सोमवार, 12 नवंबर 2012

आधुनिक भारत में वृद्धों की स्थिति


आधुनिक होते भारत की बदलती जीवन शैली एक बार तो आंखों में चमक भर देती है किंतु जब हकीकत से सामना होता है तो स्थिति काफी भयावह और संकटपूर्ण नजर आती है. परिवार और समाज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाले बड़े-बुजुर्ग आज उपेक्षित होने लगे हैं और साथ ही उनकी स्थिति काफी दयनीय और बेसहारा की हो चली है. हालांकि आज भी भारत के अंदरूनी भागों में वृद्धों के लिए सम्मान पूर्ववत बरकरार है किंतु विकास की दौड़ में आगे निकल चुके बड़े शहरों की हालत वृद्धों के सम्मान और महत्व के मामले में काफी खराब है.
इसे आप सांस्कृतिक अधःपतन कहें या महात्वाकांक्षा की अंधी दौड़, मेट्रो शहरों की अधिकांश आबादी अपने बड़े-बुजुर्गों के सम्मान के मामले में नाकारा साबित हो रही है. कई संपन्न परिवारों के बुजुर्ग तो वृद्धाश्रम में धकेले जा रहे हैं, जो घर में ही रहना चाहते हैं उनके साथ नौकरों से भी बुरा बर्ताव होता है और इसके बावजूद उनकी शारीरिक प्रताड़ना तो एक बेहद चिंतनीय तथ्य है. उदारीकृत भारत के विकासवान नवयुवक बुजुर्गों के साथ अपनी हिंसात्मक और उपेक्षात्मक व्यवहार के लिए जाने जाने लगेंगे क्या इसे कभी सोचा भी जा सकता था?
जिन्हें कभी परिवार की संपत्ति समझा जाता था आज वही बुजुर्ग अपने परिवार पर एक बोझ बनकर रह गए हैं. जिनके आदेशों पर कभी कोई सवाल तक नहीं किया जा सकता था, आज अगर वे आदेश ना मानें तो परिवार में उनका जीना तक दूभर हो जाता है. माता-पिता जिन्होंने अपनी संतान की खुशी और जरूरतों को पूरा करने के लिए ना जाने कितनी परेशानियों का सामना किया, आज वह अपना सर्वस्व लुटा देने के बाद अकेले और बेसहारा रह गए हैं. परिवार के भीतर उनकी स्थिति इस कदर शोषित कर दी जाती है कि जीवन यापन करने के लिए उनके पास दो ही विकल्प रह जाते हैं. पहला, या तो वे अपना सारा जीवन परिवार से अलग वृद्धाश्रम में ही व्यतीत करें. दूसरे, यदि वे अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें हर पल पराश्रित होने का अहसास कराया जाता है जिसे उन्हें सहना सीखना होता है.
परिवार के भीतर व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता की तलाश को प्रमुखता दी जाने लगी है, जिसके परिणामस्वरूप जिन बच्चों का पालन-पोषण अभिभावक बड़े लाड-प्यार से करते हैं, बड़े हो जाने के बाद बच्चों को उनके साथ रहना तक पसंद नहीं आता. परिवार में माता-पिता की उपस्थिति स्वतंत्रता की राह में बाधा बन जाती है. भौतिकवाद इस कदर लोगों की मानसिकता पर हावी हो गया है कि अब अपने का बोध समाप्त होता जा रहा है. आर्थिक तौर पर सक्षम होने और आत्म-निर्भर होने की चाह लोगों में प्रबल रूप से विद्यमान होने लगी है, जिसकी पूर्ति व्यक्ति माता-पिता से अलग अपनी स्वतंत्र दुनियां बसा कर करने लगा है. एक ऐसी दुनियां जिसमें बुजुर्गों की जरूरत ना रहे.
ऐसे हालात केवल उन्हीं बुजुर्गों के नहीं हैं जो पूर्णत: अपने बच्चों पर आश्रित हैं. ऐसे वृद्धों की भी कमी नहीं है जो अपने ही बच्चों की धोखाधड़ी का शिकार बने हैं. स्वार्थ और लालच का अंधा आधुनिक मानव अवैध रूप से अपने माता-पिता की संपत्ति हथिया कर उनसे किनारा करने और उन्हें अपने हाल पर छोड़ने से भी नहीं हिचकिचाता. ऐसे भी कई बुजुर्ग हैं जिनके बच्चे काम की तलाश में देश के बाहर गए और फिर वहीं बस गए. वे अभिभावकों के लिए मासिक खर्च भेजकर ही अपने कर्तव्य को पूरा कर लेते हैं. वे यह नहीं समझते कि पैसा केवल भौतिक आवश्यकताएं पूरा कर सकता है. पैसे से भावनाओं का मोल नहीं लगाया जा सकता. घर में अकेले तन्हा जीवन जीते हुए अभिभावक या तो अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं या फिर अपने बच्चों से उम्मीद रखना ही छोड़ आस-पास की दुनियां को अपना लेते हैं जो धीरे-धीरे उनके जीने का एक सहारा बन जाता है. लेकिन कभी-कभी यही दुनियां उनके लिए घातक सिद्ध भी होती है. क्योंकि अकेले बुजुर्ग व्यक्ति आसानी से अपराधियों की नजर में जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप चोरी और हत्याएं जैसी घटनाएं बढ़ने लगी हैं.
यह हालत केवल परिवार के भीतर तक ही सीमित नहीं है. हम अकसर अपने आस-पास बुजुर्ग लोगों के प्रति असहनीय और अमानवीय अपराध होता देखते हैं और कभी समय की कमी को तो कभी आपसी मामला होने का बहाना बना, ऐसे कृत्यों को अनदेखा कर देते हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि भौतिकवाद और बाजारीकरण से ग्रस्त हमारी भावनाएं एक निश्चित सीमा रेखा में बंध गई हैं, जिसके अंतर्गत हम केवल अपने तक ही सीमित रह गए हैं. जब तक कोई घटना या कृत्य सीधे-सीधे हमें प्रभावित नहीं करते हम उन्हें अहमियत ही नहीं देते. हमारे पड़ोस में ही बुजुर्ग दंपत्तियों के साथ गलत व्यवहार किया जाता है और हम इस पर अपनी कोई भी प्रतिक्रिया देने से बचते फिरते हैं. मेट्रो शहर में आधुनिकता की बयार ने मनुष्य को पारस्परिक सौहार्द जैसी भावनाओं से दूरी बनाना सिखा दिया है. परिवार की जरूरत और उसके मायने अपनी स्वार्थ-पूर्ति के आगे कोई महत्व नहीं रखते.
भले ही सरकार ने बुजुर्गों की जरूरतें पूरी करने और उन्हें आश्रय देने के लिए वृद्धाश्रम खोलने के साथ-साथ उन्हें कई अधिकार भी दिए हैं. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि संबंधों को अपनी आत्मा मानने वाले हमारे भारतीय समाज में ऐसे आश्रमों और कानूनों का क्या औचित्य है जो संबंधों के विघटन और दिनोंदिन घटते भावनात्मक क्षरण को साफ दर्शाते हों?
माता-पिता जब बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को कम नहीं होने देते, उनका पालन-पोषण प्यार और अपनेपन के साथ करते हैं तो बच्चे बड़े होने के बाद उन्हें नकारते क्यों हैं?
शहरों में बढ़ते अपराधों और नकारात्मक परिस्थितियों से बचाने के लिए ऐसा अकसर देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अति-सुरक्षात्मक रवैया अपनाते आए हैं. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसा व्यवहार केवल एक उम्र तक उचित रहता है. बच्चों के बड़े हो जाने पर माता-पिता के प्रति उनकी अपेक्षाएं परिवर्तित हो जाती हैं. अब वह उनमें दोस्त को तलाशने लगते हैं, जो उनकी भावनाओं को समझें और उन्हें महत्व दें. साथ ही उनके सही निर्णयों का सम्मान करना भी अपेक्षित हो जाता है.
इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वह एक रूढ़िवादी सोच और व्यवहार छोड़कर अपने बच्चों को समझने का प्रयास करें. साथ ही बच्चों को भी चाहिए कि वह अपने माता-पिता की भावनाओं को अपने जीवन में महत्व दें. जो माता-पिता उनके बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, उन्हें खुद से दूर रखने के लिए कोई कदम ना उठाएं.
संभवत: परिवार के भीतर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति और बच्चों के साथ मनमुटाव के लिए दो अलग पीढ़ियों की अलग सोच और परिस्थितियों के प्रति भिन्न दृष्टिकोण उत्तरदायी है. इस अंतर को दूर करने के बाद परिवार के बुजुर्गों और अन्य सदस्यों के बीच की खाई को समाप्त किया जा सकता है. साथ ही बच्चों को यह अहसास दिलाया जा सकता है कि जिन अभिभावाकों को वह व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए भूलते जा रहे हैं, उनके बिना कोई भी खुशी और परिवार की संरचना अधूरी ही रहेगी. इसलिए स्वार्थ भावना को त्याग कर कुछ समय के लिए अपने माता-पिता की खुशी में शामिल होकर उनके लिए अपनी भावनाओं का इजहार करने की ओर ध्यान दिया जाए तो जीवन का सही आनंद और औचित्य समझ में सकता है.
(अरविन्द कु पाण्डेय )

