव से भावुक और सहनशील होती हैं. इसके अलावा इस शोध ने उनके संबंध बनाए रखने और समझौते करने की आदत को भी नकार दिया है. विदेशी पृष्ठभूमि में, जहां संबंधों का टूटना बनना लगा ही रहता है, वहां शायद विवाह जैसे संबंध भी कुछ खास महत्व नहीं रखते, ऐसे में उनके टूटने में किसकी कितनी भूमिका रही यह बात शायद कोई मायने नहीं रखती. लेकिक भारतीय हालात पूरी तरह भिन्न हैं. यहां संबंध जुड़ना जितना महत्व रखता है, उससे कहीं ज्यादा दुख संबंध विच्छेद का होता है. लेकिन इस शोध ने पुरुष प्रधान समाज की परंपराओं को बहुत अच्छी तरह निभाया है. वैसे भी यहां हर गलती के लिए महिलाओं को ही दोषी समझा जाता है.

क्या सचमुच ईश्वर है (कुछ सवाल)


क्या सचमुच ईश्वर है 

हे भगवान,
लोग तुम्हारा क्यों करते हैं गुनगान,
लोग कहते हैं तुम हो सर्वज्ञ,सर्वज्ञाता,सर्वशक्तिमान।
किन्तु मैं ऐसा नहीं मानता,
तुम्हें अच्छी तरह जानता।
तुम सर्वशक्तिमान नहीं हो,
इसलिये मेरी नजर में भगवान नहीं हो।
हिटलर तैमूर नादिरशाह,
जब कर रहे थे लोगों को तबाह।
तब तुमने क्यों नहीं उन्हें दण्डित किया,
अपनी शक्ति से उनका सिर खण्डित किया।
जब जालिमों ने मजलूमों को मारा था,
तब मजलूमों ने तुम्हें पुकारा था।
सब माँगते रहे उनसे और तुमसे ञपने प्राणीं की भीख,
तुम बहरे हो या बहुत दूर, जो नहीं सुनाई दी उनकी चीख।
एक बात तो है प्रत्यक्ष,
कि तुम नहीं हो सर्वज्ञ।
जब कोई आत्म हत्या कर रहा होता है,
हे भगवान, तू क्या उस समय सोता है।
तू जरा भी नहीं सोचता,
उन्हें आत्म हत्या करने नहीं रोकता।
नहीं निभा पा रहा था वह, परिवार क प्रति अपने फर्ज,
उस पर हो गया था ढेर सारा कर्ज।
न कोई धन्धा न कोई रोजगार,
वह था जन्मजात बेरोजगार।
कैसे करता व अपने परिवार का भरण पोषण,
तुम्हें तो मालुम होंगे सारे कारण।
क्यों नहीं किया तुमने उसकी समस्या क निराकरण।
भगवान तुम जरा तो सोच सकते थे,
उसे आत्म हत्या करने से रोक सकते थे।
तुम उसका कर्ज चुका सकते थे,
उसे कोई न कोई रोजगार दिला सकते थे।
तुमने अच्छा नहीं किया उसके साथ,
तुम्हारे कारण ही उसके बच्चे हो गये अनाथ।
उसकी बीबी को तूने ही विधवा बनाया है,
क्योंकि आत्म हत्या करने से उसे नहीं बचाया है।
अब तो बताओ भगवान,
क्यों करूँ मैं तुम्हारा सम्मान।
एक महिला का जब होता है बलात्कार,
तब तू क्यों नहीं करता कोई चमत्कार।
जब राक्षस बन जाता है एक व्यक्ति,
उस समय उस नारी को क्यों नहीं देता अपार शक्ति।
तुम दिखाई दिये केवल द्रोपती चीरहरण के समय,
क्योंकि उस समय चाहिये थी तुम्हें केवल जय।
या द्रोपती रिश्तेदार तुम्हारी अपनी थी
तुम्हारे परम प्रिय मित्र अर्जुन की पत्नी थी।
लगता है वह कोई महाकाव्य की कथा हे,
शायद आज के परिवेश में वृथा है।
क्योंकि आज प्रतिदिन लाखो द्रोपतियाँ होती हैं बलात् नग्न,
और तू अपनी दुनियाँ में गोपियों के साथ है मग्न।
'शहादत' शब्द प्राय अपने देश,धर्म की रक्षार्थ अपने प्राण न्यौछावर करने वालों के लिए होता है.शहीद के लिए जहाँ एक ओर ह्रदय में भावनाओं का ज्वार उमड़ता है,परिजन हितैषी,मित्रगण और देश व धर्म के प्रति श्रद्धा रखने वालों के हृदय भी द्रवित होते हैं,साथ ही एक गर्व की भी अनुभूति भी होती है.ये शहीद इतिहास में श्रद्धापूर्वक स्मरण किये जाते हैं.देश की रक्षा करते हुए ऐसे वीरों की गणना नहीं की जा सकती.
... हमारे देश में ऐसे शहीदों की भी कमी नहीं ,जो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपनों के ही हाथों अपने प्राण गंवा बैठे.ऐसे ही भारतमा के सपूतों में एक नरेंद्र ,जिनकी अजन्मी संतान को माफियाओं ने पितृ छाया से वंछित कर दिया,हँसती पत्नी का सिन्दूर उजाड दिया और देश के लिए कर्तव्य पालन करने वाले को क्या पुरस्कार मिलता है ये बता दिया .कौन देगा इन शत्रुओं को सजा? आवाज़ तो बुलंद करें