क्‍यों पूजे जाते हैं दीवाली पर माँ लक्ष्मी- श्री गणेश एकसाथ




दीवाली भारत का अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक पर्व है। इस दिन हम धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक और बुद्धि के देवता भगवान गणेश की पूजा करते हैं। य
ह हम सब भली भांती जानते हैं कि कोई भी शुभ कार्य गणेश पूजन के बगैर कभी पूरा नहीं होता। गणेश जी बुद्धि प्रदाता हैं। वे विघ्न विनाशक और विघ्नेश्वर हैं। यदि व्यक्ति के पास खूब धन-सम्पदा है और बुद्धि का अभाव है तो वह उसका सदुपयोग नहीं कर पायेगा। अतः व्यक्तिका बुद्धिमान और विवेक होना भी आवश्यक है।
तभी धन के महत्व को समझा जा सकता है। गणेश का विशाल उदर अधिक सम्पदा का प्रतीक है। और सूँढ कुशाग्र बुद्धि का प्रतीक है। साथ ही इनकी पूजा करने से संकटों का नाश भी होता है। गणेश लक्ष्मी की एक साथ पूजा व दोनों की कृपा के महत्त्व को कई कहानियों के माध्यम से बताया गया है। पौराणिक ग्रन्थों में एक कथामें प्रमाण मिलता है कि लक्ष्मी जी की पूजा गणेश जी के साथ क्यों होती है। आइये जाने कि ऐसा क्यों होता है।
एक बार एक वैरागी साधु को राजसुख भोगने की लालसा हुई उसने लक्ष्मी जी की आराधना की। उसकी आराधना से लक्ष्मी जी प्रसन्न हुईं तथा उसे साक्षात दर्शन देकर वरदान दिया कि उसे उच्च पद और सम्मान प्राप्त होगा। दूसरे दिन वह वैरागी साधु राज दरवार में पहुचा। वरदान मिलने से उसे अभिमान हो गया। उसने राजा को धक्का मारा जिससे राजा का मुकुट नीचे गिर गया। राजा व उसके दरबारीगण उसे मारने के लिए दौड़े। परन्तु इसी बीच राजा के गिरे हुए मुकुट से एक कालानाग निकल कर भागने लगा।
सभी चैंक गये और साधु को चमत्कारी समझकर उस की जय जयकार करने लगे। राजा ने प्रसन्न होकर साधु को मंत्रीबना दिया। क्योंकि उसी के कारण राजा की जान बची थी। साधु को रहने के लिए अलग से महल दिया गया वह शान से रहने लगा। राजा को एक दिन वह साधु भरे दरवार से हाथ खीचकर बाहर ले गया। यह देख दरबारी जन भी पीछे भागे। सभी के बाहर जाते ही भूकंप आया और भवन खण्डहर में तब्दील हो गया। उसी साधु ने सबकी जान बचाई। अतः साधु का मान-सम्मान बढ़ गया। जिससे उसमें अहंकार की भावनाविकसित हो गयी।
राजा के महल में एक गणेश जी की प्रतिमा थी। एक दिन साधु ने वह प्रतिमा यह कह कर वहाँ से हटवा दी कि यह प्रतिमा देखन में बिल्‍कुल अच्छी नहीं है। साधु के इस कार्य सेगणेश जी रुष्ठ हो गये। उसी दिन से उस मंत्री बने साधु कीबुद्धि बिगड़ गई वह उल्टा पुल्टा करने लगा। तभी राजा ने उस साधू से नाराज होकर उसेकारागार में डाल दिया। साधू जेल में पुनः लक्ष्मीजी की आराधना करने लगा। लक्ष्मी जीने दर्शन दे कर उससे कहा कि तुमने गणेश जी का अपमान किया है। अतः गणेश जी की आराधना करके उन्हें प्रसन्न करों।
लक्ष्मीजी का आदेश पाकर वह गणेश जी की आराधना करने लगा। इससे गणेश जी का क्रोध शान्त हो गया। गणेश जी ने राजा के स्वप्न में आ कर कहा कि साधु को पुनः मंत्री बनाया जाये। राजा ने गणेश जी के आदेश का पालन किया और साधु को मंत्री पद देकर सुशोभित किया। इस प्रकार लक्ष्मीजी और गणेश जीकी पूजा साथ-साथ होने लगी। बुद्धि के देवता गणेश जी की भी उपासना लक्ष्मीजी के साथ अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यदि लक्ष्मीजी आ भी जाये तो बुद्धि के उपयोग के बिना उन्हें रोक पाना मुश्किल है।
इस प्रकार दीपावली की रात्रिमें लक्ष्मीजी के साथ गणेशजीकी भी आराधना की जाती है।
(अरविन्द कु पाण्डेय)

शनिवार, 10 नवंबर 2012

दीपावली


दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधिसे बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं।माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दीवाली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

धार्मिक संदर्भ

दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया थातथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। और इसके अलावा १६१९ में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली। महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने ४० गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।


दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य :---
 दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। इस पर्व का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है, जिस कारण यह त्योहार किसी खास समूह का न होकर संपूर्ण राष्ट्र का हो गया है।


राक्षसों का वध करने के लिए माँ देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रूप में माँगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएँगे।

कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्दसिंहजी बादशाह जहाँगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे।

कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाई थीं।

500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए दीप जलाकर खुशियाँ मनाई गईं।

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों (नदी के किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था।

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत्‌ इसक दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं। दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्तर्ज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएँ।

पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।

महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।

मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।

शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

पर्वों का समूह दीपावली


रंगोली
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं। दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं । स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।

परंपरा

अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।








 दीपावली पूजन विधि
दीपावली पूजन विधि दीपावली पूजन सामग्री लक्ष्मीजी की आरती महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त
लक्ष्मी पूजा का स्थान ईशान कोण वास्तु सम्मत लक्ष्मी पूजन धनतेरस प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन
13.11.2012 दीपावली है
दीपावली पूजन विधि
कार्तिक मास की अमावस्या का दिन दीपावली के रूप में पूरे देश में बडी धूम-धाम से मनाया जाता हैं। इसे रोशनी का पर्व भी कहा जाता है।
कहा जाता है कि कार्तिक अमावस्या को भगवान रामचन्द्र जी चौदह वर्ष का बनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। अयोध्या वासियों ने श्री रामचन्द्र के लौटने की खुशी में दीप जलाकर खुशियाँ मनायी थीं, इसी याद में आज तक दीपावली पर दीपक जलाए जाते हैं और कहते हैं कि इसी दिन महाराजा विक्रमादित्य का राजतिलक भी हुआ था। आज के दिन व्यापारी अपने बही खाते बदलते है तथा लाभ हानि का ब्यौरा तैयार करते हैं।  दीपावली पर जुआ खेलने की भी प्रथा हैं। इसका प्रधान लक्ष्य वर्ष भर में भाग्य की परीक्षा करना है। लोग जुआ खेलकर यह पता लगाते हैं कि उनका पूरा साल कैसा रहेगा।
पूजन विधानः दीपावली पर माँ लक्ष्मी व गणेश के साथ सरस्वती मैया की भी पूजा की जाती है। भारत मे दीपावली परम्प   रम्पराओं का त्यौंहार है। पूरी परम्परा व श्रद्धा के साथ दीपावली का पूजन किया जाता है। इस दिन लक्ष्मी पूजन में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र की पूजा की जाती है। इसी तरह लक्ष्मी जी का पाना भी बाजार में मिलता है जिसकी परम्परागत पूजा की जानी अनिवार्य है। गणेश पूजन के बिना कोई भी पूजन अधूरा होता है इसलिए लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन भी किया जाता है। सरस्वती की पूजा का कारण यह है कि धन व सिद्धि के साथ ज्ञान भी पूजनीय है इसलिए ज्ञान की पूजा के लिए माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।
इस दिन धन व लक्ष्मी की पूजा के रूप में लोग लक्ष्मी पूजा में नोटों की गड्डी व चाँदी के सिक्के भी रखते हैं। इस दिन रंगोली सजाकर माँ लक्ष्मी को खुश किया जाता है। इस दिन धन के देवता कुबेर, इन्द्र देव तथा समस्त मनोरथों को पूरा करने वाले विष्णु भगवान की भी पूजा की जाती है। तथा रंगोली सफेद व लाल मिट्टी से बनाकर व रंग बिरंगे रंगों से सजाकर बनाई जाती है।
विधिः दीपावली के दिन दीपकों की पूजा का विशेष महत्व हैं। इसके लिए दो थालों में दीपक रखें। छः चौमुखे दीपक दोनो थालों में रखें। छब्बीस छोटे दीपक भी दोनो थालों में सजायें। इन सब दीपको को प्रज्जवलित करके जल, रोली, खील बताशे, चावल, गुड, अबीर, गुलाल, धूप, आदि से पूजन करें और टीका लगावें। व्यापारी लोग दुकान की गद्दी पर गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा रखकर पूजा करें। इसके बाद घर आकर पूजन करें। पहले पुरूष फिर स्त्रियाँ पूजन करें। स्त्रियाँ चावलों का बायना निकालकर कर उस रूपये रखकर अपनी सास के चरण स्पर्श करके उन्हें दे दें तथा आशीवार्द प्राप्त करें। पूजा करने के बाद दीपकों को घर में जगह-जगह पर रखें। एक चौमुखा, छः छोटे दीपक  गणेश लक्ष्मीजी के पास रख दें। चौमुखा दीपक का काजल सब बडे बुढे बच्चे अपनी आँखो में डालें।

दीपावली पूजन कैसे करें

प्रातः स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें-
मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-
सकलशुभफल प्राप्त्यर्थं
गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं
इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।

संध्या के समय पुनः स्नान करें।
लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का छायाचित्र भी लगाया जा सकता है।)
भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाएं।
लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बाँधें।
इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें।
फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें।
अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें।
इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं।
फिर जल, मौली, चावल, फल, गुढ़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें।
पूजा पहले पुरुष तथा बाद में स्त्रियां करें।
पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें।
एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-

नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया।
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥

इस मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-
ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः।
शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥

इस मंत्र से कुबेर का ध्यान करें-
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।
भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥

इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें।
तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को आशीष और उपहार दें।
लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है।
इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। समीप ही एक सौ एक रुपए, सवा सेर चावल, गुढ़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पाँच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें।
उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएँ।
दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आँखों में लगाएं।
फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें।
इस दिन घर में बिल्ली आए तो उसे भगाएँ नहीं।
बड़े-बुजुर्गों के चरणों की वंदना करें।
व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें।
रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल्ल, लोढ़ा तथा छाज (सूप) पर कंकू से तिलक  करें। (हालांकि आजकल घरों मे ये सभी चीजें मौजूद नहीं है लेकिन भारत के गाँवों में और छोटे कस्बों में आज भी इन सभी चीजों का विशेष महत्व है क्योंकि जीवन और भोजन का आधार ये ही हैं)
दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें 'लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ'।
लक्ष्मी पूजन के बाद अपने घर के तुलसी के गमले में, पौधों के गमलों में घर के आसपास मौजूद पेड़ के पास दीपक रखें और  अपने पड़ोसियों के घर भी दीपक रखकर आएं।

मंत्र-पुष्पांजलि :
( अपने हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रों को बोलें) :-
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्‌ ।
तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।
स मे कामान्‌ कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः, मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि ।
(हाथ में लिए फूल महालक्ष्मी पर चढ़ा दें।)
प्रदक्षिणा करें, साष्टांग प्रणाम करें, अब हाथ जोड़कर निम्न क्षमा प्रार्थना बोलें :-

क्षमा प्रार्थना :
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्‌ ॥
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वम्‌ मम देवदेव ।
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।
त्राहि माम्‌ परमेशानि सर्वपापहरा भव ॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥

पूजन समर्पण :
हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलें :-
'ॐ अनेन यथाशक्ति अर्चनेन श्री महालक्ष्मीः प्रसीदतुः'
(जल छोड़ दें, प्रणाम करें)

विसर्जन :
अब हाथ में अक्षत लें (गणेश एवं महालक्ष्मी की प्रतिमा को छोड़कर अन्य सभी) प्रतिष्ठित देवताओं को अक्षत छोड़ते हुए निम्न मंत्र से विसर्जन कर्म करें :-

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्‌ ।
इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनर्अपि पुनरागमनाय च ॥

ॐ आनंद ! ॐ आनंद !! ॐ आनंद !!!
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय...
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।
जोकोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय...
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय...
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय...
शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय...
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।
उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय...
(आरती करके शीतलीकरण हेतु जल छोड़ें एवं स्वयं आरती लें, पूजा में सम्मिलित सभी लोगों को आरती दें फिर हाथ धो लें।)
परमात्मा की पूजा में सबसे ज्यादा महत्व है भाव का, किसी भी शास्त्र या धार्मिक पुस्तक में पूजा के साथ धन-संपत्ति को नहीं जो़ड़ा गया है। इस श्लोक में पूजा के महत्व को दर्शाया गया है-
'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्यु पहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥'
पूज्य पांडुरंग शास्त्री अठवलेजी महाराज ने इस श्लोक की व्याख्या इस तरह से की है
'पत्र, पुष्प, फल या जल जो मुझे (ईश्वर को) भक्तिपूर्वक अर्पण करता है, उस शुद्ध चित्त वाले भक्त के अर्पण किए हुए पदार्थ को मैं ग्रहण करता हूँ।'
भावना से अर्पण की हुई अल्प वस्तु को भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं। पूजा में वस्तु का नहीं, भाव का महत्व है।
परंतु मानव जब इतनी भावावस्था में न रहकर विचारशील जागृत भूमिका पर होता है, तब भी उसे लगता है कि प्रभु पर केवल पत्र, पुष्प, फल या जल चढ़ाना सच्चा पूजन नहीं है। ये सभी तो सच्चे पूजन में क्या-क्या होना चाहिए, यह समझाने वाले प्रतीक हैं।
पत्र यानी पत्ता। भगवान भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं। भगवान शिवजी बिल्व पत्र से प्रसन्न होते हैं, गणपति दूर्वा को स्नेह से स्वीकारते हैं और तुलसी नारायण-प्रिया हैं! अल्प मूल्य की वस्तुएं भी हृदयपूर्वक भगवद् चरणों में अर्पण की जाए तो वे अमूल्य बन जाती हैं। पूजा हृदयपूर्वक होनी चाहिए, ऐसा सूचित करने के लिए ही तो नागवल्ली के हृदयाकार पत्ते का पूजा सामग्री में समावेश नहीं किया गया होगा न!
पत्र यानी वेद-ज्ञान, ऐसा अर्थ तो गीताकार ने खुद ही 'छन्दांसि यस्य पर्णानि' कहकर किया है। भगवान को कुछ दिया जाए वह ज्ञानपूर्वक, समझपूर्वक या वेदशास्त्र की आज्ञानुसार दिया जाए, ऐसा यहां अपेक्षित है। संक्षेप में पूजन के पीछे का अपेक्षित मंत्र ध्यान में रखकर पूजन करना चाहिए। मंत्रशून्य पूजा केवल एक बाह्य यांत्रिक क्रिया बनी रहती है, जिसकी नीरसता ऊब निर्माण करके मानव को थका देती है। इतना ही नहीं, आगे चलकर इस पूजाकांड के लिए मानवके मन में एक प्रकार की अरुचि भी निर्माण होती है।
(अरविन्द कु पाण्डेय)

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

मैसूर

महलों, बगीचों और मंदिरों का नगर, है, कर्नाटक संगीत व नृत्य काप्रमुख केंद्र

मैसूर कर्नाटक का एक प्रमुख शहर है। अपनी क्रेप सिल्क की साड़ियों, चंदन के तेल और चंदन की लकड़ी से बने सामान के लिए मशहूर यह स्थान वुडयार वंश के शासन काल में उनकी राजधानी हुआ करता था। वुडयार राजा कला और संस्कृति प्रेमी थे। अपने 150 वर्ष के शासन काल में उन्होंने इसे बहुत बढ़ावा दिया। उस दौरान मैसूर दक्षिण की सांस्कृतिक राजधानी बन गया। मैसूर महलों, बगीचों और मंदिरों का नगर है। आज भी इसकी खूबसूरती कायम है। कर्नाटक संगीत व नृत्य का यह प्रमुख केंद्र है। क्या देखें                                                            फोटो गैलरी देखें
मैसूर में ऐतिहासिक महत्व की जगहों के अलावा भी ऐसी बहुत सी जगहें हैं जहां आप जा सकते हैं। यह शहर सिर्फ बड़ों के ही नहीं बल्कि बच्चों के मनोरंजन का भी पूरा ध्यान रखता है।
 