सिर्फ मेरे लिए एक काम कर दीजिए इस पोस्ट को जितना हो सके share आपका बहुत बहुत आभार होगा मुझ पर..............................आपसे विनती है अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे। कृप्या इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्र...सारित करें इससे ... उन बच्चों का पेट भर सकता है कृप्या इस श्रृंखला को तोड़े नहीं ..... हम चुटकुले और स्पाम मेल अपने दोस्तों और अपने नेटवर्क में करते हैं ,क्यों नहीं इस बार इस अच्छे सन्देश को आगे से आगे मेल करें ताकि हम भारत को रहने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह बनाने में सहयोग कर सकें - 'मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं ' - हमें अपना मददगार हाथ देंवे । भगवान की तसवीरें फॉरवर्ड करने से किसी को गुड लक मिला या नहीं मालूम नहीं पर एक मेल अगर भूखे बच्चे तक खाना फॉरवर्ड कर सके तो यह ज्यादा बेहतर है.

Misperceptions of Migration


Misperceptions of Migration
Arvind Kumar pandey
The International Organization for Migration (IOM), in its World Migration Report 2011, states that about 214 million people were living and working outside their home country in 2010, and international migration has continued to grow despite the global economic crisis, but in many countries negative attitudes towards migrants are also rising. While focusing on the importance of communicating more effectively about migration, the Report notes that such attitudes stem in part from misinformation and misperceptions about migration that have been fuelled by opportunistic politicians and poor media reporting. It further observes: "Few areas of public policy are subject to greater misrepresentation... yet more influenced by public opinion, than international migration," write the report's authors. "Accurately informing relevant stakeholders and the wider public about migration may be the single most important policy tool in all societies faced with increasing diversity."
It is revealed that during periods of economic recession, national debates on migration issues are often politicized, and evidence of the economic benefits that migration can bring is ignored in favour of assumptions that migrants are fuelling unemployment and draining public resources. People in migrant-receiving countries tend to significantly overestimate the size of their country's migrant population, and often blame them for social ills ranging from crime to unemployment. A 2010 public opinion poll, cited in the report, found that 57 percent of Americans felt immigration had a negative effect on the country. Another recent study of eight migrant-receiving countries found that an American perception of 39 percent of the US population being migrants differed significantly from the actual figure of 14 percent. Italians believed 25 percent of their population were migrants, more than three times the actual number. The IOM report asserts that such episodes could be avoided by "a fundamental shift in the way we communicate about migration" so as to foster more informed debate and "prevent migration from being used as a platform for other political, social and economic issues".