मैसूर महल
यह महल मैसूर में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है। मिर्जा रोड पर स्थित यह महल भारत के सबसे बड़े महलों में से एक है। इसमें मैसूर राज्य के वुडेयार महाराज रहते थे। जब लकड़ी का महल जल गया था, तब इस महल का निर्माण कराया गया। 1912 में बने इस महल का नक्शा ब्रिटिश आर्किटैक्ट हेनरी इर्विन ने बनाया था। कल्याण मंडप की कांच से बनी छत, दीवारों पर लगी तस्वीरें और स्वर्णिम सिंहासन इस महल की खासियत है। बहुमूल्य रत्‍नों से सजे इस सिंहासन को दशहरे के दौरान जनता के देखने के लिए रखा जाता है। इस महल की देखरख अब पुरातत्व विभाग करता है।

समय: सुबह 10 बजे-शाम 5.30 बजे तक, उचित शुल्क, जूते-चप्पल अंदर ले जाना मना, कैमरा ले जाना मना। महल रविवार, राष्ट्रीय अवकाश के दिन शाम 7-8 बजे तक और दशहर के दौरान शाम 7 बजे-रात 9 बजे तक रोशनी से जगमगाता है।
जगनमोहन महल
इस महल का निर्माण महाराज कृष्णराज वोडेयार ने 1861 में करवाया था। यह मैसूर की सबसे पुरानी इमारतों में से एक है। यह तीन मंजिला इमारत सिटी बस स्टैंड से 10 मिनट कर दूरी पर है। 1915 में इस महल को श्री जयचमाराजेंद्र आर्ट गैलरी का रूप दे दिया गया जहां मैसूर और तंजौर शैली की पेंटिंग्स, मूर्तियां और दुर्लभ वाद्ययंत्र रखे गए हैं। इनमें त्रावणकोर के शासक और प्रसित्र चित्रकार राजा रवि वर्मा तथा रूसी चित्रकार स्वेतोस्लेव रोएरिच द्वारा बनाए गए चित्र भी शामिल हैं।
समय: सुबह 8.30-शाम 5.30 बजे तक, कैमरा ले जाना मना

चामुंडी पहाड़ी
मैसूर से 13 किमी. दक्षिण में स्थित चामुंडा पहाड़ी मैसूर का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। इस पहाड़ी की चोटी पर चामुंडेश्वरी मंदिर है जो देवी दुर्गा को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में किया गया था। यह मंदिर देवी दुर्गा की राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। मंदिर मुख्य गर्भगृह में स्थापित देवी की प्रतिमा शुद्ध सोने की बनी हुई है। यह मंदिर द्रविड़  वास्तुकला का एक अच्छा नमूना है। मंदिर की इमारत सात मंजिला है जिसकी कुल ऊंचाई 40 मी. है। मुख्य मंदिर के पीछे महाबलेश्वर को समर्पित एक छोटा सा मंदिर भी है जो 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। पहाड़ की चोटी से मैसूर का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है। मंदिर के पास ही महिषासुर की विशाल प्रतिमा रखी हुई है। पहाड़ी के रास्ते में काले ग्रेनाइट के पत्थर से बने नंदी बैल के भी दर्शन होते हैं।
पूजा का समय: सुबह 7.30-दोपहर 2 बजे तक, दोपहर 3.30-शाम 6 बजे तक, शाम 7.30-रात 9 बजे तक

सेंट फिलोमेना चर्च
1933 में बना यह चर्च भारत के सबसे बड़े चर्च में से एक है। मैसूर शहर से 3 किमी. दूर कैथ्रेडल रोड पर स्थित यह चर्च निओ-गोथिक शली में निर्मित है। भूमिगत कमरे में तीसरी शताब्दी के संत इन संत की प्रतिमा स्थापित है। इसकी 175 फीट ऊंची जुड़वा मीनारें मीलों दूर से दिखाई दे जाती हैं। यहां की दीवारों पर ईसा मसीह के जन्म से लेकर पुनर्जन्म तक उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं का दर्शाती हुई ग्लास पेंटिग्स लगी हुई हैं। वर्तमान में इस चर्च को सेंट जोसेफ चर्च के नाम से जाना जाता है। समय: सुबह 5-शाम 8 बजे तक

कृष्णराज सागर बांध या केआरएस बांध
1932 में बना यह बांध मैसूर से 12 किमी. उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसका डिजाइन श्री एम.विश्वेश्वरैया ने बनाया था और इसका निर्माण कृष्णराज वुडेयार चतुर्थ के शासन काल मे हुआ था। इस बांध की लंबाई 8600 फीट, ऊंचाई 130 फीट और क्षेत्रफल 130 वर्ग किमी. है। यह बांध आजादी से पहले की सिविल इंजीनियरिंग का नमूना है। यहां एक छोटा सा तालाब भी हैं जहां बोटिंग के जरिए बांध उत्तरी और दक्षिणी किनारों के बीच की दूरी तय की जाती है। बांध के उत्तरी कोने पर संगीतमय फव्वार हैं। बृंदावन गार्डन नाम के मनोहर बगीचे बांध के ठीक नीचे हैं।
समय: सुबह 7-रात 8 बजे तक

जीआरएस फैंटेसी पार्क
यह पार्क मैसूर का एकमात्र अम्यूजमेंट वॉटर पार्क है। 30 एकड़ में फैला यह पार्क सभी उम्र के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस पार्क के मुख्य आकर्षण पानी के खेल, रोमांचक सवारी और बच्चों के लिए तालाब हैं। जीआरएस पार्क मैसूर रलवे स्टेशन से 5 किमी. दूर है। पार्क के अंदर शाकाहारी खाने का एक रेस्टोरेंट भी है। बाहर से खाने-पीने का सामान लाना मना है।
समय: सोमवार से शुक्रवार सुबह 10.30-6 बजे तक, रविवार और सार्वजनिक अवकाश के दिन शाम 7.30 बजे तक, गर्मियों में शनिवार के दिन भी 7.30 बजे तक खुलता है।

संपर्क करें
जीआरएस फैंटेसी पार्क
बाहरी मैसूर रिंग रोड, मेटागल्ली, मैसूर- 570 016
दूरभाष: 0821-2582781/ 82/ 83/ 84
फैक्स: 0821-2410714, 2410027.

मैसूर चिड़ियाघर
यह चिड़ियाघर विश्व के सबसे पुराने चिड़ियाघरों में से एक है। इसका निर्माण 1892 में शाही संरक्षण में हुआ था। इस चिड़ियाघर में 40 से भी ज्यादा देशों से लाए गए जानवरों को रखा गया है। यहां के बगीचों को बहुत ही खूबसूरती से सजाया और संभाला गया है। शेर यहां के मुख्य आकर्षण हैं। इसके अलावा हाथी, सफेद मोर, दरियाई घोड़े, गैंडे और गोरिल्ला भी यहां देखे जा सकते हैं। चिड़ियाघर में करंजी झील भी है। यहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। इसके अतिरिक्त यहां एक जैविक उद्यान भी है जहां भारतीय और विदेशी पेड़ों की करीब 85 प्रजातियां रखी गई हैं।
समय: सुबह 8 बजे-शाम 5.30 बजे तक, मंगलवार को बंद

रेल संग्रहालय
यह संग्रहालय कृष्णराज सागर रोड पर स्थित सीएफटी रिसर्च इंस्टीट्यूट के सामने है। यहां मैसूर स्टेट रेलवे की उन चीजों को प्रदर्शित किया गया है जो 1881-1951 के बीच की हैं। 1979 में स्थापित इस संग्रहालय में एक विशेष क्षेत्र से जुड़ी हुई वस्तुओं का अच्छा संग्रह है। यहां प्रदर्शित वस्तुओं में भाप से चलने वाले इंजन, सिग्नल, और 1899 में बना सभी सुविधाओं वाला महारानी का सैलून शामिल है। यहां का मुख्य आकर्षण चामुंडी गैलरी है जहां रेलवे विभाग के विकास का दर्शाती तस्वीरों का रखा गया है। यह संग्रहालय बच्चों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उनके ज्ञान को भी बढ़ाता है।
समय: सुबह 10 बजे-दोपहर 1 बजे तक, दोपहर 3 बजे-रात 8 बजे तक

दशहरा
यूं तो दशहरा पूर देश में मनाया जाता है लेकिन मैसूर में इसका विशेष महत्व है। 10 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध का प्रतीक है। इसमें बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है। इस पूरे महीने मैसूर महल को रोशनी से सजाया जाता है। इस दौरान अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उत्सव के अंतिम दिन बैंड बाजे के साथ सजे हुए हाथी देवी की प्रतिमा को पारंपरिक विधि के अनुसार बन्नी मंटप तक पहुंचाते है। करीब 5 किमी. लंबी इस यात्रा के बाद रात को आतिशबाजी का कार्यक्रम होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जाती है।

मैसूर के आसपास दर्शनीय स्थल
नंजनगुड
(22 किमी.)
यह नगर कबीनी नदी के किनारे मैसूर के दक्षिण में राज्य राजमार्ग 17 पर है। यह स्थान नंजुंदेश्वर या श्रीकांतेश्वर मंदिर (दूरभाष: 0821-226245) के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण काशी कही जाने वाली इस जगह पर स्थापित लिंग के बार में माना जाता है कि इसकी स्थापना गौतम ऋषि ने की थी। यह मंदिर नंजुडा को समर्पित है। कहा जाता है कि हकीम नंजुडा ने हैदर अली के पसंदीदा हाथी को ठीक किया था। इससे खुश होकर हैदर अली ने उन्हें बेशकीमती हार पहनाया था। आज भी विशेष अवसर पर यह हार उन्हें पहनाया जाता है।
समय: सुबह 6.30-दोपहर 1 बजे तक, शाम 4-रात 8.30 बजे तक, रविवार, सोमवार और सरकारी छुट्टी के दिन सुबह 6.30-रात 8.30 बजे तक, अभिषेक का समय सुबह 7, 9, 11 बजे, दोपहर 12 बजे, शाम 5.30 और 7 बजे

श्रवणबेलगोला (84 किमी)
यहां का मुख्य आकर्षण गोमतेश्वर/ बाहुबली स्तंभ है। बाहुबली मोक्ष प्राप्त करने वाले प्रथम र्तीथकर थे। यहां जैन तपस्वी की 983 ई. में स्थापित 57 फुट लंबी प्रतिमा है। इसका निर्माण राजा रचमल्ला के एक सेनापति ने कराया था। यह प्रतिमा विंद्यागिरी नामक पहाड़ी से भी दिखाई देती है। श्रवणबेलगोला नामक कुंड पहाड़ी की तराई में स्थित है। बारह वर्ष में एक बार होने वाले महामस्ताभिषेक में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। यहां पहुंचने के रास्ते में छोटे जैन मंदिर भी देखे जा सकते हैं।

सोमनाथपुर (35 किमी.)
यह छोटा गांव मैसूर के पूर्व में कावेरी नदी के किनारे बसा है। यहां का मुख्य आकर्षण केशव मंदिर है जिसका निर्माण 1268 में होयसल सेनापति, सोमनाथ दंडनायक ने करवाया था। सितार के आकार के चबूतरे पर बने इस मंदिर को मूर्तियों से सजाया गया है। इस मंदिर में तीन गर्भगृह हैं। उत्तर में जनार्दन और दक्षिण में वेणुगोपाल की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य गर्भगृह में केशव की मूर्ति स्थापित थी किन्तु वह अब यहां नहीं है। समय: सुबह 9.30-शाम 5.30 बजे तक

कैसे पहुंचें
वायु मार्ग
: नजदीकी हवाई अड्डा बैंगलोर (139 किमी.) है। यहां से सभी प्रमुख शहरों के लिए उड़ानें आती-जाती हैं।
रेल मार्ग: बैंगलोर से मैसूर के बीच अनेक रेलें चलती हैं। शताब्दी एक्सप्रेस मैसूर को चेन्नई से जोड़ती है।
सड़क मार्ग: राज्य राजमार्ग मैसूर को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ते हैं। कर्नाटक सड़क परिवहन निगम और पड़ोसी राज्यों के परिवहन निगम तथा निजी परिवहन कंपनियों की बसें मैसूर से विभिन्न राज्यों के बीच चलती हैं।

खरीदारी
सय्याजी राव रोड पर बनी देवराज मार्केट में खूबसूरत शहरी पेंटिंग्स मिलती हैं। इस मार्केट में बहुत साफ-सफाई है। मैसूर की असली चंदन की लकड़ी के सामान लिए सय्याजी राव रोड पर बने कावेरी आर्ट एंपोरियम 0821-2521258 जा सकते हैं। यह एंपोरियम सरकार द्वारा संचालित है। सरकारी सिल्क फैक्टरी में जाकर आप मैसूर की सिल्क की साड़ियों को बनते हुए देख सकते हैं। सिल्क की साड़ियों को केआर सर्कल पर बने फैक्टरी शोरूम और थोक बाजार जा सकते हैं।

मैसूर- एक नजर में
राज्य
: कर्नाटक
दूरी: बैंगलोर से 139 किमी. उत्तर पश्चिम में
भाषा: कन्नड़, अंग्रजी, तमिल, हिन्दी
तापमान: गर्मी अधि. 34 न्यू 21, सर्दी अधि 30 न्यू 12
वर्षा: औसतन 80 सेंमी
कब जाएं: अक्टूबर से मार्च

पर्यटक कार्यालय
क्षेत्रीय पर्यटक कार्यालय
ओल्ड एग्जिबिशन बिल्डिंग, इर्विन रोड, मैसूर
दूरभाष: 0821-2422096

केएसटीडीसी परिवहन विभाग
यत्री निवास बिल्डिंग, जेएलबी रोड, मैसूर.
दूरभाष: 0821-2423652, 2425349

एसटीडी कोड: 0821

धोंडो केशव कर्वे


महर्षि कर्वे के नाम के साथ बड़े ही सम्मान और आदर के साथ याद किए जाने वाले डॉ. धोंडो केशव कर्वे (जन्म- 18 अप्रॅल, 1858 महाराष्ट्र - मृत्यु- 9 नवंबर 1962) को आधुनिक भारत का सबसे बड़ा समाज सुधारक और उद्धारक माना जाता है। अपना पूरा जीवन विभिन्न बाधाओं और संघर्षों में भी समाज सेवा करते हुए समाप्त कर देने वाले महर्षि कर्वे ने अपने कथन ('जहाँ चाह, वहाँ राह') को सर्वथा सत्य सिद्ध किया।

जन्म

महर्षि कर्वे का जन्म 18 अप्रॅल, 1858 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि ज़िले के 'मुरूड़' नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री केशव पंत था। यद्यपि महर्षि कर्वे के माता पिता बहुत ही स्वाभिमानी और उच्च विचारों वाले दंपत्ति थे, किंतु उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे अपने पुत्र को अच्छी शिक्षा और संस्कारों से युक्त बनाना चाहते थे, किंतु अपनी विपन्नता के कारण अधिक कुछ ना कर सके।

शिक्षा

किसी प्रकार महर्षि कर्वे की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही एक प्राइमरी स्कूल में हुई। तत्पश्चात कुछ समय तक उन्हें घर पर रह कर ही पढ़ना पड़ा। शिक्षा के लिए उन्हें बचपन में कितने संघर्षों से गुज़रना पड़ा, इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है कि मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़ कर गांव से मीलों दूर कोल्हापुर जाकर स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा देनी पड़ी। सन 1881 में ने उन्होंने मुम्बई के 'रॉबर्ट मनी स्कूल' से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में मुम्बई के 'एलफिंस्टन कॉलेज' से सन् 1884 में गणित विषय में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को देखते हुए आगे की पढ़ाई ना करते हुए, अपनी योग्यता के आधार पर 'मराठा स्कूल' में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया।

आरंभिक जीवन

महर्षि कर्वे का प्रारम्भिक जीवन कैसे कष्टों में बीता इसका शब्दों में वर्णन कठिन है। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तभी उनका विवाह भी कर दिया गया था। एक ओर कम उम्र में विवाह और दूसरी ओर शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष। इतना सब होने पर भी महर्षि कर्वे में छोटी आयु से ही समाज सुधार के प्रति रुचि दिखायी देने लगी थी। उनके गांव के ही कुछ विद्वान और समाज के प्रति जागरुक कुछ लोगों जैसे राव साहब मांडलिक और सोमन गुरुजी ने उनके मन में समाज सेवा के प्रति भावना और उच्च चारित्रिक गुणों को उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके वही गुण दिन प्रतिदिन निखरते चले गये। अत्यंत विपन्नता में जीवन व्यतीत करते हुए जब वे किसी अति निर्धन मनुष्य को देखते जो भी उस समय उनके पास होता उसे दे देते थे। सन् 1891 में जब वे देशभक्त और समाज सेवी गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों के पद चिह्नों पर चलते हुए समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ सार्थक करने की योजना बना रहे थे, उन्हीं दिनों उनकी पत्नी 'राधाबाई' का निधन हो गया। यद्यपि वे अपनी पत्नी के अधिक सम्पर्क में नहीं रहे थे, तथापि यह उनके लिए बड़ा आघात था। सन् 1891 के अंतिम माह में वे राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा संचालित पूना के 'फर्ग्युसन कॉलेज' में गणित के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए। अपनी मेहनत और प्रतिभा से वह 'डेक्कन शिक्षा समिति' के आजीवन सदस्य बने।