Asian Cities Food Resilience


Asian Cities Food Resilience
 Arvind Kumar pandey
Experts at a recently held UN Food and Agriculture Organization (FAO) workshop in Bangkok on resilient food systems in Asia said that Asia’s largest cities will need to maximize every bit of space, from rooftops to railroad tracks, to feed one of the world's fastest-growing populations. Although fewer people live in cities than in Asia's rural areas - approximately 43 percent - the UN projects an 89 percent increase in the region's urban population (1.6 billion people) by 2050. According to the UN Economic and Social Commission for Asia and the Pacific (ESCAP), Asia had 12 megacities of more than 10 million people each, half the world's population and the second-fastest rate of urbanization worldwide as of 2010. Brian Roberts, an Australia-based urban management specialist, has opined that feeding this expanding urban population will be a ‘challenge’ due to the widespread lack of land tenure and access to cash and markets - and the resulting lack of incentive to farm - as well as insufficient rural-to-urban food transport and storage.
According to Carla Lacerda, a programme officer with the World Food Programme (WFP) regional office for Asia, it is hard to target hunger in cities because urban issues are intricate. It is easier for humanitarian agencies to get into, but harder to come out because [the issues] are mostly about development and government responsibilities.
Additional challenges include the risk of luring rural dwellers away from depressed economies and degrading farms with urban food programmes; overlapping with agencies pursuing development goals; the increased difficulty of supporting livelihoods in cities rather than rural areas; and the challenge to measure impact due to scattered living arrangements.



Regional disaster response in Asia
 Arvind Kumar pandey
Recent media reports indicate that the ASEAN Coordinating Center for Humanitarian Assistance on disaster management (AHA Center) was formally endorsed and signed at the association's summit on 17 November in Bali (Indonesia), signalling a greater role for regional mechanisms. Oliver Lacey-Hall, regional head of the UN Office for the Coordination of Humanitarian Affairs (OCHA) in Bangkok said: "That's the goal. That's the way forward." When disaster strikes, national capacities are often not enough; with regional mechanisms such as the Association of Southeast Asian Nations (ASEAN) the South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC) and the Secretariat of the Pacific offering a second line of response. The UN and international community would form a third tier - ready to assist national and regional efforts.
Establishing order in times of crisis is one of the goals for the AHA Center, active some five years after the first regional workshop on its establishment in 2006. According to Lacey-Hall, Southeast Asian countries have not always had the capacity to respond in full, but the time when the international humanitarian system was dominated by a few countries and western aid agencies is over. "Many of these countries now see disaster management as a priority. There has been a change from the government saying, 'Give us what you've got' to 'This is what we need'. Asia is the most disaster-prone region in the world; in 2010, disasters affected more than 200 million people. In global terms, 89 percent of all people affected by emergencies live in Asia. But coordinating the increasing capacities of nations to respond to their own crises and those of others remains largely unchartered territory for regional groups.




Weather Disasters & Climate Change
Arvind Kumar pandey
According to a UN science report released on 18 November the link between climate change and extreme weather events, including punishing heat waves, droughts, and torrential rains and resulting floods is confirmed. The report warns that the U.S. will suffer heat waves, droughts, and more powerful hurricanes like Irene, with vulnerable people and places likely to suffer most from extreme weather, including low-lying island States facing sea level rise and stronger storm surges, and drought-prone countries in Africa. New York released its own climate study in mid-November, predicting that with expected sea level rise and stronger storms, future hurricanes could flood the tunnels into Manhattan within an hour and put one-third of the city underwater, with climate induced impacts beginning within a decade. The cost of US weather disasters in 2011 is already approaching $50 billion, according to the National Climate Data Center.
It is now certain that human emissions of greenhouse gases and warming aerosols like black carbon are increasing the frequency and intensity of extreme weather by putting more heat energy into the climate system. Durwood Zaelke, President of the Institute for Governance & Sustainable Development, has suggested: “These climate change impacts have become so clear and so close now that we need fast, aggressive mitigation if we hope to avoid the worst consequences. “Fast mitigation is the best adaptation, and it means cutting short-lived climate forcers, including black carbon, ground-level ozone, and hydrofluorocarbons, or HFCs, used in refrigeration. Cutting these non-CO2 climate forcers can be done quickly and inexpensively using existing technologies and in most cases existing laws and institutions.”
Cooking Stoves Linked to Pneumonia
 Arvind Kumar pandey
According to a recent study published in Lancet journal and reported by the media, in many developing nations around the world, cooking is primarily done over a wood-burning fire pit. It is estimated that this is the primary cooking and heating source for 43% of the global population, about 3 billion people. A team of international researchers have found that pneumonia is linked with young children who are continuously exposed to the smoke from cooking fires. They found that if smoke-reducing chimneys are used on the cooking stoves, cases of severe pneumonia can be reduced by one-third. Cooking fires are perhaps the type of air pollution that directly impacts human health, because its emissions take place right next to people’s breathing zones. The fires used in developing countries are almost always open flames with no real chimney. The researchers found that children, who are exposed every day to the smoke, inhaled the equivalent of smoking three to five cigarettes a day.
The study was conducted by researchers from the University of Liverpool, University of California, Berkeley, and from del Valle, Guatemala. The team spent time in the rural communities in the Western Highlands of Guatemala, working with households which had pregnant women or young infants. Some households were given a woodstove with a chimney and others continued using open fires. They found that cases of severe pneumonia were reduced one third for the households with the chimneys. A smaller decrease was reported for all cases of pneumonia, severe and non-severe. This is likely due to the reduction of smoke not being completely sufficient. According to Dr. Nigel Bruce from the University of Liverpool, "Increasing awareness of the effects of woodsmoke on health will help us to significantly reduce the numbers of cases of severe pneumonia, as well as respiratory disease in adults."
Global Fund in limbo
 Arvind Kumar pandey
Media reports show that international assistance to the Global Fund to fight HIV, TB and Malaria has more than halved the estimated amount of money available in its next round of funding, the disbursement of which has been delayed until 2013, due to the world economic crisis. The delay in Round 11 funding was announced at the Fund's latest board meeting on 26 September, the second such delay, which has pushed the application deadline back to at least 1 March 2012. According to Christoph Benn, director of the Fund's external relations and partnerships, the size of the pot has also shrunk - to US$800 million, less than half of the $1.5 billion projected for the round as of mid-2011.
According to Mario Raviglione, director of Stop TB, more than 70 percent of antiretroviral drugs in the developing world are funded by the Global Fund and in Africa; it finances about 85 percent of TB programming. Mario further cautioned that reductions in Global Fund money and international global health funding are likely to reverse recent gains in the fight against TB and increase mortality, he cautioned. Talking to the media recently Mario Raviglione said: "A postponement of rounds at the Global Fund and decline in international funding will have dramatic consequences in the attempt to respond to the multidrug resistant TB epidemic and that's where the funding gap is greatest." The international financial crisis has adversely impacted on the countries in Euro zone, Japan and the United States thereby culminating in reduction in assistance to the Global Fund. The recipient countries, particularly those in Africa, will have to raise local resources and avoid frauds.