कार्यक्षेत्र

फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापन करते समय उन्होंने समाज सुधार के क्षेत्र में पदार्पण किया। सन् 1893 में उन्होंने अपने मित्र की विधवा बहिन 'गोपूबाई' से विवाह किया। विवाह के बाद गोपूबाई का नया नाम 'आनंदीबाई' पड़ा। उनके इस कार्य के परिणाम स्वरूप पूरे महाराष्ट्र में विशेषकर उनकी जाति बिरादरी में बड़ा रोष और विरोध उत्पन्न हो गया। इसी विरोध ने महर्षि कर्वे को समाज द्वारा उपेक्षित विधवाओं के उद्धार और पुनर्वास के लिए प्रेरित किया। वह इन दिनों महात्मा गाँधी द्वारा चलाई गयी नई शिक्षा नीति और महाराष्ट्र समाज सुधार समिति के कार्यों में भी व्यस्त थे। जब देश के जाने माने समाज सेवियों और विद्वानों को महर्षि कर्वे द्वारा विधवाओं के उद्धार के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का पता चला तो उन्होंने मुक्त कंठ से उनके कार्यों की प्रशंसा की और सभी संभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया। अब महर्षि कर्वे सहयोग और समर्थन प्राप्त होते ही उत्साह के साथ आम जनता को अपने विचारों से सहमत करने और इस उद्देश्य के लिए धन एकत्र करने के काम में लग गये। उन्होंने कुछ स्थानों पर अपने तत्वाधान में विधवाओं के पुनर्विवाह भी सम्पन्न कराये। धीरे धीरे महर्षि कर्वे के इस विधवा उद्धार के कार्यों को प्रशंसा, मान्यता और धन जन सभी मिलने लगे। सन् 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले नामक स्थान पर दान में मिली एक भूमि पर एक कुटिया में एक विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना कर दी। धीरे धीरे समाज के धनी और दयालु लोग महर्षि कर्वे के कार्यों से प्रभावित होकर तन मन धन तीनों प्रकार से सहयोग देने लगे। सन् 1907 में महर्षि कर्वे ने महिलाओं के लिए 'महिला विद्यालय' की स्थापना की। जब उन्होंने विधवा और अनाथ महिलाओं के इस विद्यालय को सफल होते देखा तो उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाते हुए 'महिला विश्वविद्यालय' की योजना पर भी विचार करना प्रारम्भ कर दिया। अंतत: महर्षि कर्वे के अथक प्रयासों और महाराष्ट्र के कुछ दानवीर धनियों द्वारा दान में दी गयी विपुल धनराशि के सहयोग से सन् 1916 में 'महिला विश्वविद्यालय' की नींव रखी गयी। महर्षि कर्वे के मार्ग दर्शन में यह विश्वविद्यालय विध्वाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने का अनूठा संस्थान बन गया। जैसे जैसे इस विश्वविद्यालय का विस्तार होता गया, वैसे वैसे इसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महर्षि कर्वे के प्रयास भी बढ़ने लगे।

विदेश यात्रा

सन 1931- 32 में महिला विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलपति के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, अफ्रीका सहित लगभग 35- 40 देशों की यात्राएं की। इस यात्रा काल में जहाँ उन्होंने विदेशों में महिला विश्वविद्यालयों की कार्य प्राणाली का अध्ययन किया, वहीं वह विश्व के प्रसिद्ध विद्वानों से भी मिले। अपनी इस यात्रा में उन्हें अपने कार्यों के लिए धन की भी प्राप्ति हुई।

योगदान

महर्षि कर्वे का कार्य केवल महिला विश्वविद्यालय या महिलाओं के पुनरोत्थान तक ही सीमित नहीं रहा, वरन उन्होंने 'इंडियन सोशल कॉंफ्रेंस' के अध्यक्ष के रूप में समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। एक महान सुधारक होने के साथ साथ वह एक अच्छे शिक्षा शास्त्री भी थे। बचपन में ग़रीबी की हालत में शिक्षा ना मिलने का कष्ट क्या होता है, वह भली भाँति जानते थे। गांवों में शिक्षा को सहज सुलभ बनाने और उसके प्रसार के लिए उन्होंने चंदा एकत्र कर लगभग 50 से भी अधिक प्राइमरी विद्यालयों की स्थापना की थी।

सम्मान

डॉ. धोंडो केशव कर्वे के सम्मान में जारी डाक टिकट
सन 1942 में उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की रजत जयंती मनायी गयी। सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महान विद्वान और शिक्षाविद ने इस समारोह की अध्यक्षता की। इसी वर्ष महर्षि कर्वे को बनारस विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। सन् 1951 में उनके विश्वविद्यालय को 'राष्ट्रीय विश्वविद्यालय' का दर्ज़ा प्राप्त हुआ। इसी वर्ष पूना विश्वविद्यालय ने महर्षि कर्वे को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। महर्षि कर्वे के महान समाज सुधार के कार्यों के सम्मान स्वरूप सन् 1955 में भारत सरकार द्वारा उन्हें 'पद्म भूषण' से विभूषित किया गया। इसी वर्ष 'श्रीमती नत्थीबाई भारतीय महिला विश्वविद्यालय' द्वारा उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गयी।

भारत रत्न

सन 1958 में जब महर्षि कर्वे ने अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे किए, देश भर में उनकी जन्म शताब्दी मनायी गयी। इस अवसर को अविस्मरणीय बनाते हुए भारत सरकार द्वारा इसी वर्ष उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान और स्मृति में एक डाक टिकट भी ज़ारी किया गया।

निधन

उन्होंने 105 वर्ष के दीर्घ आयु प्राप्त की और अंत तक वह किसी न किसी रूप में मानव सेवा के कार्यों में लगे रहे। 9 नवंबर सन् 1962 को इस महान आत्मा ने इस लोक से विदा ली।

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

भारत (INDIA)

भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सम्‍यताओं में से एक है जिसमें निहित बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। आज़ादी पाने के बाद पिछले 59 वर्षों में भारत ने बहु-आयामी सामाजिक आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि–उत्‍पादन में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब विश्‍व के औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में इसका स्‍थान दसवां है तथा लोगों के लाभ के लिए प्रकृति पर विजय पाने के लिए अंतरिक्ष में जाने वाला छठा राष्‍ट्र है। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है जो हिम-आच्‍छादित हिमालय की ऊंचाइयों से शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा वनों तक फैला हुआ है। विश्‍व में सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत शेष एशिया से अलग दिखता है जिसका विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्‍तर में बृहत पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा हुआ, यह दक्षिण तक फैला है और कर्क रेखा से आगे संकरा होता हुआ पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर के बीच हिन्‍द महासागर से जुड़ जाता है।
पूरी तरह उत्‍तरी गोलार्ध में स्थित, भारत की मुख्‍यभूमि 804 और 3706 उत्‍तरी अक्षांश, 6807 और 97025 पूर्वी देशान्‍तर रेखाओं के बीच स्थित है तथा अंतिम अक्षांश रेखाओं के बीच उत्‍तर से दक्षिण तक लगभग 3214 कि.मी. और अंतिम देशांतर रेखाओं के बीच पूर्व से पश्चिम तग लगभग 2933 कि.मी. फैला हुआ है। इस ज़मीनी सीमान्‍त लगभग 15,200 कि.मी. है। मुख्‍यभूमि, लक्षद्वीप और अण्‍डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह की तटरेखा की कुल लम्‍बाई 7,516.6 कि.मी है।
भारत की प्राचीन भूमि भव्‍य सांस्‍कृतिक विरासत और आध्‍यात्मिक का परिदृश्‍य प्रस्‍तुत करती है। हम आपको आमंत्रण देते हैं कि आयें और इस देश के मनमोहक दृश्‍यों में डूबकर स्‍वयं को भूल जाएं,जिसमें अनेक राष्‍ट्रीय विशेषताएं प्रदर्शित की गई हैं,जैसे कि यहां की कला,राष्‍ट्रीय पहचान के तत्‍व,सांस्‍कृतिक भण्‍डार और अनेक बातें। उन सभी के लिए यह एक मनोरंजन पल होता है जो इस आध्‍यात्मिक देश के बारे में सब कुछ जानना चाहते हैं।
भारत असंख्‍य अनुभवों और मोहक स्‍थलों का देश है। चाहे भव्‍य स्‍मारक हों,प्राचीन मंदिर या मकबरे हों। अनेक धर्मों तथा संस्‍कृतियों के सह-अस्तित्‍व के साथ-साथ अचंभित कर देने वाले स्‍थलों के चलते यह देश आपके अवकाश के अनुभव के लिहाज से आदर्श गन्‍तव्‍य है। भारत में पर्यटन की उपयुक्‍त क्षमता है और सभी प्रकार के पर्यटकों के लिए यह देश उपयुक्त है चाहे वे साहसिंक यात्रा पर हों या फिर सांस्‍कृतिक अन्‍वेषण,तीर्थयात्रा,खूबसूरत समुद्री-तटों तथा मनमोहक पर्वतीय स्‍थलों की यात्रा पर निकले हों,आकृष्‍ट करने के लिए सही आकर्षण हैं। भारत पर्यटन के क्षेत्र में भले ही पिछे हों पर यहां के मनमोहक नजारे आज भी पर्यटको को अपनी ओर खींचते हैं। कश्मीर की हसीन वादियां आज भी लोगो के मन में अपनी छवि छोड़ देती हैं। भारत में पर्यटन के लिए और भी बहुत से मोहक स्‍थल हैं जो इसकी खुबसूरती में चार चांद लगाते हैं। भारत अपने पर्यटन स्थलो के कारण ही भारत भ्रमण पर आने वाले विदेशी पर्यटको के बीच लोकप्रिय है। हमारा आप से भी अनुरोध है कि जब भारत आएं तो भारत की बर्फली जगहों का आनंद जजरुर लें।