Climate Change & Rivers
 Arvind Kumar pandey
According to a recent study, soaring temperatures and erratic rains brought on by a changing climate may radically alter water flows in the world’s major river basins, forcing people to give up farming in some areas. The study – part of a five-year research project on four continents, the first to take a close look at 10 river basins - is based on data from 17 climate models used by the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) to examine the potential effect of changing temperatures and rainfall patterns on the water flows in rivers from now until 2050. Mark Mulligan, a leading author of the study, has opined that climate models cannot predict how rainfall patterns will behave in future with a high degree of certainty: “What we do know is that we cannot be confident about hydrological stability. Some rivers could become wetter and then drier, or vice versa. The key message to countries is: ‘Become more adaptable’.”
The study expects that all African river basins will be water-stressed by increased rates of evapo-transpiration as temperatures rise, but is uncertain about how gains in rainfall may offset that impact. In Asia the seasonality of changes in rainfall and temperature - which affects how rivers behave in the wet or dry season - will be critical, especially in wet basins like the Mekong. Mulligan drew parallels with the uncertainty of the current financial crisis, pointing out that unprepared institutions and experts were responding in crisis mode. He said their findings on the impact of climate change on river basins indicate that the world faces an uncertain future regarding water, and the impact was unpredictable. A framework is needed to plan a strategy for the better management of water, and make countries and people more resilient.

Need for New Ways to Grow Food



Need for New Ways to Grow Food
Arvind Kumar pandey
According to a recent report released by the UN Food and Agriculture Organization (FAO), and reported by IRIN News agency, in coming four decades many parts of the world will have run out of water for farming and people will probably need to have enough money to buy food. The report that is said to be the first-ever authoritative analysis of the state of the world's land and water resources, looks at land and water from a food security perspective. Considering 75 percent of the population in developing countries is poor, lives in rural areas and depends on agriculture for income and food, the report states that it is now estimated that more than 40 percent of the world's rural population lives in river basins that are physically water scarce.
To feed a burgeoning global population, estimated to hit nine billion by 2050, we will have to produce another one billion tonnes of cereals and 200 million extra tonnes of livestock products every year. A growing population will also put a squeeze on the per capita amount of land available in developing countries, which is expected to halve (to 0.12 hectare) by 2050. Various trade-offs will be required to help countries feed themselves: intensification of agriculture rather than expansion, and irrigation systems rather than depending on rainfall. More than four-fifths of production gains will have to occur largely on existing agricultural land, but all will involve policy decisions that need to be grounded in an agricultural approach that is not only friendly to land and water resources, but also to the ecosystem at large.