जीवन शैली, मूल्‍य और मान्‍यताएं

भारत एक विविध संस्‍कृति वाला देश है, एक तथ्‍य कि यहां यह बात इसके लोगों, संस्‍कृति और मौसम में भी प्रमुखता से दिखाई देती है। हिमालय की अनश्‍वर बर्फ से लेकर दक्षिण के दूर दराज में खेतों तक, पश्चिम के रेगिस्‍तान से पूर्व के नम डेल्‍टा तक, सूखी गर्मी से लेकर पहाडियों की तराई के मध्‍य पठार की ठण्‍डक तक, भारतीय जीवनशैलियां इसके भूगोल की भव्‍यता स्‍पष्‍ट रूप से दर्शाती हैं।
एक भारतीय के परिधान, भोजन और आदतें उसके उद्भव के स्‍थान के अनुसार अलग अलग होते हैं।

संस्‍कृति

भारतीय संस्‍कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग अलग तरह के कपड़े पहनते हैं, भिन्‍न भिन्‍न धर्मों का पालन करते हैं, अलग अलग भोजन करते हैं किन्‍तु उनका स्‍वभाव एक जैसा होता है। तो चाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं, एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्‍यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ासे एक अवसर पर खुशियां मनाने में शामिल होता है, इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन है, जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है। चाहे उनकी संस्‍कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विज्ञान

भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्‍ट्र की है। सच ही है, भारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं को हाल के वर्षों में पार किया है, जैसे कि वाणिज्‍य, प्रौद्योगिकी और विकास आदि, और इसके साथ ही उसने अपनी अन्‍य रचनात्‍मक बौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है। आपको आश्‍चर्य है कि यह क्‍या है तो यह वैकल्पिक विज्ञान है, जिसका निरंतर अभ्‍यास भारत में अनंतकाल से किया जाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्‍ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्‍लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमी संकल्‍पना जब अपने चरम पर पहुंच गई है, ऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।
आज के समय में व्‍यक्ति के जीवन की बढ़ती जटिलताओं के साथ लोग निरंतर ऐसे माध्‍यम की खोज कर रहे हैं, जिसके जरिए वे मन की कुछ शांति पा सकें। यहां एक और विज्ञान है, जिसे हम ध्‍यान के नाम से जानते हैं तथा इसके साथ जुड़ी है आध्‍यात्मिकता। ध्‍यान और योग भारत तथा भारतीय आध्‍यात्मिकता के समानार्थी हैं। ध्‍यान लगाना योग का सबसे महत्‍वपूर्ण घटक है, जो व्‍यायामों की एक श्रृंखला सहित मन और शरीर का उपचार है। ध्‍यान शब्‍द में अनेक अभ्यास शामिल हैं जो परिस्थितियों को साकार रूप में देखने, एक वस्‍तु या छवियों पर ध्‍यान केन्द्रित करने, एक जटिल विचार के माध्‍यम से सोचने अथवा एक उत्तेजक पुस्‍तक में हो जाने को भी शामिल करती हैं, ये सभी मोटे तौर पर ध्‍यान के प्रकार हैं। जबकि योग में ध्‍यान का अर्थ सामान्‍य रूप से मन को अधिक औपचारिक रूप से केन्द्रित करने और स्‍वयं को एक क्षण में देखने से संदर्भित किया जाता है। भारत और विदेश के कई लोग तनाव से छुटकारा पाने और मन को ताजा बनाने के लिए योग तथा ध्‍यान का आश्रय लेते हैं।
भारत में एक अन्‍य व्‍यापक रूप से प्रचलित विचाराधारा है कर्म की विचाराधारा, जिसके अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति को केवल सही कार्य करना चाहिए या एक व्‍यक्ति के रूप में इसके जीवन के पूर्ण वृत्त में वे ही तथ्‍य उसके सामने आते हैं।
पिछले दिनों भारत का एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण पक्ष नए युग की महिला का प्रादुर्भाव है। भारत में महिलाएं मुख्‍य रूप से गृहिणियां हैं, जबकि अब यह परिदृश्‍य बदल रहा है। अनेक स्‍थानों पर, विशेष रूप से महानगरों और अन्‍य शहरों में महिलाएं घर के लिए रोजीरोटी कमाते हैं और वे अपने पुरुष साथियों के बराबर कार्य करती हैं। जीवन की लागत / अर्थव्‍यवस्‍थ में हुई वृद्धि से इस पक्ष के उठने में योगदान मिला है।
भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलता, लेने और देने की भावना तथा उन संस्‍कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल है, जबकि उनका अपना अस्तित्‍व बना हुआ है और वे भारत रूपी उद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।



भारत के बारे में भौगोलिक जानकारी
ब्यौरे विवरण
स्‍थान हिमालय द्वारा भारतीय पेनिसुला का मुख्‍य भूमि एशिया से अलग किया गया है। देश पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिन्‍द महासागर से घिरा हुआ है।
भौगोलिक समन्‍वय यह पूर्ण रूप से उत्तरी गोलार्ध मे स्थित है, देश का विस्‍तार 8° 4' और 37° 6' l अक्षांश पर इक्‍वेटर के उत्तर में, और 68°7' और 97°25' देशान्‍तर पर है।
स्‍थायी मान समय जी एम टी + 05:30
क्षेत्र 3.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर
देश का टेलीफोन कोड +91
सीमाओं में स्थित देश उत्तर पश्चिम में अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान, भूटान और नेपाल उत्तर में; म्‍यांमार पूरब में, और पश्चिम बंगाल के पूरब में बंगलादेश। श्रीलंका भारत से समुद्र के संकीर्ण नहर द्वारा अलग किया जाता है जो पाल्‍क स्‍ट्रेट और मनार की खाड़ी द्वारा निर्मित है।
समुद्रतट 7,516.6 किलोमीटर जिसमें मुख्‍य भूमि, लक्षद्वीप, और अण्‍डमान और निकोबार द्वीपसमूह शामिल हैं।
जलवायु भारत की जलवायु को मोटे तौर पर उष्‍णकटिबंधीय मानसून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। परन्‍तु भारत का अधिकांश उत्तरी भाग उष्‍णकटिबंधीय क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद समग्र देश में उष्‍णकटिबंधीय जलवायु है जिसमें अपेक्षाकृत उच्‍च तापमान और सूखी सर्दी पड़ती है। चार मौसम है:
  1. सर्दी (दिसम्‍बर-फरवरी)
  2. गर्मी (मार्च-जून)
  3. दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम (जून-सितम्‍बर)
  4. मानसून पश्‍च मौसम (अक्‍तूबर-नवम्‍बर)
भूभाग मुख्‍य भूमि में चार क्षेत्र हैं नामत: ग्रेट माउन्‍टेन जोन, गंगा और सिंधु का मैदान, रेगिस्‍तान क्षेत्र और दक्षिणी पेनिंसुला।
प्राकृतिक संसाधन कोयला, लौह अयस्‍क, मैगनीज अयस्‍क, माइका, बॉक्‍साइट, पेट्रोलियम, टाइटानियम अयस्‍क, क्रोमाइट, प्राकृतिक गैस, मैगनेसाइट, चूना पत्‍थर, अराबल लेण्‍ड, डोलोमाइट, माऊलिन, जिप्‍सम, अपादाइट, फोसफोराइट, स्‍टीटाइल, फ्लोराइट आदि।
प्राकृतिक आपदा मानसूनी बाढ़, फ्लेश बाढ़, भूकम्‍प, सूखा, जमीन खिसकना।
पर्यावरण - वर्तमान मुद्दे वायु प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण, ठोस अपशिष्‍ट प्रबंधन, तेल और गैस संरक्षण, वन संरक्षण, आदि।
पर्यावरण-अंतर्राष्‍ट्रीय करार पर्यावरण और विकास पर रीयो की घोषणा, जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्‍त राज्‍य ढांचागत कार्य सम्‍मेलन के लिए क्‍योटो प्रोटोकॉल, विश्‍व व्‍यापार करार, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड के सल्‍फर उत्‍पसर्जन को कम करने सर उनके ट्रांस बाउन्‍ड्री फ्लेक्‍सेस (नोन प्रोटोकॉल) पर एल आर टी ए पी हेन्सिंकी प्रोटोकॉल, वोलाटाइल ऑरगनिक समिश्रण या उनके ट्रांस बाऊन्‍ड्री फलाक्‍सेस (वी वो सी प्रोटोकॉल) के उत्‍सर्जन से संबंधित एल आर टी ए पी के लिए जेनेवा प्रोटोकॉल।
भूगोल-टिप्‍पणी भारत दक्षिण एशिया उप महाद्वीप के बड़े भूभाग पर फैला हुआ है।

व्‍यक्ति

भारतीय नागरिकों के बारे में सूचना
ब्यौरे विवरण
(आबादी) जनसंख्‍या 1 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार भारत की जनसंख्‍या 1,028 मिलियन (531.1 मि लियन पुरुष और 496.4 मिलियन महिला) की।
जनसंख्‍या वृद्धि दर औसत वार्षिक घातांकी वृद्धि दर वर्ष 1991-2001 के दौरान 1.93 प्रतिशत है।
जन्‍म दर वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित मृत्‍यु दर 24.8 है।
मृत्‍यु दर वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित जन्‍म दर 8.9 है।
संम्‍भावित जीवन दर 63.9 वर्ष (पुरुष) 66.9 वर्ष (महिला) (सितम्‍बर 2005 की स्थिति के अनुसार)
लिंग अनुपात 2001 की जनगणना के अनुसार 933
राष्‍ट्रीयता भारतीय
जातीय अनुपात सभी पांच मुख्‍य प्रकार की जातियां, ऑस्‍ट्रेलियाड, मोंगोलॉयड, यूरोपॉयड, कोकोसिन और नीग्रोइड को भारत की जनता के बीच प्रतिनिधित्‍व मिलती है।
धर्म वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 1.028 मिलियन देश की कुल जनसंख्‍या में से 80.5 प्रतिशत के साथ हिन्‍दुओं की अधिकांशता है दूसरे स्‍थान पर 13.4 प्रतिशत की जनसंख्‍या वाले मुस्लिम इसके बाद ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्‍य आते हैं।
भाषाएं भारत के संविधान द्वारा 22 राष्‍ट्रीय भाषाओं को मान्‍यता दी गई है, जिनमें हिन्‍दी संघ की राजभाषा है। इनके अतिरिक्‍त 844 अलग अलग बोलियां है जो देश के विभिन्‍न भागों में प्रचलित हैं।
साक्षरता 2001 की जनसंख्‍या के अनंतिम परिणाम के अनुसार देश मे साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 75.26 प्रतिशत पुरुषों के लिए और महिलाओं के लिए 53.67 है।

सरकार

भारत सरकार के बारे में सूचना
ब्यौरे विवरण
देश का नाम रिपब्लिक ऑफ इंडिया; भारत गणराज्‍य
सरकार का प्रकार संसदीय सरकार पद्धति के साथ सामाजिक प्रजातांत्रिक गणराज्‍य।
राजधानी नई दिल्‍ली
प्रशासनिक प्रभाग 28 राज्‍य और 7 संघ राज्‍य क्षेत्र
आजादी 15 अगस्‍त 1947 (ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन से)
संविधान भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।
कानून प्रणाली भारत का संविधान देश की न्‍याय प्रणाली का स्रोत है।
कार्यपालिका शाखा भारत का राष्‍ट्रपति देश का प्रधान होता है, जबकि प्रधानंत्री सरकार प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद् की सहायता से शासन चलाता है जो मंत्रिमंडल मंत्रालय का गठन करते हैं।
विद्यायिका शाखा भारतीय वि‍द्यायिका में लोक सभा (हाउस ऑफ दि पीपल) और राज्‍य सभी (राज्‍य परिषद्) संसद के दोनों सदनों का गठन करते हैं।
न्‍यायपालिका शाखा भारत का सर्वोच्‍च न्‍यायालय भारतीय कानून व्‍यवस्‍था का शीर्ष निकाय है इसके बाद अन्‍य उच्‍च न्‍यायालय और अधीनस्थ न्‍यायालय आते हैं।
झण्‍डे का वर्णन राष्‍ट्रीय झण्‍डा आयताकार तिरंगा है जिसमें केसरिया ऊपर है, बीच में सफेद, और बराबर भाग में नीचे गहरा हरा है। सफेद पट्टी के केन्‍द्र में गहरा नीला चक्र है जो सारनाथ में अशोक चक्र को दर्शाता है।
राष्‍ट्रीय दिवस 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस)
15 अगस्‍त (स्‍वतंत्रता दिवस)
2 अक्‍तूबर (गांधी जयंती, महात्‍मा गांधी का जन्‍म दिवस)

अर्थव्‍यवस्‍था

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सूचना
ब्यौरे विवरण
अर्थव्‍यवस्‍था सिंहावलोकन स्‍वतंत्रता की प्राप्ति के बाद आधी शताब्‍दी में भारत ने सभी बाधाओं को पार करते हुए आर्थिक स्थिरता का स्‍पष्‍ट स्‍तर, विभिन्‍न क्षेत्रों का शिष्‍टाचार, अदम्‍य सहयोग जैसाकि कृषि, पर्याटन, वाणिज्‍य, विद्युत, संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि। जिन्‍होंने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के सतंभ के रूप में कार्य किया है। आज भारत विश्‍व की छह सबसे तेजी से विकसित अर्थव्‍यवस्‍था में से एक हैं। वर्ष 2001 में शाक्ति समकक्षता खरीदने (पीपीपी) की तर्ज पर भारत का चौथा स्थान है। व्‍यवसाय और विनियामक वातावरण विकसित हो राह है और स्‍थायी सुधार की ओर आगे बढ़ रहा है।
सकल घरेलू उत्‍पाद वर्ष 2005-06 की द्वितीय तिमाही में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
सकल घरेलू उत्‍पाद खरीद शक्ति समकक्षता भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है, खरीद शक्ति समकक्षता की तर्ज पर इसका जीडीपी 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। यह यूएसए, चीन और जापान के बाद आता है।
जीडीपी प्रति व्‍यक्ति सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार देश का प्रतिव्‍यक्ति सकल घरेलू उत्‍पाद 543 अमेरिकी डॉलर था।
जीडीपी क्षेत्रकों द्वारा निर्माण सेवाएं 56 प्रतिशत कृषि 22 प्रतिशत और उद्योग 22 प्रतिशत (सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार
श्रमिक बल इंडिया विजन : 2020 पर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत का श्रमिक बल 2002 में 375 मिलियन से अधिक पहुंच गई है।
बेरोजगारी की दर 9.1% (सितम्‍बर 2005 के अनुसार)
गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्‍या 1999-2000 को 26.10%
मुद्रास्‍फीति की दर जुलाई 2005 को 4.1%
सार्वजनिक ऋण 31st मार्च 2002 को कुल ऋण 72117.58 करोड़ रू है
विनियम दर विनिमय दरों के लिए प्रति दिन भारतीय रिजर्व बैंक  की वेबसाइट देखें
कृषि उत्‍पाद चावल, गेहूं, चाय, कपास, गन्‍ना, आलू, जूट, तिलहन, पोल्‍ट्री आदि
उद्योग इस्‍पात, वस्‍त्र, पेट्रोलियम, सीमेंट, मशीनरी, लोकोमोटिव, खाद्य प्रसंस्‍करण, भैषजिक उत्‍पाद, खनन आदि
मुद्रा (कोड) भारतीय रूपए (आईएनआर)
वित्‍तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च


कई महत्वपूर्ण और बड़ी नदियाँ जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, गोदावरी और कृष्णा भारत से होकर बहती हैं। इन नदियों के कारण उत्तर भारत की भूमि कृषि के लिए उपजाऊ है।
भारत की सांस्कृतिक धरोहर बहुत संपन्न है। यहां की संस्कृति अनोखी है,आधुनिक भारत का समाज,भाषाएं,रीति-रिवाज इसके प्रमाण हैं। गढ़वाल-कुमाऊं की संस्कृति यहां के मेलों में समाहित है। रंगीले कुमाऊं के मेलों में ही यहां का सांस्कृतिक स्वरुप निखरता है। धर्म,संस्कृति और कला के व्यापक सामंजस्य के कारण इस जगह में मनाये जाने वाले उत्सवों का स्वरुप बेहद कलात्मक होता है। गढ़वाल में बैकुंठ चतुर्दशी का मेला हर साल लगता है। विभिन्न त्योहारों की तरह बैकुंठ चतुर्दशी साल भर में पडने वाला हिन्दू समाज का महत्वपूर्ण त्योहार है। गढवाल में स्थित श्रीनगर का कमलेश्वर मन्दिर पौराणिक मन्दिरों में से है। इसकी धार्मिक महत्ता है कि यह स्थान देवताओं की नगरी भी रही है।