Kisan Divas


Kisan Divas
Arvind KumarPandey
Plight of farmers in India has become very critical in recent decades. Small farmers are reeling under appalling debt and many of them commit suicide for being not able to repay the debt. 23 December is celebrated as Kisan Divas or Farmers’ Day to commemorate the memory of Chaudhary Charan Singh, whose life reflected his peasantry background and he understood problems of the farmer and did his best to help them.
The plight of farmers in India has been very miserable in present-day India and they have always been at the receiving end since Independence. Their hard toil fetches them nothing except fake assurances from the dispensations at the helm. It’s sad and unfortunate that people who are indispensable for the growth of nation have been left to their fate. This is quite evident from the suicide cases in Maharashtra, Andhra and other parts of the country including West Bengal. In state like UP middlemen and Mandi officials ensure that the farmers turn into object of grief. The need of the hour is implementation of schemes introduced by the government. This can take place effectively if the village panchayts are provided more power to execute them in smooth manner.
There is a need to equip farmers with latest technological accessories that augment the prospects of better output and thus make their contribution more prominent in the global economy. Better results could be attained if information centers having state-of-the -art facilities are set-up inside each village that shed light on issues related with farmers. Let’s not forget that they form the backbone of the nation and so it becomes imperative for us to be conscious of their needs. Both the Central and state governments should come out with plans, which prevent the farmers from being swayed by negative market forces.

बाज आओ

घर- बाहर, झाड़ू-पोंछाचूल्हा,चौका
कपडे, बर्तन, पति, रिश्ते, बच्चे,
कितने बंधनों में बांधा है तुम्हें
बड़ी बेहया हो फिर भी लिखती हो,
कितनी ही बार चलायी है अवरोधों की कैंची
तुम्हारी जबान पर
पर ये क्यों बदल लेती है नया रूप
तुम्हारा मौन तो तब भी सर्वमान्य था
पर क्यों बदली है ये कलम में
सुनो नहीं चाहिए कोई झाँसी की रानी उन्हें,
और नक्कारखाने में तूती सी बजकर 
क्या साबित करना चाहती हो,
याद करों उन हांथों को जो जिन्दा चुन देते हैं
तुम्हे दीवार में,
 या झोंक दी जाती हो किसी तंदूर में,
कितने जन्म लोगी और कितनी अग्निपरीक्षाएं 
और चाहिए तुम्हे,
हर बार खड़ी हो जाती हो,
झाड़ते हुए चिता की धूल और 
ख़ामोशी से जुट जाती हो संभालने, सजाने, बढ़ाने इस 
दुनिया को, और लिखने?
क्यों नहीं मार देती इस छटपटाहट को,
देखो कि सब्जी में नमक क्यों कम है,
या बच्चों के होमवर्क पर कितने स्टार मिले हैं,
पढ़ी लिखी हो तो करो बनिए और दूधवाले का हिसाब
या कमाओ कि घर न सही उन सभी चीज़ों के भुगतान की किश्तों में
तुम्हारा बराबर हिस्सा है
जो लगाती है गृहस्वामी के रुतबे में चार चाँद,
सुनो ये घर तुम्हारा है, सजाओ इसे करीने से,
बिछ जाओ रोज़ कालीन की तरह,
बनाओ रोज़ सुंदर बाल, लाली-पावडर क्या चाहिए तुम्हे,
देखो वो गुडिया कितनी सुंदर है, ओर उसका सर हिलता है केवल हाँ में,
छि ! फ़ेंक दो वो कलम और कागज़,
सुनो तुम्हारा छौंक लगाना भर देता है
सारे घर को एक मनभावन सुगंध में,
और तुममें रची मसालों की वो गंध ही तुम्हारी पहचान है
चाहिए तो खरीदो गहने-कपडे और भूल जाओ वो 
रास्ता जो जाता है किताबों की दुकान की ओर,
वर्ना दफन कर दी जाओगी अपने ही खोल में,
उस ओर जाते हर रास्ते में बिछा दिए जायेंगे,
कंकड़, कांच ओर नुकीली कीलें 
और झोंक दिए जायेंगे हर कदम पर सैकड़ों अंगारे,
अब तो बाज आओ और सिर्फ छौंक लगाओ ......................